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	<title>संपादकीय Archives - The Sunday views</title>
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	<description>Daily Hindi News</description>
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		<title>पूंजीवाद का नया हथियार &#8216;जेन जी&#8217;- रघु ठाकुर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Aug 2026 18:06:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160; &#160; &#160;रघु ठाकुर नई दिल्ली। इस समय दुनिया में, विशेष कर अमेरिका, यूरोप, चीन और रूस को छोड़कर जेन जी की चर्चा ज्यादा है। खाड़ी देश और विशेषकर एशिया&#8230; </p>
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<figure class="wp-block-image is-resized"><img decoding="async" src="http://www.indiaexpressnews.com/wp-content/uploads/2023/12/raghu-thakur-g-300x266.png" alt="" style="aspect-ratio:1.1307692307692307;width:132px;height:auto"/></figure>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp; &nbsp; <strong>&nbsp;रघु ठाकुर</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नई दिल्ली</strong>। इस समय दुनिया में, विशेष कर अमेरिका, यूरोप, चीन और रूस को छोड़कर जेन जी की चर्चा ज्यादा है। खाड़ी देश और विशेषकर एशिया के कई देशों में जेन जी के आंदोलन के नाम से सरकारें बदलीं है। जब मिस्र में जैस्मीन रिवॉल्यून के नाम से आंदोलन शुरू हुआ और सैन्य हस्तक्षेप के बाद सत्ता परिवर्तन के साथ समाप्त हुआ था। बदलाव के नाम पर केवल इतना ही हुआ कि रूस समर्थक सत्ताधीश हटकर अमेरिका समर्थक सरकार आ गई। बांग्लादेशया नेपाल और श्रीलंका में भी जो आंदोलन हुए उससे भी सरकारें तो बदली है पर कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, सिवाय इसके कि चीन समर्थक या चीन से मित्रता रखने वाली सरकार बदली परंतु व्यवस्था जस की तस है। नेपाल में माक्र्सवादी सरकार को हटाकर जेन जी की पीढ़ी से श्री बालेन शाह सत्ता में आए और आने के बाद उन्होंने सबसे पहले कॉलेज और विश्वविद्यालय में जहां से जेन जी का उदय हुआ और आंदोलन शुरू हुआ था उनके ऊपर ही बेन लगा दिया। छात्र संघों के चुनाव खत्म कर दिए। यानी कोई नया नेतृत्व पैदा ना हो सके और अब स्थिति यह है कि अब बालेन शाह के खिलाफ जेन जी के नौजवान आंदोलन कर रहे हैं, यहां तक की तीन नौजवान आत्मदाह कर चुके हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="1024" height="570" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2026/08/jng-2-1024x570.png" alt="" class="wp-image-25984" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2026/08/jng-2-1024x570.png 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2026/08/jng-2-300x167.png 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2026/08/jng-2-768x428.png 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2026/08/jng-2.png 1191w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">बांग्लादेश में भी युवकों का आंदोलन शुरू हुआ था जो मुक्ति वाहिनी के परिवारजनों को शेख हसीना सरकार के द्वारा आरक्षण वृद्धि के खिलाफ था। बाद में हिंसक और आंदोलन से प्रधानमंत्री हसीना को बचाने के लिए सेना अध्यक्ष ने उन्हें देश छोडऩे की सलाह दी और आज वहां वीएनपी की सरकार है। श्रीलंका में भी इसी तर्ज पर आंदोलन के बाद सरकार बदली और अब नई पीढ़ी का प्रतिनिधि राष्ट्रपति है। परंतु सिवाय वैश्विक रिश्तों से बदलाव के अलावा कुछ ज्यादा नहीं बदला। पिछले मई माह में भारत में नीट परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे। यद्यपि सरकार ने 21 जून को पुनरू परीक्षा कराई। जिसमें कोई पेपर लीक नहीं हुआ। परंतु निराशा में लगभग 21 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। यद्यपि मैं आत्महत्या को कतई उचित नहीं मानता। आत्महत्या निराशा के साथ-ंसाथ मानवीय कमजोरी भी है परंतु जिन बच्चों ने इस निराशा में आत्महत्या की उनके मन की पीड़ा उनके परिवारजनों की पीड़ा की कल्पना भी कठिन है। एक बच्ची कुमारी प्रियंका का आत्महत्या के पूर्व लिखा पत्र बहुत ही मार्मिक है। उसने अपने पिता को लिखा कि मैं एक वर्ष से नीट परीक्षा की तैयारी कर रही थी पेपर लीक होने की वजह से परीक्षा की नई तिथि आई पर अब मैं दोबारा परीक्षा में बैठने का साहस नहीं कर सकती। साल भर नौजवान छात्र घरों से बाहर रहते हैं और तैयारी में लाखों रुपये खर्च होते हैं। वे दिन रात पढ़ते हैं? पर जब पेपर लीक होकर परीक्षाएं बढ़ती है तो उन्हें अपना सारा भविष्य अंधकार में लगता है। मोदी ने या उनकी सरकार ने बच्चों और परिवारजनों के लिए दो शब्द भी सांत्वना के नहीं कहे। यहंा तक कि हम लोगों के द्वारा उनसे सार्वजनिक मांग करने के बाद भी अपने मन की बात में इन बच्चों को सांत्वना नहीं दी उल्टे गणेश चतुर्थी व स्थापना के अवसर पर मिट्टी के गणेश जी ना बनाने की अपील की, जबकि गणेश स्थापना के लिए अभी तीन माह का समय था। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अतिक्रूता और घमंड था कि देश में नेरेटिव की चर्चा वही तय करते हैं। यद्यपि 21 जून को परीक्षाएं निर्विघ्न हो गई। एक सप्ताह बाद परिणाम भी आ गये लगभग 12 लाख बच्चे नीट में पास हो गए और लगभग साढ़े ग्यारह हजार बच्चों का चयन चिकित्सा शिक्षा में भी हो गया, परंतु जो घाव 23 लाख नीट के परीक्षार्थियों और उनके परिवारजनों के मन में लग चुका था उसकी जड़ समाप्त नहीं हो सकी। भले ही 23 लाख से घटकर पुन: हुई परीक्षा में 22 लाख बच्चे बैठे, परंतु उनके मन में यह टीस थी कि अगर पहले परीक्षा ठीक हो जाती तो शायद वह भी पास हो जाते।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस घटनाक्रम के लगभग दो माह बाद अमेरिका में रह रहे और काम कर रहे कुछ नौजवानों के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री सूर्यकांत शर्मा की एक गैर जरूरी टिप्पणी जिसमें उन्होंने इन नौजवानों की तुलना कॅाकरोच से की थी, के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी बनी और सोशल मीडिया के नए माध्यमों व्हाटसएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एआई और चैट जीपीटी तथा इस प्रकार के नए टूल्स के माध्यम से इस नई पीढ़ी जिसे जेन जी कहा जाता है कि यानी जो बच्चे 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए और जो सोशल मीडिया के नए माध्यमों के अभ्यस्त हैं ,पर सीजेपी का समाचार पहुंचा। कुछ समय बाद यह भी खबर आई की सीजेपी के फ ॉलोअर्स 2 करोड़ हो चुके हैं। और यह भी कि पिछल्ेा 20 वर्षों में ही भाजपा के फ ॉलोअर्स इससे कम हैं। इन खबरों से भी नई पीढ़ी के मन में और उत्साह जगा हालांकि 2 करोड़ फ ॉलोअर्स वाले सीजेपी के मुखिया अभिजीत दिपके जब (अचानक या भेजे गये) हिन्दुस्तान आये तो उनकी पहली सभा जो जंतर मंतर में हुई थी उसमें बमुश्किल से 300 से 400 से भी कम की संख्या में लोग थे। 6 जुलाई से उन्होंने पुन: जंतर मंतर पर धरना शुरू किया जिसके बाद में स्विटजरलैंड से आकर सोनम वांगचुक शामिल हुए और उन्होंने अनशन शुरू कर दिया। 11 जुलाई को मेरे एक मित्र अमरदीप चौरसिया वहां गए थे, वे उस आंदोलन में भक्ति भाव से समर्पित थे, ने 12 जुलाई को मुझे ये बताया कि 11 जुलाई को जंतर मंतर पर लगभग 200 से 250 लोग थे और 12 जुलाई को क्योंकि इतवार है इसलिये उनकी संख्या बढ़ कर 400 से 500 हो सकती है। यानी देश के छात्रों और नौजवानों की तकनीकी भागीदारी अवश्य थी परंतु सक्रिय भागीदारी नहीं थी। आरंभ में सीजेपी के तत्कालीन मार्गदर्शक व प्रवक्ता योगेन्द्र यादव ने मंच से कहा था कि राजनीतिक दलों के लोग ना आए और यदि आएं तो झंड़ा, डंडा छोड़कर आयें। और कुछ ही दिनों के बाद सीजेपी ने संसदीय राजनीतिक दलों का कालीन बिछाकर स्वागत किया और यहां तक कि श्री वांगचुक और अन्य लोगों ने भी यह अपील की कि यदि राजनीतिक दल संसद में इसे उठाने को तैयार हों तो वह अपना अनशन तोड़ देंगे। पंरतु किसी राजनीतिक दल ने औपचारिक रुप से अनशन तोडऩे की अपील नहीं की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने एक सार्वजनिक बयान देकर कहा कि हम इसे संसद में उठायेंगे परंतु वांगचुक से कोई अपील नहीं की। 19 जुलाई को उन्हें ले जाकर अस्पताल में भर्ती करने के बाद और 20 जुलाई को संसद मार्ग पर लाठी चार्ज और हिंसा के बाद, सभी संसदीय विरोधी दलों ने आँसू बहाना शुरू कर दिया। यानी पहले तुम पिटो फि र हम आँसू बहाएंगे और अपना वोट बैंक सजायेंगे। सभी सूचनाओं के अनुसार 20 जुलाई के मार्च में भी लगभग 8 से 10 हजार लोग थे जिसमें वामपंथी संगठन यानी एआईएसए, एएसएफआई तथा भीम आर्मी के नौजवान, अन्य राजनीतिक दलों के, आम आदमी पार्टी के कुछ नौजवान, जेएनयू के छात्र तथा सोशल मीडिया पर बने एक आक्रामक माहौल से प्रभावित छात्र नौजवान भी वहां पहुंचे थे। 2010 में अन्ना हजारे के अभियान के समय कारपोरेट ने इलेक्ट्रिानिक मीडिया को लगभग खरीद लिया था। जिस पर महीनों केवल अन्ना हजारे ही आते थे। इस बार सोशल मीडिया और उसके टूल्स को भी लगभग इसी प्रकार इस्तेमाल किया गया। इन टूल्स के मालिक विदेश कारपोरेट हैं। इसकी शुरूआत करने वाले भी विदेश में निवास करते हैं और प्रचार -प्रसार शक्ति के माध्यम से कुछ समय में देश में प्रसारित और चर्चित हो जाते हैं। अन्ना अभियान को व इस अभियान के इस पक्ष को भी देश को समझना होगा। मई माह में हमारी लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी ने दिल्ली, ग्वालियर और चांपा तथा अन्य स्थानों पर धरना प्रदर्शन किया और ज्ञापन दिया, बयान दिये, पत्रकार वार्ता की, लेख लिखे, सभाएं आदि की परंतु हम देश के नौजवानों का साथ नहीं पा सके और सरकार भी नहीं पिघली। क्योंकि इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति भर लडऩे-ंलडऩे पर जीवन लगा सकते हैं, परंतु देश में चर्चा विदेशी प्रायोजित प्रचार तंत्र की ताकत वालों की ही होगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह जेन जी का वर्गीकरण कहां से हुआ और क्यों हुआ यह भीविचारणीय है। दुनिया के माक्र्सवादियों ने अमीर गरीब का वर्गीकरण किया था। डॉक्टर लोहिया के समाजवादी विचारों के बाद अमीर गरीब के अलावा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के आधार पर वर्गीकरण हुआ। बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का वर्गीकरण हुआ। परंतु यह सब वर्गीकरण कहीं ना कहीं विषमता को समाप्त कर समता की व्यवस्था को चाहने वाले थे। अब यह नया आयु आधारित वर्गीकरण दुनिया के मूल प्रश्न गरीबी, विषमता, पूंजीवाद, सामंतवाद, जातिवाद जैसी शाश्वत बीमारियों की चर्चा को ना कर केवल उस उम्र पर आधारित वर्गीकृत समाज बनाना चाहता है। यह वर्गीकरण पूंजीवाद का रणनीतिक खेल है किस प्रकार 20वीं शताब्दी में सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर धार्मिक धु्रवीकरण और धार्मिक धु्रवीकरण फैलाकर पंूजीवाद को समता के विचार के आक्रमण से बचाने का खेल शुरू हुआ था और जो अब कमजोर पड़ गया है, इसलिये पूंजीवाद ने अब इस नए आयु वर्गीकरण की ओट में अपनी सुरक्षा की योजना पुन: तैयार कर ली है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह जेन जी की पीढ़ी संख्यात्मक दृष्टि से देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी के बराबर है। यह नितांत आत्म केंद्रित औ नई तकनीक के औजारों की अभ्यस्त है। इसकी दुनिया इंस्टाग्राम, एक्स ,मीम तय करती है। यद्यपि सरकार ने अब लाचार होकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया है,पर देश की इस जेन जी पीढ़ी और आम दिलों में घाव लग चुका है और वह प्रधानमंत्री जी की नकली उदारता या हथकंडों से प्रभावित होने वाला नहीं है। बहुत संभव है कि यह निरेटिव देश या में लंबा चले और आगामी चुनाव में इन सरकारों को बदलकर नई पीढ़ी व नए नेतृत्व को अवसर मिले। हालांकि विचारधारा के बारे में केवल एक शाब्दिक प्रतिक्रिया पर बनी पार्टी कितनी दूर जाएगी यह कहना अभी कठिन है। क्योंकि दो देशकों में देश के राजनीतिक मुद्दे और सरकारें कॉर्पोरेट ही बना रहे हैं।</p>



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		<title>दिल्ली-पर्व और प्रदूषण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Nov 2025 14:02:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पर्व और प्रदूषण &#160; &#160; रघु ठाकुर दिल्ली। इस दीपावली के पूर्व यानि 19 अक्टूबर 25 को देश में 1 लाख से अधिक कारों की बिक्री हुई, ऐसे समाचार मीडिया&#8230; </p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>पर्व और प्रदूषण</strong></p>



<figure class="wp-block-image is-resized"><img decoding="async" src="http://www.indiaexpressnews.com/wp-content/uploads/2023/07/raghu-thakur-g-300x266.png" alt="" class="wp-image-5243" style="width:111px;height:auto"/></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&nbsp; &nbsp; रघु ठाकुर</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दिल्ली।</strong> इस दीपावली के पूर्व यानि 19 अक्टूबर 25 को देश में 1 लाख से अधिक कारों की बिक्री हुई, ऐसे समाचार मीडिया में आये हैं। जबकि यह केवल धनतेरस का दिन था। दिवाली की खरीद कई दिन चली है क्योंकि पंडितों ने, दो दिन की धनतेरस कर दी है। इस कार और दोपहिया वाहनों की खरीदी में वृद्धि के लिये कई कारण बताये जा रहे हैं।<strong><br>1. जीएसटी की दरों में कमी होने की वजह से 80 हजार रुपये से 1 लाख रुपये तक प्रत्येक वाहन पर कम हो गये हैं।<br>2. बैंकों और फायनेंस कंपनियों द्वारा चार पहिया और दो पहिया वाहनों के लिये अति सरलीकृत तरीके से ऋण व्यवस्था शुरू हुई है, यहाँ तक कहा जाने लगा है श्बस एक कॉल-कार आपके द्वार्य और इसलिये अब कारों को खरीदने की होड़ है।<br>3. 1 नवंबर 2025 को देवउठनी ग्यारस है और शादी विवाह शुरू हो जायेंगे। इसलिये जिन लोगों को शादी विवाह में गाडि़याँ भेंट करना है उनमें से कुछ लोगों ने अभी गाड़ी खरीदना बेहतर समझा ताकि बाद में नंबर न लगाना पड़े।</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img decoding="async" width="495" height="453" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/11/air-p-1.jpg" alt="" class="wp-image-23969" style="width:840px;height:auto" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/11/air-p-1.jpg 495w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/11/air-p-1-300x275.jpg 300w" sizes="(max-width: 495px) 100vw, 495px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><br>चार पहिया वाहनों की खरीद पर देश में कार उद्योगपतियों के पास 20 हजार करोड़ रुपया पहुंचा है और अगर 10 प्रतिशत भी मुनाफा मान लिया जाये तो न्यूनतम मुनाफा 2 हजार करोड़ रुपये कार निर्माताओं को तिजोरियों में मात्र एक दिन में पहुँच गया। इनमें से अधिकांश कारों को खड़ी करने के लिये पार्किंग की जगह तक नहीं है।अधिकांश कारें सड़कों पर खड़ी रहती है, जिससे जाम लगता है। नई कारों की गति बहुत तेज होती है और हमारी नई युवा पीढ़ी, जिसका अधिकांश हिस्सा संस्कार विहीन है, वह इतनी तेज रफ्तार से गाडि़यां चलाता है जिससे दुर्घटनायें बढ़ती हैं। इससे कई बार वे खुद भी मरते हैं और कई निर्दोषों को भी मार देते हैं। भारत सरकार की सूचना के अनुसार 1 वर्ष में औसतन एक लाख 72 हजार लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं। जिनमें से लगभग 35 हजार से अधिक लोग फुटपाथ व सड़क पर चलने वाले लोग होते है जो मौत के शिकार होते हैं। यह तो एक पहलू हुआ, दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि देश में प्रदूषण इतना बढ़ रहा है और इतना घातक हो चुका है जिसकी कल्पना भी करना कठिन है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"> इस बार की दीपावली प्रदूषण की दीपावली बन गयी। देश की राजधानी दिल्ली के अनेक इलाकों में प्रदूषण का स्तर 400 ए.क्यूआई के पार पहुँच गया था, जो व्यक्ति के लिये घातक है। पिछले 2 वर्षों से भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजधानी के में पटाखों पर प्रतिबंध लगाया था। परंतु इस बार मुख्य न्यायाधीश की बैंच ने र्ग्रीन पटाखों के नाम पर स्वीकृति दे दी। एक कटु सत्य तो यह है कि ग्रीन पटाखे तो कहने के होते हैं वस्तुतरू पटाखे-पटाखे होते हैं जो बहुत धुआं छोड़ते हैं। यह धुआं सड़कों व घरों में भरता है तथा इंसान की जान के लिये घातक हो रहा है। श्वांस की बीमारियां बहुत बढ़ गई हैं। जिस प्रकार के भारी-भारी बम बनाये और चलाये जा रहे हैं, उनसे होने वाले धुयें और ध्वनि प्रदूषण की कल्पना दिल्ली या शहरों में बैठे सत्ताधीशों, महलों के मालिकों, बड़े-बड़े फार्म हाउस के मालिकों को और माननीय न्यायाधीशों को नहीं हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब तंग गलियों में ये बड़े-बड़े बम फूटते हैं तो कंपन से दीवारें हिल जाती हैं। बीमार व्यक्ति और हृदय रोगियों को घबराहट होती है और अनके लोग हृदयघात के शिकार हो जाते हैं। गलियों में भरा हुआ धुआँ का एक मात्र विकल्प इंसान के नाक,मुँह से शरीर में प्रवेश करना होता है है, त्यौहार के बाद का अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि दीपावली के पटाखों के प्रदूषण से श्वास की बीमारियों और पीडि़तो की भारी भीड़ अस्पताल में लाइन लगाये है। यह प्रचार किया गया था कि स्वदेशी के सरकारी आह्वान के कारण स्वदेशी पटाखे चले हैं, परंतु तथ्य यह है कि स्वेदशी के नाम पर अधिकांश पटाखे चीनी होते हैं और अधिकांश चतुर पटाखा व्यापारियों ने चीन के पटाखों पर मेड इन इंडिया का लेबल चिपका दिया तथा भारी मुनाफे में पटाखे बचे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस बार भारत की सरकार और सरकारी पार्टी ने भी पटाखों के लिये जोरदार अभियान चलाया और यहाँ तक कहा जा रहा है कि अब सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पटाखों पर लगाई गई रोक सनातन के खिलाफ थी। इसी आधार पर भीतर-भीतर एक हिन्दू मानस बनाने का अभियान भी चलाया जा रहा है। देश के प्रमुख मीडिया में दीपावली पर्व के गौरवशाली वर्णन, इतिहास और भगवान राम के साथ उसका रिश्ता जोड़कर लोगों को उत्साहित किया गया, ताकि लोग जमकर पटाखे खरीदें और फोड़ें। कई लोगों के मन में एक प्रकार की अंतर धार्मिक प्रतिद्वंदिता भी इस जुनून में पैदा हो गई थी कि इस उत्साह से लोग और अधिक पटाखे फोड़े। उन्हें अगले दिन या भविष्य की चिंता नहीं थी कि अगले दिन की सुबह उनके घरों के बुजुर्गों की क्या स्थिति होगी? उनके खुद के स्वास्थ्य पर क्या असर होगा, बस एक प्रकार का जुनून था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">योजनाबद्ध ढंग से पर्व-संस्कृति अभियान के नाम से यह प्रचारित किया जा रहा है कि पर्व को जोर-शोर से मनाना ही राष्ट्रवाद है और भारत व सनातन की जीत है। दुनिया में सभी देशों में यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका में लोग पर्व अपने-अपने धर्म के आधार पर मनाते हैं, उनके कुछ तार्किक और ऐतिहासिक पक्ष भी होते हैं। सिख भाई पंजाब में लोहड़ी का पर्व मनाते हैं जो उनकी फसल कटाई और अच्छी खेती और काम के बाद का सुख पर्व होता है। केरल में भी ओणम जैसे पर्व मनाये जाते हैं। इसका संबंध वहाँ के संपन्न और सफलता से होता है। ईसाई भाई भी बड़ा दिन यानि 25 दिसंबर को मनाते हैं। जो सुख और समृद्धि का दिन है। मुस्लिम भाई साल में दो बार ईद का पर्व मनाते हैं, बौद्ध भी बोधि उत्सव मनाते हैं। इस प्रकार लगभग सभी धर्मों में कुछ न कुछ पर्व मनाने की परंपरा है जो लोगों को सामूहिक आनंद और खुशी देते हैं तथा उत्साह से भरते हैं। परंतु भारत में कुछ दिनों से पर्वों की संख्या निरंतर वृद्धि पर है। खोज खोजकर नये-नये पर्वों को मनाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यदि भारत के त्यौहारों और पर्वों की गणना की जाये तो शायद कई माह के बराबर त्यौहार और पर्व हो जायेंगे, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की उन्माद अतिरेकी की सहभागिता होती है।कई बार ऐसा लगता है कि शायद इन नये-नये पर्वों और उत्सवों के पीछे राजनीति और बाजार है। क्योंकि पर्वों के नाम पर जो खरीददारी होती है वह बाजार का पेट भरती है और गरीब की जेब खाली करती है। बाजार नियंत्रित कारपोरेट मीडिया को विज्ञापन मिलते हैं, अधिकारी-कर्मचारी को छुट्टियां मिलती हैं। पंडि़तों और पुजारियों को पर्व से काम मिलता है, और राजनीति को खुराक मिलती है, यानि वोट का फायदा होता है। इसलिये पिछले कुछ वर्षों से नये-नये त्यौहार और पर्व खोजे जा रहे हैं तथा उन्हें अतीत की घटनाओं से जोड़कर श्पर्व संस्कृत्यि बताया जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस बार की दिपावली पर्व श्पंच दिवसीय्य रहा, 2 दिन धनतेरस तीसरे दिन दीपावली चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पाँचवे दिन भाई दूज। अब तो हालात यह हैं कि धनतेरस की खदीदी के लिये कार-कपड़े ट्रेक्टर, मकान, सोना-चांदी आदि के लिये अलग-अलग मुहूर्त बताये जाते हैं। कुल मिलाकर पंडित और पुजारी बाजार के सहायक बन जाते हैं और बाजार बिक्री के मुनाफे की खेती करता है और राजनीति वोट की खेती तैयार कर लेती है। इस दीपावली पर पटाखों के नाम पर कितनी बारूद का इस्तेमाल हुआ है उसकी कल्पना एक आंकड़े से की जा सकती है। दुनिया में हथियारों के बिक्री व संग्रह की जानकारी रखने वाली प्रमाणिक संस्था एसपीआरआई (शिपरी) ने बताया है कि रूस ने यूक्रेन पर औसतन एक दिन में जो हथियार चलायेे जाते हैं उसमें लगभग 20 हजार टन बारूद प्रतिदिन खर्च होता है। जबकि भारत में इस दीपावली के एक दिन में 60 हजार टन बारूद के पटाखे चले। यानि 3 दिन के रूस यूक्रेेन युद्ध के बराबर बारूद के पटाखे चले।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को अपने निर्णय पर यानि पटाखे के प्रतिबंध को हटाकर अनुमति देने पर स्वतरू विचार करना चाहिये था। परंतु ऐसा लगता है कि मुख्य न्यायाधीश महोदय एक याचिका की सुनवाई में भगवान विष्णु के बारे में तार्किक टिप्पणी करने के बाद हुई प्रतिक्रियाओं से मानसिक रूप से प्रभावित हो गये हैं। राकेश किशोर नामक वकील ने जो हरकत की और पीठ पर जूता फेंका तथा मुख्य न्यायाधीश महोदय की टिप्पणी को सनातन का अपमान बताने का प्रयास किया। इस प्रचार से मु. न्यायाधीश महोदय इतने अधिक मानसिक रूप से प्रभावित हो गये कि उन्होंने न सनातन और पर्व संस्कृति के नाम पर पटाखा चलाने की जनविरोधी खेल की खुली छूट दे दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मेरी राय में उन्होंने सनातन विरोधी होने के प्रचार के भय से ऐसा निर्णय किया है जो स्वतरू सनातन की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। अयोध्या में दीपावली उस दिन मनायी गयी थी जिस दिन भगवान राम रावण को हराकर वनवास से लौटे थे, वह केवल एक महान घटना का स्वागत था। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों ने या कृष्ण ने कोई दीपावली नहीं मनाई। किसी शास्त्र में ऐसा कृष्ण द्वारा जीत का पर्व मनाने का कोई उल्लेख नहीं है। पर्व मानवीय उत्साह की प्रतिक्रिया होती है। और उसे बाजार के हाथों, अतार्किकता के हाथों या अंधविश्वास के हाथों में सौंपना गलत व कमजोर निर्णय है। जो अपनी ही समाज, को नुकसान पहुँचा रहा है।</strong><br><br><br></p>
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		<title>दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी तय हो</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 14 Sep 2025 16:18:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[स्पेशल स्रोरी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160;रघु ठाकुर नई दिल्ली। हमारे देश में दुर्घटनायें होती हैं परंतु शायद ही कभी किसी की कोई जवाबदारी तय होती हो। यह चलन केवल आज से नहीं है बल्कि आजादी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&nbsp;रघु ठाकुर</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नई दिल्ली।</strong> हमारे देश में दुर्घटनायें होती हैं परंतु शायद ही कभी किसी की कोई जवाबदारी तय होती हो। यह चलन केवल आज से नहीं है बल्कि आजादी के बाद से ही लगभग चला आ रहा है। कभी-कभी कुछ राजनैतिक, नैतिकता के आधार पर कदम उठाये जाते हैं। ऐसे कदम वैयक्तिक नैतिकता के नाते मानदंड बनते हैं, परंतु व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं लाते। कुंभ मेले में एक बड़ी दुर्घटना इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में हुई थी, उस समय प्रधानमंत्री स्व: जवाहर लाल नेहरू थे और वह इलाहाबाद के फू लपुर से सांसद थे। इसमें कई सौ लोग भगदड़ में मर गये थे। कुछ दिन मीडिया पर्व चला, कमेटी बनी, कुछ सुझाव आये और मामला समाप्त हो गया। एक रेल दुर्घटना को लेकर तत्कालीन, रेलमंत्री स्व: लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा दिया था। उससे उनकी निजी छवि व ऊंचाई बढ़ी परंतु व्यवस्था जहां की तहां रही। स्व: विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उनके भाई जो जज थे, कि हत्या डाकूओं ने की थी, उन्होंने भी नैतिक आधार पर अपनी असफलता मानकर इस्तीफ़ा दिया था और देश ने जैसे उनके गुरु स्व: लाल बहादुर शास्त्री को नैतिकता का पर्याय बताया था उसी प्रकार उन्हें भी सम्मानित किया। इस्तीफे के बाद स्व: वी. पी. सिंह भी प्रधानमंत्री बने। हालांकि दस्यु समस्या यथावत रही।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="1024" height="494" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/accident-1024x494.png" alt="" class="wp-image-23238" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/accident-1024x494.png 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/accident-300x145.png 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/accident-768x371.png 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/accident.png 1183w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे तो सबसे बेहतर यह होता कि ये इस्तीफ़ा देने की जगह व्यवस्था को सुधारते, गड़बडिय़ां करने वालों को दंडित करते परंतु किसी ने भी वह नहीं किया। अगर इस्तीफ़ा, देने के बाद इन्होंने उस व्यवस्था को सुधारने के लिये चाहे वह रेल की हो या कानून व्यवस्था की, कुछ संषर्ष भी किया होता तब भी कुछ हलचल होती परंतु कालान्तर में उसी व्यवस्था के बड़े हिस्सेदार बने रहे। अब तो प्रति वर्ष न मालूम कितने हादसे होते हैं। दो-चार दिन अखबार में छप जाते हैं परंतु दंडित कोई नहीं होता। यूनियन कार्बाइड में, मिक गैस के रिसन के लिये कौन जवाबदार था, कौन गुनाहगार है इस पर आज तक कोई निर्णय नहीं हुआ। और पीडि़त पक्ष भी केवल पैसा व रियायतें लेकर अपने मृतक पुरखों की मौत को बेच देता है। म.प्र. में धार में विस्फ ोट की घटना हुई, फि र हरदा में हुई और ऐसी अनेकों घटनायें उद्वित की जा सकती हैं परंतु सभी गुनाहगार सलाखों के बाहर हैं। पिछले कुछ वर्षों में जो धार्मिक जुनून पैदा हुआ है, उसके कारण भी कई भगदड़ें हुई हैं। ग्वालियर जिले के रतनगढ़ की माता के मंदिर में अचानक पानी छोड़ देने से कृत्रिम बाढ़ आई जिससे बड़ी संख्या में लोग मरे और देवी कृपा से सब शांत हो गया। गुना जिले में भी एक मंदिर में वार्षिक मेले में भारी भीड़ हुई, दुर्घटना में काफी लोग मरे, सरकारों ने मुआवजा दिया और मामला शांत हो गया। ऐसी कितनी ही घटनायें धार्मिक स्थलों पर लगातार होती रही हैं। हालांकि हमारे देश के मीडियाके एक हिस्से का नजरिया धार्मिक मामलों में नितांत अंधविश्वासी जैसा है। एक बार जब बद्रीनाथ, केदारनाथ में अचानक बर्फ पिघलने से बाढ़ आई, भारी तबाही हुई तो पर्यावरणविदों ने इस घटना को वनों के कटाई वालों के खाते में डाल दिया और मीडिया के एक हिस्से ने छापा कि बस केवल मठ बचा रह गया। याने भगवान केवल खुद को ही बचा पाये। अभी धराली उत्तराखंड में जो घटना हुई और बाढ़ आई उसके बारे में मीडिया ने छापा केवल गीता बच गई। यानि छपी हुई गीता की किताब बड़ी संख्या में इंसानों की मौत से अधिक महत्वपूर्ण है। यदि गीता बह भी जाती तो गीता प्रेस से दूसरी प्रति मिल जाती। परंतु जिन इंसानों की जान चली गई क्या उन्हें वापिस लाया जा सकता है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अभी कुछ दिनों पूर्व देश में तीन और घटनायें घटी</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1.</strong> बंगलोर में क्रिकेट के मैच के बाद जश्न मनाने को जो लोग लाखों की संख्या में जमा हुये, वहां भगदड़ मची तथा कई लोग मारे गये। क्रिकेट बोर्ड के लोगों ने पहले से जीत के बाद जश्न मनाने को जो तैयारियां व व्यापक प्रचार किया था उसके मानसिक प्रभाव में लाख से अधिक लोग मैदान में पहुंच गये। इसकी सूचना अधिकृत रूप से पुलिस को थी, न प्रशासन को थी। दो चार दिन अखबार में परस्पर दोषारोपण हुआ, क्रिकेट खिलाड़ी विराट कोहली ने खेद व्यक्त किया और मामला शांत हो गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>2.</strong> तेलंगाना में एक फिल्म के शो के प्रीमियर पर दक्षिण के एक लोकप्रिय अभिनेता को टॉकीज के पास बुलाया गया और उन्हें देखने के लिये जो भगदड़ गची उसमें कई लोग मारे गये। चूंकि उक्त अभिनेता वहाँ की सरकार के खिलाफ वाले हैं अत: यह शायद देश की पहली घटना होगी जहां की अभिनेता पर इस आधार पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया कि वह बगैर पुलिस सूचना के ऐसे कार्यक्रम में न पहुंचे जिसके कारण भगदड़ गची और मौतें हुई। परंतु इस प्रकार की कार्यवाही कर्नाटक में नहीं हुई।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>3.</strong> अभी कुछ दिनों पहले म.प्र. के सीहोर के एक कथावाचक प्रदीप मिश्रा के आयोजन में शामिल होने के लिये देशभर से हजारों या लाख के आसपास लोग पहुंच गये, वहाँ भगदड़ मची और उस भगदड़ में कई श्रद्धालु मर गये। ऐसा बताया जाता है कि प्रदीप मिश्रा रूद्राक्ष बांटते हैं और देश के आम लोगों में यह प्रचारित है कि इस रूद्राक्ष से मोक्ष मिल जायेगा। यह भी बताया जाता है कि प्रदीप मिश्रा कोई पर्ची निकालते हैं, इस पर्ची में क्या होता है इसकी कोई निजी जानकारी मुझको नहीं है परंतु कुछ लोग कहते हैं कि समस्याओं का हल निकलता है। इतनी गंभीर घटना के बाद भी प्रदीप मिश्रा ने न तो कोई जवाबदारी ली और न प्रशासन ने कोई कार्यवाही की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कई बार तो ऐसा लगता है कि देश में दो प्रकार के कानून चल रहे हैं, हम जो राजनैतिक पार्टी के लोग हैं, जो समाज परिवर्तन के लिये काम करते हैं, लोगों को सविनय अवज्ञा सिखाने का प्रयास करते हैं, उनके लिये सुप्रीम कोर्ट से लेकर सरकारों तक सबसे बड़े कठोर नियम हैं। एक राजनैतिक दल को यदि धरना देना हो तो कलेक्टर के यहां आवेदन करना होता है, वह आवेदन पुलिस को भेजा जाता है और पुलिस की सहमति के बाद अनुमति दी जाती है। कितना विचित्र है कि एक सविनय अवज्ञा वाले को पुलिस से अनुमति लेनी होती है व दफ्तार के चक्कर काटना पड़ते हैं, इतना ही नहीं 20-30 कालम का एक प्रारूप है जो दिल्ली के संसद मार्ग थाने में भरना होता है, इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाया गया। परंतु यह व्यवस्था व नियम प्रदीप मिश्रा, बाबाओं, क्रिकेट खिलाडिय़ों आदि को नहीं है। वे जब चाहे बगैर किसी व्यवस्था के लाख लोग जमा करें, परंतु वे कानून से परे हैं। घटना के पहले या बाद में पुलिस प्रशासन इनकी सेवा में तल्लीन रहता है, ये बाबा लोग कह सकते हैं कि हमने नहीं बुलाया, परंतु यह सत्य नहीं है, सूचना देने के या पहुँचने के कई तरीके होते हैं और जब एक बार बड़ी संख्या में लोग जुड़ जाते हैं तो वह भी स्वतरू विचार करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सोशल मीडिया भी एक बड़ा माध्यम है। हाल के कुंभ में बकायदा उ.प्र. सरकार के मंत्रियों ने राज्यों में जा जाकर निमंत्रण दिया था इसके बावजूद भी शासन और प्रशासन कोई जवाबदारी लेने को तैयार नहीं। दुर्घटना होने के बाद राज्य सरकारें या केंद्र सरकार, सरकारी कोष से आर्थिक मदद मृतक के परिवार को देती है यानि जनता ही जाये, जनता ही मरे और जनता के पैसे से ही मरने वालों के परिवारों को मदद दी जाये। होना तो यह चाहिये कि इन बाबआों या कथावाचकों के पास जो धन जमा है उससे मृतकों को हर्जाना देना चाहिये और जिस प्रकार एक आदमी के विरुद्ध बगैर अनुमति के आयोजन करने के लिये आपराधिक मुकदमा चलाया जाता है, उसी प्रकार इन बाबाओं के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाना चाहिये। प्रदेश और देश में कानून का राज नहीं है। कानून के राज का मतलब होता है सबके लिये समान कानून व्यवस्था। परंतु हमारे देश में राजनैतिक सत्ताधीशों, धार्मिक सत्ताधीशों और पूँजी के सत्ताधीशों के लिये कोई कानून नहीं है, ये कानून से परे हैं। जनता को भी अंध विश्वासों से मुक्ति पानी चाहिये और भाग्य व पर्ची के बजाये कर्म और पुरुषार्थ पर भरोसा करना चाहिए।</p>
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		<title>इस तमाशे को बंद करें, चुनाव आयोग पर विपक्षी नेताओं और राहुल गांधी की निराधार आपत्तियां</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Sep 2025 05:26:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शंभू प्रसाद नई दिल्ली। यह तमाशा तभी बंद हो सकता है जब सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप करे। उसे करना भी चाहिये क्योंकि बिहार में मतदाता सूची के सत्यापन का पूरा मामला&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>शंभू प्रसाद</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नई दिल्ली</strong>। यह तमाशा तभी बंद हो सकता है जब सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप करे। उसे करना भी चाहिये क्योंकि बिहार में मतदाता सूची के सत्यापन का पूरा मामला उसके संज्ञान में है और वह सत्यापन को सही मानकर उसकी सुनवाई भी कर रहा है। अब तो चुनाव आयोग ने यह भी कह दिया कि बिना सूचना और कारण के किसी का नाम मतदाता सूची से नहीं हटेगा। चुनाव आयोग की ओर से बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विपक्षी नेताओं और विशेष रूप से राहुल गांधी की निराधार आपत्तियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। अब तो वे चुनाव आयोग पर भाजपा के लिये धांधली कराने के नये सनसनीखेज आरोप सामने लेकर आ गये हैं। उन्होंने अपने इन आरोपों को एटम बम की संज्ञा दी, लेकिन वैसा कुछ धमाका तो हुआ नहीं, जैसा वे दावा कर रहे थे। जहां चुनाव आयोग चुनावों में धांधली के राहुल गांधी के आरोपों को झूठ बताने में लगा हुआ है, वहीं राहुल एवं कुछ अन्य विपक्षी नेता आयोग को गलत बताने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुये हैं। यह संभवत: पहली बार है कि संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा रखा है।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter"><img decoding="async" src="http://www.indiaexpressnews.com/wp-content/uploads/2025/09/rahulgg1.png" alt="" class="wp-image-10526"/></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस काम में नेता विपक्ष राहुल गांधी सबसे आगे हैं। उनकी ओर से बेंगलुरु लोकसभा चुनाव में धांधली के जो तथाकथित प्रमाण दिये गये, उन्हें चुनाव आयोग ने न केवल सिरे से खारिज किया, बल्कि राहुल गांधी से यह भी मांग की कि वे अपने दावे के पक्ष में या तो शपथपत्र दें अथवा अपने झूठे आरोपों के लिये देश से माफ ी मांगें। चुनाव आयोग ने उन्हें चेतावनी भी दी है और कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी ने तो एक महिला के दो बार वोट डालने के उनके दावे को चुनौती देते हुये उनसे प्रमाण भी मांगे हैं। इसमें संदेह है कि राहुल गांधी अपने दावे के पक्ष में कोई प्रमाण देने का काम करेंगे। उन्होंने अपने दावों के पक्ष में यह कहते हुये शपथपत्र देने से इंकार किया कि उन्होंने संसद में संविधान की शपथ ले रखी है। यदि ऐसा है तो राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट से क्षमा याचना करते समय उन्होंने हलफ नामा क्यों दिया था? क्या इसलिये कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ओर से तो ठोस कार्रवाई किये जाने का भय था, लेकिन चुनाव आयोग की किसी कार्रवाई की उन्हें तनिक भी परवाह नहीं? इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिये कि चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची का जो प्रारूप जारी किया है, उस पर नौ दिन बाद भी किसी राजनीतिक दल ने अपनी कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई है। स्पष्ट है कि विपक्षी दल जनता को बरगलाने के लिये झूठे आरोपों के सहारे चुनाव आयोग को बदनाम करने में लगे हुये हैं। यह तमाशा तभी बंद हो सकता है जब सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप करे। उसे करना भी चाहिये क्योंकि बिहार में मतदाता सूची के सत्यापन का पूरा मामला उसके संज्ञान में है और वह सत्यापन को सही मानकर उसकी सुनवाई भी कर रहा है। अब तो चुनाव आयोग ने यह भी कह दिया कि बिना सूचना और कारण के किसी का नाम मतदाता सूची से नहीं हटेगा। क्या यह उचित नहीं होगा कि अब सुप्रीम कोर्ट अपनी सक्रियता दिखाये और चुनाव आयोग एवं विपक्षी दलोंए खासकर राहुल गांधी को आवश्यक निर्देश दे? चुनाव आयोग की ओर से बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विपक्षी नेताओं और विशेष रूप से राहुल गांधी की निराधार आपत्तियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। अब तो वे चुनाव आयोग पर भाजपा के लिए धांधली कराने के नये सनसनीखेज आरोप सामने लेकर आ गये हैं। उन्होंने अपने इन आरोपों को एटम बम की संज्ञा दी, लेकिन वैसा कुछ धमाका तो हुआ नहीं, जैसा वे दावा कर रहे थे। जहां चुनाव आयोग चुनावों में धांधली के राहुल गांधी के आरोपों को झूठ बताने में लगा हुआ है, वहीं राहुल एवं कुछ अन्य विपक्षी नेता आयोग को गलत बताने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुये हैं।</p>
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		<title>ट्रंप का टैरिफ युद्ध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Sep 2025 05:19:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अंतराष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अनिल&#160;श्री. लखनऊ। राष्ट्रपति पद संभालने के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप ने संरक्षणवादी एजेंडे के साथ ही चीन, कनाडा व मैक्सिको पर भारी- भरकम टैरिफ थोप कर व्यापार युद्ध की शुरुआत&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>अनिल&nbsp;श्री.</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>लखनऊ।</strong> राष्ट्रपति पद संभालने के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप ने संरक्षणवादी एजेंडे के साथ ही चीन, कनाडा व मैक्सिको पर भारी- भरकम टैरिफ थोप कर व्यापार युद्ध की शुरुआत कर दी है। ट्रंप के फैसले से वैश्विक बाजारों में भूचाल है। इन तीनों देशों द्वारा इसका जबाब देने की घोषणा से विश्व व्यापार युद्ध शुरू होने की आशंका पैदा हो गई है। दरअसल, अमेरिका ने अपने शीर्ष व्यापारिक सहयोगी कनाडा व मैक्सिको पर 25 फिसदी और चीनी सामानों पर 10 प्रतिशत टैफिक थोपकर उन्हें आर्थिक प्रतिशोध हेतु बाध्य कर दिया है। कनाडा ने अमेरिकी आयात पर टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है तो मैक्सिको भी ऐसा मन बना रहा है। वहीं चीन पिछली टैरिफ लड़ाइयों से परेशान होकर रणनीतिक प्रतिशोध को तैयार है। वह इस मामले को विश्व व्यापार संगठन तक ले जाने की बात कर रहा है। हालांकि, भारत फिलहाल ट्रंप की संरक्षणवादी कार्रवाई से बचा नजर आता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="368" height="209" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/tramp7.png" alt="" class="wp-image-23224" style="width:840px;height:auto" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/tramp7.png 368w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/tramp7-300x170.png 300w" sizes="auto, (max-width: 368px) 100vw, 368px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">भारत ने टैरिफ कटौती की दिशा में कदम उठाते हुए ट्रंप के उस टैरिफ दुरुपयोग के आक्षेप से बचने का प्रयास किया है, जिसको लेकर ट्रंप भारत को निशाने पर लेते हैं। दरअसल, भारत में शीर्ष तीस अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क मसलन कच्चे पेट्रोलियम से लेकर हार्ले, डेविडसन मोटर साइकिल तक पर मामूली टैरिफ हैं। नि: संदेह, यह रणनीतिक कदम न केवल तत्काल अमेरिकी प्रतिशोध को रोकता है बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एकीकृत होने के लिये भारत की प्रतिबद्धता का भी संकेत देता है। जैसा कि केंद्रीय बजट 2025- 26 में रेखांकित किया गया है। उल्लेखनीय है कि भारत अमेरिकी व्यापार घाटे में केवल 3.2 प्रतिशत का ही कारक है। इसकी वजह यह भी है कि भारत के तेजी से बढ़ते फ ार्मास्युटिकल और कीमती धातुओं के निर्यात फिलहाल कमजोर बने हुये हैं। यह अच्छी बात है कि ट्रंप ने पहले टैरिफ वार से भारत को राहत दी है, लेकिन वैश्विक व्यापार युद्ध से भारत में विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है। असर रुपये की सेहत पर भी पड़ेगा। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी अमेरिका यात्रा से द्विपक्षीय व्यापार खिड़की खुलने की संभावना है। वहीं ट्रंप की इस कार्रवाई का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि सामान पर टैरिफ बढ़ाये जाने से चीनी उत्पाद महंगे होंगे, तो भारतीय निर्यातक अमेरिका बाजार में नये अवसर तलाश सकते हैं। खासकर कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो पाट्र्स के क्षेत्र में, लेकिन इसके बावजूद भारत को सावधानी से आगे बढऩा चाहिये। इस टैरिफ जंग का एक पहलू यह भी कि अमेरिका में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। ट्रंप ने अमेरिकी लोगों को मुश्किल समय के लिये तैयार रहने के लिये कहा है। आशंका है कि इससे भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक में मांग कम हो सकती है। वहीं दूसरी ओर कोई भी अमेरिकी व्यापारिक प्रतिबंध अंतत: भारत के प्रमुख उद्योगों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, हमने उभरते वैश्विक आर्थिक युद्ध से बचने के लिये व्यावहारिक टैरिफ रणनीति को अपनाया है, लेकिन अभी भी बड़े वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका खत्म नहीं हुई है। हालिया केंद्रीय बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने टैक्स में छूट देकर मध्य वर्ग को खुश तो किया है, लेकिन ट्रंप के व्यापार युद्ध की घोषणा से भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ऐसे में भारत को व्यापार संतुलन को बनाये रखने और ग्लोबल इकॉनमी पर संभावित नकारात्मक प्रभाव के लिये तैयार रहना होगा। आशंका है कि कनाडा, मैक्सिको व चीन के बाद ट्रंप यूरोप को भी निशाने पर ले सकते हैं। एक अनिश्चितता पैदा हुई है कि यह टैरिफ युद्ध कितना और किस दिशा में बढ़ता है। आर्थिक विशेषज्ञ कयास लगा रहे हैं कि मोदी की अमेरिका यात्रा में ट्रंप भारत से व्यापार असंतुलन दूर करने को कह सकते हैं। वहीं दूसरी ओर भारत अमेरिका से आधुनिक अस्त्र, कच्चा तेल व प्राकृतिक गैस तथा कृषि उत्पाद आयात बढ़ाकर टैरिफ युद्ध की छाया से बच सकता है। बाकी कुछ ट्रंप की प्राथमिकताओं पर भी निर्भर करेगा। लेकिन साथ ही भारत को विश्व व्यापार संगठन के सभी देशों के लिये समान टैरिफ नियम का भी पालन करना होगा। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य भी सामने हैं।</p>
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		<title>कुदरत का कोहराम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Sep 2025 05:15:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तराखंड]]></category>
		<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अक्षत श्री. नई दिल्ली। मानसून की दस्तक के साथ ही हिमाचल व उत्तराखंड में दरकते पहाड़ व रौद्र रूप दिखाती नदियां चिंता बढ़ाने वाली हैं। कुदरत के कहर के सामने&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong> अक्षत श्री.</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong> नई दिल्ली।</strong> मानसून की दस्तक के साथ ही हिमाचल व उत्तराखंड में दरकते पहाड़ व रौद्र रूप दिखाती नदियां चिंता बढ़ाने वाली हैं। कुदरत के कहर के सामने इंसान बौना ही नजर आता है। तमाम मुख्य नदियां उफ ान पर हैं। जगह- जगह भूस्खलन से सड़कें ठप पड़ी हैं। हिमाचल में मूसलाधार बारिश के बीच मलबा व पत्थर गिरने से सैकड़ों सड़कें बंद हो गई हैं। सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित है। पहले हम गर्मी से त्रस्त होकर बारिश की आस लगाये होते हैं, लेकिन जब बारिश आती है तो स्थितियां डराने वाली हो जाती हैं। नि: संदेह ग्लोबल वार्मिंग संकट के चलते बारिश के पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। बारिश कम समय में ज्यादा मात्रा में बरसती है। जिससे न केवल पहाड़ों में कटाव बढ़ जाता है बल्कि पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा गिरकर रास्तों व पानी के प्राकृतिक मार्गों को अवरुद्ध कर देता है। यह संकट इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि हमने पहाड़ों को विलसिता का केंद्र बना दिया है। </p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="542" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/Untitledkudrat-1024x542.png" alt="" class="wp-image-23221" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/Untitledkudrat-1024x542.png 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/Untitledkudrat-300x159.png 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/Untitledkudrat-768x407.png 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/09/Untitledkudrat.png 1177w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph">तीर्थाटन अब पर्यटन जैसा हो गया है। पर्यटकों के वाहनों से छोटी सड़कें और पुल दबाव में हैं। नीति नियंताओं ने पहाड़ों में सड़कों को फ ोर लेन, सिक्स लेन बनाने का जो उपक्रम किया है, उससे पहाड़ों का नैसर्गिक वातावरण खतरे में है। पहाड़ों के किनारे काटने से भूस्खलन की गति तेज हुई है। गाहे- बगाहे पहाड़ों का मलबा सड़कों पर गिरकर यातायात को अवरुद्ध कर देता है। यात्रियों के जीवन पर हर समय संकट बना रहता है। हिमाचल की ही तरह से कुदरत के कोहराम से उत्तराखंड भी बुरी तरह त्रस्त है। भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी व पिंडर आदि नदियां खतरे के निशान के ऊपर बह रही हैं। चारधाम यात्रा मार्ग पर मलबा गिरने की घटनाएं बढऩे से यात्रा कुछ समय के लिये स्थगित की गई है। बार-बार भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया जा रहा है। जगह-जगह सड़कों के कटने से सैकड़ों यात्री फं से हुये हैं। कई गांवों को जोडऩे वाली सड़कें बह गई हैं। बादल फटने की आशंका भी लगातार बनी रहती है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री जाने वाले मार्ग जगह- जगह बाधित हैं। भारी बारिश की आशंका को देखते हुये स्कूल व आंगनबाड़ी केंद्रों में छुट्टियां घोषित की गई हैं। सामान्य जन- जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई मोटरमार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हुये हैं। कई छोटे पुल बह गये हैं। कई निचले स्थानों से लोगों को हटाया गया है। कुल मिलाकर लाखों लोगों को अतिवृष्टि ने बंधक बना दिया है। निश्चित रूप से तेज बारिश और उसके प्रभाव इंसानी नियंत्रण से बाहर होते हैं। लेकिन इसके बावजूद पहाड़ी इलाकों में विकास के मॉडल पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। पहाड़ अध्यात्म के केंद्र भी रहे हैं, उन्हें पर्यटकों की विलसिता का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिये। हमें अपेक्षाकृत नये हिमालयी पहाड़ों और उसके परिस्थितिकीय तंत्र के प्रति संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए। ज्यादा मानवीय हस्तक्षेप से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नदियों का बढ़ा जल संकट का कारण भी बन रहा है।</p>
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		<title>युद्ध में सेना जीती, राजनीति हारी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 May 2025 15:55:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[स्पेशल स्रोरी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#160;रघु ठाकुर नई दिल्ली। जैसा कि अनुमान था कि भारत -पाकिस्तान के बीच का अघोषित युद्ध कुछ ही दिनों में बंद हो जायेगा, यद्यपि यह भारत की जनता की इच्छा&#8230; </p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&nbsp;रघु ठाकुर</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नई दिल्ली।</strong> जैसा कि अनुमान था कि भारत -पाकिस्तान के बीच का अघोषित युद्ध कुछ ही दिनों में बंद हो जायेगा, यद्यपि यह भारत की जनता की इच्छा नहीं थी, और न ही किसी भी समझदार व्यक्ति की, क्योंकि आजादी के बाद से लगातार देश पाकिस्तानी सीमा से तनाव-हिंसा और युद्ध झेलता रहा है। इसलिये इस बार लोगों की यह इच्छा थी कि भारत- पाकिस्तान के बीच इस संघर्ष का स्थाई हल निकल जाये। इसका मौका भी पाकिस्तान ने स्वयं दिया था जब उसने पहलगाम में 26 निर्दोष पर्यटकों को आतंकवाद का शिकार बनाया। यह आतंकवादी पाकिस्तान की सेना के ही अघोषित अंग जैसे थे और उसके कई प्रमाण भी मिले। पहलगाम में जो हथियार या गोली बगैरा मिले थे वे भी पाकिस्तानी सेना के थे। भारत के द्वारा प्रत्युत्तर दिये जाने के बाद जो आतंकवादियों के ठिकाने तबाह हुये और जो आतंकवादी मारे गये वे भी पाकिस्तानी सेना के ही थे। क्योंकि,पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के द्वारा उनके दफ नाने और सेना की सैल्यूट के जो फोटोग्राफ स्वत: पाक सेना ने जारी किये थे, उन्हें सारी दुनिया ने देखा है। पाकिस्तान का पहलगाम आतंकी हमले में हाथ होने का यह स्पष्ट प्रमाण था, जिसे झुठलाने की कोई जुर्रत पाकिस्तान नहीं कर सकता। इसलिये जब पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद की समिति की बैठक में इस मामले को उठाया तो सुरक्षा परिषद की समिति के सदस्यों को वह संतुष्ट नहीं कर सका और समिति ने कोई प्रस्ताव नहीं किया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="562" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sena3-1024x562.png" alt="" class="wp-image-22244" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sena3-1024x562.png 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sena3-300x165.png 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sena3-768x422.png 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sena3.png 1140w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">दुनिया के दो छोटे-छोटे देशों ने, जिसमें तुर्कि, व एक अन्य देश ने ही पाकिस्तान का समर्थन किया, बाकी पूरी दुनिया ने पाकिस्तान को अपराधी माना और भारत का समर्थन किया। सुरक्षा परिषद की समिति में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। दुनिया के तमाम शक्तिशाली देशों ने भारत के पक्ष में समर्थन किया और पाकिस्तान की आलोचना की। यह एक प्रकार से भारत के द्वारा की गई आक्रामक प्रतिक्रिया का समर्थन था। यहां तक कि दुनिया के इस्लामी देशों के संगठन ने भी पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया और एक प्रकार से भारत के पक्ष का ही समर्थन किया। इतना बड़ा विश्व जनमत इससे पहले कभी भी भारत के साथ नहीं था। इसलिये देश को उम्मीद थी कि भारत इस बार निर्णायक हल करेगा और 70 वर्ष पुरानी त्रृटि में सुधार कर पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेगा। यह इसलिये भी जरूरी था क्योंकि आतंकवादियों का प्रवेश द्वार पीओके ही है तथा भारत की सीमा से सटे होने की वजह से पाकिस्तान इसका इस्तेमाल एक आधार के रूप में करता है। लोगों को इस बार इसलिये भी निर्णायक हल की उम्मीद थी क्योंकि लोगों में यह जुमला चलता था कि मोदी है तो मुमकिन है&#8230;। नरेन्द्र मोदी भी जिस प्रकार पिछले तीन दशकों से आतंकवाद, पीओके, कश्मीर समस्या पाकिस्तान को लेकर पूर्ववर्ती सरकारों को कोसते रहे हैं, जो कि उचित भी था, इसलिये लोगों को उम्मीद थी कि इस बार नरेन्द्र मोदी अवश्य कुछ निर्णायक कदम उठायेंगे। घटना के बाद जिस तत्परता से नरेन्द्र मोदी ने बैठकें कीं और गोली के बदले गोला जैसे जुमले फेंके उससे देश बहुत आशान्वित था। परंतु जिस प्रकार अचानक 10 मई की शाम को भारत के डीजीएमओ की पाकिस्तान के डीजीएमओ से फोन पर बात हुयी और युद्ध विराम का निर्णय हुआ, वो न केवल लोगों को आश्चर्यजनक या उम्मीद के परे था, बल्कि नरेन्द्र मोदी की बहादुरी के प्रति निराशा पैदा करने वाला था। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तो विभाग सम्हालने के बाद से ही यह जुमला बोलते रहे हैं कि मैंने सेना को खुली छूट दे दी है&#8230;। पहली गोली हम नहीं चलायेंगे, लेकिन यदि पहली गोली दुश्मन की ओर से चलती है तो उसका कड़ा जवाब देंगे&#8230;।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहलगाम में आतंकी हमले के बाद श्री मोदी विदेश के दौरे को रद्द कर भारत आये तो उन्होंने भी यही बयान दिया कि हमने सेना को कह दिया है कि कब, कहां, कैसे करना है यह उसको तय करना है&#8230;। इसका मतलब है कि इसके पहले सेना को आतंकवादी हमलों का प्रतिकार करने की छूट नहीं थी और पिछले 10 वर्षों से रक्षामंत्री सेना को गुमराह कर रहे थे। उन्होंने सेना के बंधे हाथ खोले नहीं थे और बंधे हाथ तो पांच मई को नरेन्द्र मोदी ने खोले हैं। यह लोकतांत्रिक परम्परा थी कि प्रधानमंत्री सारे घटनाक्रम को राष्ट्रपति को ब्रीफ करते, सर्वदलीय समिति की जो बैठकें बुलाई गयीं उनमें शामिल होते और देश के नाम संदेश जारी कर तथ्यों को रखते। परंतु फि र एक बार प्रधानमंत्री ने यह बताने का प्रयास किया है कि जनतंत्र और जनतांत्रिक परम्पराये, संविधान और संवैधानिक परम्परायें उनके लिये कोई मायने नहीं रखतीं। सर्वदलीय बैठक में दिल्ली में रहते हुये भी प्रधानमंत्री का शामिल न होना क्या जनतंत्र का मजाक उड़ाना नहीं है? प्रधानमंत्री और उनका एनडीए मात्र 42 प्रतिशत मतों का प्रतिनिधित्व करता है। 58 प्रतिशत उनके और एनडीए के पक्ष में नहीं है। परंतु देश के संसदीय विपक्ष ने और छोटी बड़ी सभी पार्टियों ने बिना शर्त आवश्यक कार्रवाई करने के लिये भारत सरकार और सेना का समर्थन किया। सारी दुनिया में भारत की एकजुटता का संदेश गया। जबकि पाकिस्तान दुनिया में विभाजित नजर आया। यह एक बड़ी जनतांत्रिक उपलब्धि थी। इसके बाद भी प्रधानमंत्री ने देश की संवैधानिक परम्परा और प्रतिपक्ष का सम्मान नहीं किया। वे भूल गये कि जिन श्रीमती इन्दिरा गांधी को वे और उनकी मातृ संस्थायें तानाशाह कहती हैं, उन्होंने भी 1971 में सारे विपक्ष को साथ लेने का प्रयोग किया था। यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व से भी सम्पर्क कर सहयोग मांगा था तथा जयप्रकाश जी को भारत का पक्ष प्रस्तुत करने के लिये विश्व भ्रमण पर भेजा था। पाकिस्तान के डीजीएमओ और भारत के डीजीएमओ के बीच 10 मई की शाम पांच बजे से ही युद्ध विराम हो गया। 12 मई को फि र एक बार टेलीफोन पर औपचारिक चर्चा हुयी और सहमति हो गयी। इतनी घटनाओं के बाद 12 मई को प्रधानमंत्री ने पहली बार अपना मुंह खोला और देश के समक्ष कुछ बिंदु प्रस्तुत किये। हालांकि उनके आठ मुद्दों में कुछ भी नया नहीं है, बल्कि लगभग वही सब बातें हैं जो सरकारी पक्ष की ओर से पहले भी कही जाती रही थीं। युद्धविराम की घोषणा के समय और बाद में 12 मई को प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि अब अगर कोई हमले की घटना होगी तो उसे युद्ध माना जायेगा। अभी तक विधिवत युद्ध की घोषणा नहीं हुयी थी, जो हो रहा था वह अघोषित युद्ध था। यह भी आश्चर्यजनक था कि 10 मई के युद्धविराम की घोषणा के बाद तथा 12 मई को प्रधानमंत्री के उपदेशात्मक बयान के बाद भी पाकिस्तान की ओर से युद्धविराम का उल्लंघन हुआ है। 10 मई को युद्धविराम के बाद भी रात में पाक सेना ने भारत की सीमा में हमले किये और 12 मई को भी मीडिया के अनुसार कुछेक स्थानों पर युद्धविराम का उल्लंघन हुआ। यह युद्ध विराम वास्तव में युद्ध विराम है या युद्ध विश्राम है यह भविष्य के गर्भ में है। प्राचीनकाल में सेनायें दिन भर लड़ती थीं, रात में विश्राम करती थीं, अगले दिन की लड़ाई की तैयारी के लिये। यह युद्ध विराम भी कहीं ऐसा ही तो नहीं है जो कुछ दिन के बाद फिर नये रूप रणनीति व ताकत के साथ शुरू हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस युद्धविराम के बाद एक और नई बहस शुरू हुई है। वह यह कि भारत ने युद्धविराम का फैसला स्वेच्छा से किया या अमेरिका जैसी विदेशी शक्ति के प्रभाव में। अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति ने तो सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि उन्होंने रात भर भारत पाकिस्तान को समझाया। कुछ इस आशय की खबरें भी आयीं कि अमेरिका ने भारत को व्यापार रोकने की धमकी दी। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इसका औपचारिक खंडन किया गया है। ट्रम्प व श्री मोदी के बीच कौन सच्चा कौन झूठा की बहस होगी तो एक भारतीय होने के नाते मैं मोदी को सच्चा मानूंगा। यह भी खबरें मीडिया में आई हैं कि पाकिस्तान ने परमाणु हमले की तैयारी की थी और उसकी सूचना के बाद भारत ने युद्धविराम का निर्णय किया। श्री मोदी के बयान से कि हमें परमाणु युद्ध की धमकी न दें ,भी इस सूचना की पुष्टि जैसी है। मैं नहीं जानता कि यह कितनी सही है। परंतु अगर यह सही है तो फिर भारत के राजनेताओं को यह भी मालूम होना चाहिए कि गांधी-लोहिया-और उनके अनुयायी के रूप मैं यह लिखता कहता रहा हूं कि परमाणु हथियार के बाद भारत पाकिस्तान बराबरी के मुकाबले में आ गये हैं। इसके पूर्व परम्परागत युद्धों में भारत लगातार जीता है, ताकतवर सिद्ध हुआ है। श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री अटल बिहारी वाजपेई से श्री मोदी तक परमाणु परीक्षण को भारत की महान ताकत बताने वाले संघ को इसका उत्तर देना चाहिए। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने जिस प्रकार अचानक पाकिस्तान को युद्ध के बीच हजारों करोड़ का कर्ज मंजूर किया और आईएमएफ की मीटिंग में भारत अकेला अलग थलग रह गया। दुनिया के सभी सदस्य देशों ने कर्ज मंजूरी को स्वीकृति दी। क्या यह अंतरराष्ट्रीय दबाव बनने का कारण नजर नहीं आता? विश्व शक्तियां केवल अपने स्वार्थ या देश हित को ही लड़ती हैं किसी दूसरे को नहीं। जो प्रधानमंत्री दिन रात विश्वनेता-विश्वगुरु का खिताब लिए घूमते हैं उन्हें समझना चाहिए कि दुनिया के देश अपने राष्ट्रीय हितों से चलते हैं न कि दूसरे के। तारीफें तो व्यापार के सौदा पटाने की चीज रहती हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि देश इस बार श्री मोदी को सच्चा नहीं मान रहा। इसकी वजह भी है कि जब हमला करने का फैसला भारत सरकार के निर्णय के आधार पर हुआ तो युद्धविराम का फैसला डीजीएमओ कैसे कर सकता है ? पाकिस्तान के लिए तो यह माना भी जा सकता है क्योंकि वहां सेना का नियंत्रण है। परंतु भारत में तो सारे निर्णय राजसत्ता ही करती है। यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि भारत सरकार और प्रधानमंत्री की सहमति के बगैर भारत के डीजीएमओ केवल एक पाकिस्तान के समकक्ष अधिकारी के फोन पर युद्धविराम तय करे। देश के आम लोगों में यह शक है कि भारत सरकार और प्रधानमंत्री ने अपनी नाक ऊंची दिखाने के लिए यह रास्ता निकाला कि पाक सैन्य अधिकारी फोन करें और भारत का सैन्य अधिकारी उसे मान ले। अगर यह सैन्य अधिकारी का निर्णय है फिर तो यह भारत की राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध विद्रोह जैसा होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रधानमंत्री को देश को यह बताना चाहिये कि यह युद्धविराम क्यों स्वीकार किया गया? क्या भारत का लक्ष्य पीओके को वापस लेना नहीं है? वो कौन से कारण हैं जिनके चलते यह युद्धविराम स्वीकार किया, जबकि सरकार के मुताबिक और भारतीय मीडिया के मुताबिक भारत इकतरफ ा जीत रहा था। यहां तक कि मीडिया के एक बड़े हिस्से के द्वारा तो यह भी बताया जा रहा था कि पाकिस्तान कांप रहा है, वहां की सेना का मुखिया छिप गया है, वहां के सांसद रो रहे हैं, वहां के प्रधानमंत्री घबड़ा रहे हैं, पाकिस्तान प्यासा मरने वाला है आदि -आदि। मैं मान लेता हूं कि भारत का योग्य और ईमानदार मीडिया यह खबरें सच ही दे रहा था तो उस मीडिया को बताना चाहिये कि एक सप्ताह के संघर्ष व युद्ध से भारत को क्या हासिल हुआ? पाकिस्तान के100 लोग मरे। भारत के 40 जवान शहीद हुये या 26 हत्याओं का बदला 100 को मारकर लिया। ये सब खबरें उत्साह व युद्धकाल की हो सकती हैं परंतु इनसे कोई निर्णायक हल नहीं निकलता। भारत की सेना ने अपने गौरवमय इतिहास को कायम रखते हुये फिर एक बार निर्णायक युद्ध की ओर कदम बढ़ाया था पर भारत के कमजोर राजनीतिक नेतृत्व, असफ ल कूटनीति, अदूरदर्शी विदेश नीति, व्यक्तिवाद ने जीते हुये देश व सेना को उसी प्रकार की पराजय की ओर ढकेल दिया है जैसा नेहरू के जीवनकाल में यूएनओ को प्रस्ताव देकर दिया गया था। 1965 में ताशकंद में समझौता स्व लालबहादुर शास्त्री ने किया था, 1971 में स्व. श्रीमति इंदिरा गांधी ने शिमला समझौता किया था व स्व. अटलजी के कार्यकाल में संसद पर हमले के बाद आर-पार के जुमले का हश्र हुआ था। वही अब श्री मोदी के कार्यकाल में गोली बनाम गोला का हश्र हुआ है। सेना जीतती है और राजनीति हारती है। यह भारत की कूटनीति और विदेश नीति की हार है, जिसे देश निरंतर झेलने को अभिशप्त है।</p>
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		<title>पहलगाम के आंसू और सिंदूर की ज्वाला&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 May 2025 13:01:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अनिल शर्मा नई दिल्ली। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ हमला भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नये और भयावह मोड़ का प्रतीक बन गया। इस निर्मम घटना में&#8230; </p>
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<p class="wp-block-paragraph"><br><strong>अनिल शर्मा</strong></p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-background-color has-background wp-block-paragraph"><strong>नई दिल्ली।</strong> 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ हमला भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नये और भयावह मोड़ का प्रतीक बन गया। इस निर्मम घटना में 26 निर्दोष पर्यटकों की जान गयी, जिन्हें केवल उनके धर्म के आधार पर चुन-चुनकर मारा गया। आतंकियों ने पहले लोगों से उनका धर्म पूछा और जो लोग मुस्लिम धर्म की कलमा पढऩे या अन्य धार्मिक गतिविधियां निभाने में असमर्थ पाये गये, उन्हें बेरहमी से गोली मार दी गयी। यह हमला न सिर्फ एक आतंकवादी कार्रवाई थी, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष अस्मिता पर किया गया सीधा हमला था। आतंकवाद अब केवल राजनीतिक या सामरिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि वह धार्मिक कट्टरता और मानवता के मूल्यों के पूर्ण पतन का रूप ले चुका है। इस हमले ने न केवल देश को आक्रोशित किया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद अब इतनी गहराई तक जा चुका है कि वह निर्दोष नागरिकों की धार्मिक पहचान को निशाना बनाकर समाज में भय और नफरत फैलाना चाहता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="576" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sindoor12-1024x576.jpg" alt="" class="wp-image-22081" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sindoor12-1024x576.jpg 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sindoor12-300x169.jpg 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sindoor12-768x432.jpg 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/sindoor12.jpg 1195w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="has-luminous-vivid-orange-background-color has-background wp-block-paragraph">भारत ने इस हमले को अपनी संप्रभुता और सामाजिक एकता के खिलाफ माना और इसके बाद लिये गये निर्णयों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब हर हमले का जवाब निर्णायक और नीतिगत तरीके से दिया जायेगा। भारत सरकार ने तीव्र प्रतिक्रिया देते हुये सैन्य स्तर पर एक व्यापक कार्रवाई की योजना बनायी। इस सटीक और गोपनीय सैन्य कार्रवाई को नाम दिया गया- ऑपरेशन सिंदूर। यह नाम प्रतीक था भारत की सांस्कृतिक विरासत का, जिसमें सिंदूर शक्ति, सम्मान और संरक्षण का प्रतीक है। ऑपरेशन सिंदूर न केवल आतंक के विरुद्ध सर्जिकल कार्रवाई थी, बल्कि यह उन निर्दोष नागरिकों को सच्ची श्रद्धांजलि भी थी, जिन्होंने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की बलि चढकऱ अपना जीवन खोया। 7 मई 2025 की सुबह जब देशवासी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त थे, मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत के मिशन सिंदूर की खबरों ने भारत के जनमानस का सीना चौड़ा कर दिया। भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की संयुक्त रणनीति ने 6 मई 2025 रात्रि को पाकिस्तान के भीतर 9 प्रमुख आतंकवादी ठिकानों पर जोरदार हमला कर दिया। यह हमले न केवल लाइन ऑफ कंट्रोल के पास स्थित आतंकी लॉन्चपैड्स पर किये गये, बल्कि पाकिस्तान के भीतरी हिस्सों में भी उन ठिकानों को टारगेट किया गया, जो लंबे समय से आतंक की फैक्टरी बने हुये थे। ऑपरेशन सिंदूर के तहत जिन 9 ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की गयी, वे थे, बहावलपुर-जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय। मुरीदके- लश्कर-ए-तैयबा का आधार स्थल, जो 2008 मुंबई हमले से जुड़ा रहा है। गुलपुर- नियंत्रण रेखा के पास स्थित वह अड्डा, जहां से 2023-24 के हमलों की योजना बनी। सावाई- जहां से तीर्थयात्रियों पर हमलों की साजिश रची गयी। बिलाल- जैश का प्रमुख लॉन्चपैड। कोटली &#8211; हिज्बुल मुजाहिदीन की उपस्थिति वाला अड्डा। बरनाला, सरजाला और महसुन्ता &#8211; आतंकी ट्रेनिंग और लॉन्चिंग सेंटर। इन हमलों में अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग किया गया। दूरवर्ती स्थानों को मिसाइलों और ड्रोन हमलों द्वारा ध्वस्त किया गया। खास बात यह रही कि इस पूरे ऑपरेशन में भारतीय पक्ष को कोई नुकसान नहीं हुआ, और सभी सैनिक सुरक्षित वापस लौटे। भारतीय सेना आज विश्व की सबसे शक्तिशाली और संगठित सेनाओं में से एक मानी जाती है। इसकी ताकत न केवल इसके अत्याधुनिक हथियारों, तकनीकी क्षमताओं और रणनीतिक कौशल में निहित है, बल्कि उस अडिग संकल्प में भी छुपी है जो हर भारतीय सैनिक की रगों में बहता है। भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और जनमानस की एकता पर यदि कोई खतरा मंडराता है, तो भारतीय सेना उसका जवाब शौर्य और संयम के अदभूत संतुलन के साथ देती है। वर्ष 2014 के बाद देश ने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं, चाहे वह उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक हो, पुलवामा के बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक या हाल ही में पहलगाम हमले के पश्चात ऑपरेशन सिंदूर, हर बार भारतीय सेना ने यह सिद्ध किया है कि भारत अब केवल सहन नहीं करेगा, बल्कि हर आघात का उत्तर निर्णायक रूप से देगा। वर्ष 1947 का भारत-पाक विभाजन केवल दो राष्ट्रों का निर्माण नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी घटना थी जिसने उपमहाद्वीप को खून से रंग दिया। पाकिस्तान ने अपने निर्माण के तुरंत बाद ही भारत विरोधी गतिविधियां शुरू कर दीं। 1947, 1965 और 1971 में उसने सीधे युद्ध छेड़े। 1999 में कारगिल में तो उसने गुपचुप तरीके से घुसपैठ कर युद्ध का षड्यंत्र रचा, जिसे भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया। इन सभी युद्धों में भारत ने विजय प्राप्त की, परंतु हर बार भारत ने युद्ध के बजाय शांति की पहल की। लेकिन पाकिस्तान ने इस सदभावना का बदला आतंकवाद से दिया। उसकी सेना और आईएसआई लगातार जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल जैसे संगठनों को पैसा, प्रशिक्षण और संरक्षण देती रही। मुंबई हमले, उरी हमला, पुलवामा विस्फोट और अब पहलगाम कांड, हर घटना में पाकिस्तान की भूमिका उजागर होती रही है। भारत एक शांति प्रिय राष्ट्र है, लेकिन जब देश की संप्रभुता, नागरिकों की सुरक्षा और मानवता पर आघात होता है, तब भारत यह भी दिखाता है कि वह केवल सहनशील ही नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम राष्ट्र है। ऑपरेशन सिंदूर इसी रणनीतिक और सांस्कृतिक सोच का परिणाम है। पहलगाम हमला और ऑपरेशन सिंदूर एक नये युग की शुरुआत है। यह युग है आत्मरक्षा के अधिकार के उपयोग का, कू टनीति और शक्ति के संतुलन का, और आतंक पर बिना समझौते की नीति का।भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं करता, वह भविष्य की संभावित साजिशों को रोकने के लिये भी तत्पर है। यह संदेश स्पष्ट है कि भारत अब हर गोली का जवाब गोली से, और हर आतंकी योजना का जवाब निर्णायक सैन्य रणनीति से देगा। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों ने न केवल पाकिस्तान को चेतावनी दी है, बल्कि भारतीय नागरिकों के मन में विश्वास भी जगाया है कि उनका देश अब चुप नहीं बैठेगा। पहलगाम के निर्दोषों की हत्या ने भारत को झकझोर कर रख दिया, लेकिन उसी आघात ने ऑपरेशन सिंदूर जैसी सटीक और निर्णायक प्रतिक्रिया को जन्म दिया। यह केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक चेतना, राष्ट्रीय संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा का प्रतीक है। अब आतंकवाद को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।</p>
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		<title>भारत माता की जय… वीर जवानों के शौर्य को सलाम !</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 May 2025 12:47:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>लखनऊ।</strong> भारतीय सेना ने पहलगाम आतंकी हमले का बदला ले लिया है। मंगलवार आधी रात को भारतीय सेना ने &#8216;ऑपरेशन सिंदूर&#8217; को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर हमला करके पहलगाम में अपने सुहाग को गंवाने वाली 26 मां-बहनों का बदला पूरा किया। हिंदू धर्म में सिंदूर और सौभाग्य का बड़ा महत्व है। पाक पोषित आतंकवादियों ने जब उनके सिंदूर से खेल खेला, तो उस सिंदूर से निकली बदले की ज्वाला पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकी शिविरों तक पहुंच गयी। भारतीय सेना के हमले में पाकिस्तान के ये अमानवीय शिविर तो नष्ट हुये ही, साथ ही पाकिस्तान की सरकार,वहां के आतंकियों के आका, पाकिस्तान की नापाक सेना बिल में जाकर छिप गये। भारतीय सेना ने ऐसा शौर्य दिखाया कि हर भारतीय को इस पर गर्व होना चाहिये।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="696" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/bharat-mata31-1024x696.jpg" alt="" class="wp-image-22078" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/bharat-mata31-1024x696.jpg 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/bharat-mata31-300x204.jpg 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/bharat-mata31-768x522.jpg 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/bharat-mata31.jpg 1155w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी गुटों के शिविर नष्ट कर दिये गये हैं। पाकिस्तान सो रहा था और उन पर बम गिर रहे थे। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को प्रतिरोध करने का मौका भी नहीं दिया। &#8216;ऑपरेशन सिंदूर&#8217; में भाग लेने वाले सभी भारतीय &#8216;पायलट&#8217; और लड़ाकू विमान सुरक्षित वापस लौट आये। इसका मतलब यह है कि भारतीय सेना ने पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारा और सुरक्षित भारत लौट आयी। पाकिस्तान को उसके कर्मों का फल मिला। आगे भी मिलता रहेगा। आतंकवादियों को पालने वाला देश जैसी पाकिस्तान की छवि है। ऐसा वैसे है कि दुनिया भर के इस्लामी आतंकवादी पाकिस्तान में ही शरण लेते हैं? पाकिस्तान के बेदिमाग शासक इसका जवाब नहीं दे पाये। अमेरिका पर हमला करने वाला अलकायदा सरगना लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ था। अमेरिकी कमांडोज ने पाकिस्तान में घुसकर लादेन को मार गिराया। &#8216;लादेन पाकिस्तान में नहीं है। पाकिस्तान में कोई भी आतंकवादी नहीं है,&#8217; ऐसा कहने वाले पाकिस्तान का मुखौटा इस प्रकार कई बार फाड़ा गया है। हिंदुस्तान पर आतंकवादी हमलों के मास्टरमाइंड मौलाना मसूद अजहर, हाफिज सईद पाकिस्तान में ही शरण लिये हुये हैं। भारत के गुनहगारों को भारत के हवाले करने में ही पाकिस्तान की भलाई थी, लेकिन पाकिस्तान ने वैसा नहीं किया। इन सभी आतंकियों को &#8216;स्वतंत्रता सेनानी&#8217; का दर्जा देने की नादानी उन्होंने की। पहलगाम हमले में स्वतंत्रता सेनानियों का हाथ होगा, ऐसा बेतुका बयान पाक के मंत्रियों ने दिया। पाकिस्तान कभी एक देश के रूप में उभर ही नहीं पाया। धार्मिक द्वेष से पैदा हुये कट्टरपंथियों का पनाहगाह है पाकिस्तान, यही पाकिस्तान के बारे में कहा जा सकता है। आमने-सामने के युद्ध में पाकिस्तान कभी भी जीत नहीं पायेगा। इसलिये आतंकवादियों को रसद उपलब्ध कराकर भारत में हमले करने का रास्ता उन्होंने अपनाया। तीन युद्धों में पाकिस्तान को धूल चटाने के बावजूद उसकी पूंछ सीधी नहीं हुयी। भारतीय सेना दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना है और संकट के समय राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर देश एकजुट हो जाता है, यह तस्वीर पहलगाम हमले के बाद एक बार फिर दिखायी दी। राजनीति करने के जो कई तरीके हैं, उनमें से युद्ध भी एक तरीका है। इस उपाय का सहारा कभी न कभी तो लेना ही पड़ता है। पाकिस्तान जैसे राष्ट्र जब तक अस्तित्व में हैं, तब तक दुनिया में कहीं न कहीं तो युद्ध होते ही रहेंगे। भारत बुद्ध का देश है, लेकिन अगर कोई हमारे निर्दोष नागरिकों की जान अनायास ले रहा है, तो हमें बुद्ध को नमस्कार करके युद्ध का रास्ता अपनाना ही पड़ेगा। जो लोग युद्ध को बहुत बड़ा पाप और शांति और धैर्य को बहुत बड़ा पुण्य समझते हैं, उन्हें उन 26 बदकिस्मत बहनों की उजड़़ी हुई मांग को देखना चाहिये। इसलिये भारत को राष्ट्रहित में पाकिस्तान पर बम गिराने पड़े। पाकिस्तान में लडऩे की क्षमता नहीं है। पाकिस्तान की युद्धनीति चीन जैसे राष्ट्र पर निर्भर है। चीन ने पाकिस्तान को कुछ लड़ाकू विमान उपलब्ध कराये थे। उनमें से एक &#8216;जेएफ-17&#8217; लड़ाकू विमान को भारत ने पहले ही दिन मार गिराया। पाकिस्तान के पैर अभी से ही कंपकंपाते नजर आ रहे हैं। युद्ध अभी शुरू होना बाकी है। अभी केवल आतंकी वैंसपों पर ही हमले हुये हैं। पाक की नागरिक बस्तियों और सैन्य ठिकानों पर हमला नहीं हुआ है। मसूद अजहर और हाफिज सईद को ही निशाना बनाया गया है। कल के हमले में मसूद अजहर के रिश्तेदार मारे गये और उसके बाद उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले इस नराधम की आंखों से बहते आंसू देखकर पहलगाम की पीडि़त &#8216;आत्माएं&#8217; भारतीय सेना पर फूल बरसा रही होंगी। हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे लोगों का पूरी तरह से सफाया ही भारतीय सेना का &#8216;टार्गेट&#8217; होना चाहिये। पाकिस्तान अब एक राष्ट्र न होकर दुनिया के लिये बोझ बनी आतंकवादियों की भूमि बन गया है। अब इनका पूरी तरह से सफाया करना जरूरी है। कितने निरपराध मारे जायेंगे? कितनी मां-बहनों का सिंदूर मिटेगा? ये सब अब खत्म होना चाहिये। आतंकियों के आठ-नौ वैंसप नष्ट हो गये तब भी पाकिस्तान एक आतंकवादी पैदा करने वाली फैक्ट्री है, इस फैक्ट्री को ही नष्ट कर देना चाहिये। भारतीय सेना ने उस दिशा में कदम बढ़ाये हैं। पूरा देश भारतीय सेना का अभिवादन कर रहा है। आपके शौर्य को सलाम!</p>
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		<title>नई दिल्ली में होंडुरास दूतावास का उद्घाटन, द्विपक्षीय व्यापार को मिलेगा बढ़ावा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[The Sunday Views]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 May 2025 12:39:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बड़ी खबर]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शाश्वत तिवारी नई दिल्ली। मध्य अमेरिकी देश होंडुरास के दूतावास का उद्घाटन गुरुवार को नई दिल्ली में हुआ। होंडुरास के विदेश मंत्री एडुआर्डो एनरिक रीना गार्सिया ने अपने भारतीय समकक्ष&#8230; </p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>शाश्वत तिवारी</strong></p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color wp-elements-7 wp-block-paragraph"><strong>नई दिल्ली।</strong> मध्य अमेरिकी देश होंडुरास के दूतावास का उद्घाटन गुरुवार को नई दिल्ली में हुआ। होंडुरास के विदेश मंत्री एडुआर्डो एनरिक रीना गार्सिया ने अपने भारतीय समकक्ष डॉ. एस. जयशंकर की मौजूदगी में दूतावास का उद्घाटन किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस कदम को भारत और होंडुरास के बीच मधुर एवं मैत्रीपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="843" src="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/ll7-1024x843.jpg" alt="" class="wp-image-22075" srcset="https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/ll7-1024x843.jpg 1024w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/ll7-300x247.jpg 300w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/ll7-768x632.jpg 768w, https://thesundayviews.com/wp-content/uploads/2025/05/ll7.jpg 1337w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="has-vivid-green-cyan-color has-text-color has-link-color wp-elements-8 wp-block-paragraph">दूतावास के उद्घाटन समारोह के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा नई दिल्ली में होंडुरास का दूतावास खुलने से व्यापार को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। व्यापारियों को दूतावास को मैचमेकिंग के लिए एक केंद्र के रूप में उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जो अधिक पहल गतिविधियों और जुड़ावों को करने के लिए संस्थागत समर्थन प्रदान करेगा।</p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color wp-elements-9 wp-block-paragraph">विदेश मंत्री जयशंकर ने पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले के विरोध में होंडुरास की एकजुटता की प्रशंसा करते हुए कहा हम विशेष रूप से आतंकवाद के सभी रूपों के विरोध में आपकी सार्वजनिक प्रतिबद्धता की सराहना करते हैं।</p>



<p class="has-vivid-green-cyan-color has-text-color has-link-color wp-elements-10 wp-block-paragraph">उद्घाटन समारोह के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा यह उद्घाटन हमारी साझेदारी में एक नया मील का पत्थर है, जो आपसी सम्मान और आपसी प्रतिबद्धता पर केंद्रित है। स्वास्थ्य, डिजिटल, क्षमता विकास, ऊर्जा और आपदा प्रतिक्रिया में संभावनाओं सहित वैश्विक दक्षिण भागीदारों के रूप में सहयोग पर चर्चा की।</p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color wp-elements-11 wp-block-paragraph">कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर से सटे होंडुरास और भारत के बीच सौहार्दपूर्ण एवं मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं तथा पिछले कुछ वर्षों के दौरान दोनों देश और करीब आए हैं और इस दौरान भारत का होंडुरास को निर्यात धीरे-धीरे बढ़ रहा है। भारत की ओर से फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटोमोबाइल &#8211; दो और तीन पहिया वाहनों के साथ ही कार, लोहा एवं इस्पात, औद्योगिक मशीनरी और पुर्जे, विद्युत मशीनरी आदि होंडुरास को निर्यात किए जाने वाले शीर्ष उत्पाद हैं।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color wp-elements-12 wp-block-paragraph">जब होंडुरास कोविड-19 संकट का सामना कर रहा था, तब भारत सरकार ने उसे आवश्यक दवाएं दान की थीं। इसके साथ ही होंडुरास ने पिछले कई वर्षों में बहुपक्षीय मंचों पर भारत का लगातार समर्थन किया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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