सुर और ताल मे पिरोकर, अपनी संस्कृति, अपने संस्कार, अपने भाव, अपने मान ।
गाते – थिरकते लोकगीतों मे बसती, हर देश- प्रदेश- नगर- गाँव की अपनी पहचान ।।

मीरा श्रीवास्तव
अप्सरा आली इंद्रपुरीतून खाली,पसरली लाली रत्नप्रभा तनु ल्याली
ती हसली गाली चांदणी रंगमहाली, अप्सरा आली पुनवचांदणं न्हाली…
Folk song: इस धमाकेदार गीत के बजते ही पूरे माहौल मे सर्दी की रात मे गर्मी दौडऩे लगी। साथ ही महिलाओं के नौ मीटर की नववारी सारी का फेटा कस कर पहनना, पाँवों मे लच्छेदार घुंघरू और तेज ढोलकी पर ऊर्जावान नृत्य करना हम यू. पी. वालों को झूमने पर मजबूर कर दिया। वहां हम लड़की वाले बन कर गए थे , हम यू. पी. की लड़की और महाराष्ट्र के नासिक का लड़का, भगवान ने क्या जोड़ी बनाई थी…। अपने देश के दो अलग- अलग संस्कृतियों का ऐसा मेल कराया, जिसमें हम दोनों परिवारों को प्रेम की अमर माला में गूँथ दिया…। नई संस्कृति में शादी के रस्मों को देखने के लिए हम सब बहुत उत्साहित थे । आज हल्दी, संगीत- नृत्य का दिन था, आरंभ लड़के वालों के लावणी गीत से ही हुआ। लावणी महाराष्ट्र का सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोकगीत और नृत्य है। यह अपनी तेज लय, ऊर्जावान संगीत और सुंदर भाव भंगिमाओं के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। लावणी शब्द लावण्य से बना है, जिसका अर्थ सौंदर्य (खूबसूरती) होता है। यह गीत ढोलकी की थाप पर बहुत तेज गति में गाया जाता है। इस कला को पेशवा राजाओं के समय मे बहुत बढ़ावा मिला था,सैनिकों का जोश बढ़ाने के लिए गाया जाता था।

लावणी आज भी महाराष्ट्र की संस्कृति का बहुत बड़ा हिस्सा है, इसमे ढोलकी की थाप पर पारिवारिक प्यार, राजनीतिक, सामाजिक और समसामयिक मुद्दों और प्रेम प्रसंगो को व्यक्त किया जाता है। अब इतने ऊर्जावान प्रस्तुति के बाद कौन रुक सकता था…। मंच के नीचे ही अपने- अपने स्थान पर अलग – अलग राज्यों से आए हुये हमारे मित्रों के, हमारे परिवार वालों के लोक गीत और नृत्य आपस मे गूथने लगे…। तब अलग- अलग प्रदेशों से आए हुये मेहमानों को आगे किया गया, आखिर हमलोग नवाबी (उत्तर प्रदेश) से थे, पहले आप … पहले आप … ये ही तो हमारी पहचान है। जबतक हमलोग समझ पाते कि पहले मंच पर किसको भेजें, किसको भेजे तब तक मंच पर रंग- बिरंगे घाघर- चुनर आभूषणों से सजी हुई हमारी बेटी की सखियाँ गोल- गोल थिरकते हुये दिखीं और उनके गीत बजते ही सब झूम उठे … अरे ये तो राजस्थानी लोकगीत है…
हो, लुक-छिप ना जाओ जी,म्हाने दीद कराओ जी अरे, क्यों तरसावे हो ?
म्हाने शकल दिखावो जी थारी शरारत सब जाणूं मैं, चौधरी, म्हारे से लेवो ना पंगा जी, मैं कहन लगे..।
म्हारे हिवड़े में जागी धोंकनी, रे चंदा मैं थारी चाँदनी म्हाने दामन में बांधी खुशी, रे झूम, झूम, झूम, झूम बा झूम… झूम- झूम
ने तो सबको घूमा के रख दिया। यह उल्लासपूर्ण गीत राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोक गीत और लोकनृत्य है यह विशेष रूप से महिलाओं- पुरुषों द्वारा उत्सवों, विवाह समारोहों और तीज- त्योहारों के अवसर पर गाया और नाचा जाता है। ये गीत राजस्थान की लोक संस्कृति और लोक भावनाओं को जीवंत बनाए रखते हैं। राजस्थानी गीत हमारे फिल्मों में ही नहीं, देश- विदेशों तक धूम मचा रखे हैं। अभी सब झूम ही रहे थे कि दृश्य बदल गया, लड़कियों के स्थान पर बेटी का मित्र जो उत्तरांचल क्षेत्र से आया था,धोती- कुर्ता- टोपी और शॉल पहने था, उसने हमारे बेटी और दामाद को मंच पर बुला, सबको आनंदित कर दिया…
तेरो लहंगा… लहंगा तेरो… लहंगा… तेरो लहंगा … लहंगा…
तेरो लहंगा… तेरो लहंगा… तेरो लहंगा॥ क्या भालो छजी रे ओ …
रंगीली पिछोड़ी… हाय – हाय … जरा आँखों मे … लगाले काजला …
नजर लागली… नजर लागली … नजर लागली… तेरो लहंगा …
घूमते हुये लहंगे ने इतना घूमा दिया कि घरवालों को लगा कि अब अपनी नई नवेली दुल्हन और दूल्हे राजा को अपने पैतृक जन्म स्थान उत्तर प्रदेश से आशीर्वाद दिया जाए। फि र दुल्हन की बहनों की टोली चल पड़ी मंच की ओर, और जैसे ही दुल्हन की बड़ी बहन आयुषी भटनागर जो की म्यूसिक फ ॉर वेलनेस प्रोग्राम की प्रसारक है, ने सलोनी ठक्कर के गीत को शुरू किया, ऐसा लगा हम सब नासिक नहीं बल्कि मिथिला पहुंच गए…
तुम उठो सिया श्रृंगार करो अब धनुष राम ने तोड़ा है तोड़ा है भाई तोड़ा है
सीता से नाता जोड़ा है माठ सिया के टीका सोहे कुंडल की छवि अति न्यारि है
न्यारि है भाई न्यारि है रघुवर को जानकी प्यारी है… तुम उठो सिया श्रृंगार करो...
गुजरात का सबसे प्रसिद्ध लोकप्रिय गरबा गीत, असम का लोकप्रिय बीहू, रात तक कार्यक्रम, बहुत सुंदर ढंग से चलता रहा। गीत – संगीत का कार्यक्रम इतना मनमोहक था कि किसी गीत पर लोग झूम उठते थे तो किसी पर आंखो मे आँसू भर जाते थे, ऐसा ही होता है, हमारा लोक संगीत, लोक जीवन की भावनाओं, परम्पराओं और संस्कृति का दर्पण होता हैं। भारत के विभिन्न राज्यों मे अलग-अलग प्रकार के लोकगीत प्रचलित हैं । विवाह , देवी पूजन, जन्म, फसल कटाई, त्योहारों, सुख- दुख और अन्य शुभ अवसरों पर लोक गीत गाए जाते हैं । गीत शब्द की बात करें तो सुनते ही मन में कुछ हलचल सी होने लगती है । हम सभी अपनी जिंदगी को हसीन खुशनुमा बनाने के लिए गाहे- बगाहे गीत – संगीत, कविता, गजल आदि से एक रिश्ता तो रखते ही हैं । लोकगीत जो एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक मौखिक रूप से चलती चली आ रही है वह लोक ग़ीत दो शब्दों से बना है …। लोकगीत अर्थात एक क्षेत्र विशेष , जिसकी एक संस्कृति, एक भाषा, एक परंपरा हो, उस क्षेत्र विशेष के हृदय के भावों को, उल्लास को गीत के रूप मे गाना ही लोक गीत है।

लोक गीत की अगर उत्पत्ति की बात करें तो यह अंग्रेजी के फ ोल्क, विसा शब्द का पर्याय है। फ ोल्क शब्द की जड़ें भी बहुत गहरी हैं, फ ोल्क शब्द जर्मन के वोल्क, अवसा शब्द से बना है, इस शब्द का प्रयोग बहुत प्राचीनकाल से किया जाता रहा है, जिसका अर्थ है सामान्यजन,जनसाधारण…। जैसे अब्राहम लिंकन की परिभाषा – जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा-जनतंत्र होता है, वैसे ही हमारे ‘हिन्दी साहित्य कोश’ मे इसके तीन अर्थ बताए गए हैं- श्लोक में प्रचलित,लोक द्वारा निर्मित,लोक विषयक गीत -‘लोकगीत’ ।

इनसाइक्लोपीडिया मे कहा गया है आदिम मानव का उल्लासमय गीत लोक गीत है। कितना सही कहा गया है… आदिवासियों का गीत … न कोई भाषा न कोई संगीत फि र भी जब वो उत्साहित होते थे या समूहिक रूप से किसी काम को करते थे तो उनके मुख से अनायास लय बद्ध बोल निकलने लगते थे, जो धीरे- धीरे आगे चल कर उनका लोकगीत बना , जिसे सुनो तो भाषा (शब्द) भले ही समझ न आए पर उनके गीतों में उनका भोलापन निश्छलता साफ दिखाई पड़ता है। हमारी संस्कृति में लोकगीत कितना पुराना है, इसे बताया नहीं जा सकता। सबसे प्राचीन वेदों की बात करें तो इनके पवित्र मंत्र भी लयबद्ध गाये जाते थे और एक दूसरे तक सुन कर ही आगे बढ़े थे। इसीलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है। वेदों में सामवेद में गीत संगीत लय आदि का समग्र वर्णन पाया जाता है। इस प्रकार हमारे देश भारत मे हर भाषा के अपने- अपने लोकगीत हैं, जिसने देश और विदेशों में अपना धूम मचा रखा है। इसमें हमारे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोक गीत का अपना अलग ही स्थान है।

उत्तर प्रदेश और बिहार अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां के गीत संगीत अपनी मिट्टी, त्योहारों , ऋतुवों, उत्सव और लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। लोकगीत लोगों के सुख- दुख और रोज़मर्रा की जिंदगी को बताते हैं। इसे ज़्यादातर ढोल, मंजीरा और हारमोनियम के साथ गाते हैं । सबसे प्रसिद्ध लोकगीतों में कजरी, चैती, सोहर, बिरहा, सुमंगली ,कोहबर,महेश गीत, छठ गीत, रोपणी- कटनी,विदेसिया, जाट, जतिन आदि लोकगीत हैं । कजरी- सावन और विरह के गीत, कजरी लोकगीत का संबंध भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के साथ – साथ बिहार से भी है। पारंपरिक रूप से बनारस , मिर्जापुर, मथुरा, इलाहाबाद और बिहार के भोजपुर अंचल के आसपास के गांवों, कस्बों में सावन का अर्थ केवल वर्षा नहीं , बल्कि कजरी है। कजरी को समझने के लिए बारिश को महसूस करना पड़ता है। जब काले बादल मंडराते हैं, जब गंगा किनारे पुरवैया बहती है , जब आम और नीम की डालियों पर झूले पड़ते हैं और जब धरती वर्षा के पहले बूंदों से महक उठती है, तो कजरी जन्म लेती है। कजरी मे वर्षा का सौंदर्य है, लेकिन उससे भी अधिक इसमे मन का मौसम है। सावन के महीने में महिलाओं द्वारा झूला झूलते हुये दिन भर कजरी गाया जाता है। हंसी- ठिठोली चलता रहता है…।
कैसे खेले जाइबु सावन में कजरिया बदरिया घेरी आइल ननदी
तू तो जात हो अकेली कौनों संग न सहेली गुंडा रोक लिहे
तोहरी डगरिया बदरिया घेरी आइल ननदी कैसे खेले जइबु …
चैती … अगर कजरी सावन की आत्मा है, चैती चैत्र मास की सांस है। चैत्र का मास हम सनातनियों का नूतन वर्ष है जिसका आरंभ दुर्गा नौरात्रि से किया जाता है। पूरे देश में चइतनौमी की पूजा, देवी गीत गुंजायमान है, लोक जीवन में भक्ति का उल्लास है…
देवी गीत ढोलक बजाऊं सारी रात, मैयाजी तुमको सोने न दूंगी सोने न दंूगी
मैया सोने न दूंगी भजन सुनाऊं सारी रात मैया जी तुमको सोने न दूंगी…
चैत में खेतों मे गेहूं, सरसों की कटाई का सामूहिक जोश है।
आम के बौर की सुगन्ध है,कोयल की कूक है , यह वो क्षण है जब सर्दी की स्मृतियां विदा ले रही होती हैं और प्रकृति एक नए चक्रके लिए स्वयं को तैयार कर रही होती है। यह केवल ऋ तु परिवर्तन का गीत नहीं, बल्कि आशा , नवजीवन और उत्सव का संगीत है। चैट में श्री राम का जन्म होने से राम नौमी के गीत भी गाए जाते हैं । साथ ही रामनौमी के चौथे दिन जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर का जन्मदिन होता है। कई रचयिताओं ने उनके जन्म को भी चैती में ढाला है ।
छठ गीत– सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों मे मनाया जाता है। दीपावली के छठे दिन से शुरू होने वाला छठ का पर्व चार दिनों तक चलता है। छठ का पर्व एक कठिन पर्व है, जिसमें षष्ठी भगवती की पूजा कर के पुत्र, पति एवं परिवार के कल्याण की कामना की जाती है। यह एक मात्र ऐसा पर्व है जो हमारे वैदिक काल से चला आ रहा है । यह पर्व ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन, उषा पूजन तथा आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। छठ के गीतों मे सबसे प्रचलित गीत है…
कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय होई न बलम जी कहरीय,
बहगी केकरा के जाए तू तो आंधर होवे रे बटोहिया, बहगी
छठी मैया के जाय ओहरे जे बारी छठी मैया, बहंगी उनका के जाए , कांच ही बांस के बहंगिया…।

लोकगीतों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उन्होंने उन आवाजों को संरक्षित किया जिन्हें इतिहास की पुस्तकों मे स्थान नहीं मिला। ग्रामीण स्त्रियां, जो अक्सर अपने अनुभव लिख नहीं सकती थीं, उन्होंने अपने सुख- दुख, प्रेम , विरह, सपनों और सामाजिक अनुभवों को गीतों मे सुरक्षित रखा। इस दृष्टि से कजरी, चैती, सोहर, विवाह गीत केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां नही बल्कि भारतीय महिलाओं की मौखिक आत्म कथाएं भी हैं। लोकगीत में अभी भी कोई कमी नहीं आई है। अब तो ये मौखिक परंपरा के साथ साथ लिखित, ऑडिओ, वीडियो, डिजिटल और मंचीय रूपों में भी सुरक्षित एवं लोकप्रिय है। अब तो यह गांवो से निकल कर शहर, देश, विदेशों तक पहुंच गया है। देश- विदेशों तक लोक गीतों को लोकप्रिय बनाने में शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी, ईला अरुण, कल्पना पटवारी, गुलाबो सपेरा जैसे प्रसिद्ध गायक-गायिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। वैदिक काल से गीत- संगीत का उपयोग संगीत चिकित्सा के रूप में भी किया जाता रहा है,जो मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में सहायक माना जाता है। आज मानसिक चिकित्सक गायत्री मंत्र के ऊपर भी शोध कर रहे हैं, जिसके लय-ताल से अनेक बीमारियों को दूर करने का दावा किया जा रहा है। तात्पर्य यह है कि यदि हम मानसिक वेलनेस की बात करें तो ये हमारे वैदिक काल की देन है, जो मध्य काल में विलुप्त प्राय हो गया था। हम लोकगीत को इसके महत्व को न समझ कर मात्र मनोरंजन का साधन ही समझते रहे, जबकि लोकगीत में मानसिक संतुलन को बनाए रखने की अद्भुत क्षमता है, जिसे पुन: हमारे युवा वर्ग समझ गए हैं।
सामूहिक रूप से लोकगीत गाने से आपसी जुड़ाव, आत्मविश्वास और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। गीत मन को प्रसन्न , शांत और संतुलित रखते हैं। वे तनाव कम करने, सकारात्मक भावनाएं बढ़ाने और मानसिक वेलनेस को सुदृढ़ बनाने में सहायक होते हैं जिसकी वर्तमान मे बहुत आवश्यकता है। आज की पीढ़ी जिस मानसिक तनाव, सामाजिक उलझनों, नकारात्मक सोच तथा आपसी प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है इसे म्यूसिक फ ॉर वेलनेस से फिर से जुडऩा ही होगा। जिससे हम एक संवेदनशील , सकारात्मक, ऊर्जावान समाज की स्थापना कर सकें। अभी हम सब गीत नृत्य के रस मे डूबे ही थे कि ताजे रंग बिरंगे फूलों से सजे मंडप से मंगलाष्टकम के पवित्र मंत्र के सुर, शुभ वातावरण मे गूंजने लगे…मंगलाष्टक विवाह, संस्कार का पारंपरिक गीत- श्लोक है…
स्वस्ति श्री गणनायकम गजमुखम, मोरेश्वरम, सिद्धिधम ।
बल्लालों मुरुदम विनायक महम चिंतामणि स्थेवरम ।
लेण्याद्री गिरीजातकम सुरवारदम ओझरम।
ग्रामो रंजण सन्स्थीतम गणपति कु र्या सदा मंगलम शुभ मंगलम सावधान ।
आज एक आंगन की चहकती कली दूसरे आंगन की खुशबू बनने जा रही है। अपनी लाड़ली का हाथ वर के हाथों मे सौंपते हुए हम सब उसे जीवन भर प्रेम, सम्मान और विश्वास का साथ देने का आशीर्वाद और दायित्व दे रहे हैं …। फिर भी बेटी तो मां के कलेजे का टुकड़ा ही होती है, उसे विदा करना आसान नहीं …। हृदय से ढेरों आशीष, आँखों में आँसू , मन मे हलचल लिए कुछ खुशी कुछ गम लिए , भारी मन से हम सब ने विदा किया…. हमारे कानों में उसके गुनगुनाए गीत गूंजने लगे, जिसे वो अपनी बुआ दादी के साथ अक्सर गाती रहती थी…
ताल किनारे महल मोरा सुंदर ता, बीच पुरइन के पात हो आवत देखूं मैं दुई गो सिपहिया ,
एक सांवर एक गोर हो सांवर तो मोरे ननदी के भैया, गोर हैं बिरन हमार हो ताल किनारे …