मिर्जापुर मूवी रिव्यू: परदे पर लौटा मुन्ना का स्वैग, रवि किशन ने दिया सरप्राइज



Mirzapur Movie news : अब तक कालीन भैया के बेटे मुन्ना और गुड्डू पंडित की लड़ाई आपने अपनी लैपटॉप या मोबाइल की स्क्रीन पर देखी थी पर इस कहानी का भौकाल इतना था कि हर कोई इसे बड़े परदे पर देखना चाहता था। मेकर्स ने इस ख्व्वाहिश को पूरा किया और तीन घंटे की झन्नाटेदार कहानी को सिनेमाघरों में बड़े परदे पर उतारा। नाम दिया ‘मिर्जापुर: द मूवी’। कहानी वही, किरदार भी वही तो क्या मजा भी उतना ही आया? जानिए इस रिव्यू में…

Mirzapur the movie review ali fazal as guddu divyenndu as munna and pankaj tripathi as kaleen with ravi kishan

कैसी है मिर्जापुर की कहानी ?
फिल्म के किरदार और कहानी का बेस काफी हद तक सीरीज जैसे ही हैं। इस बार विलेन बने हैं बब्बन बबुआ (रवि किशन), वो कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) और उनके बेटे मुन्ना (दिव्येंदु) को मारकर मिर्जापुर की गद्दी पर राज करना चाहता है।
कालीन भैया तक पहुंचने में उनकी मदद सीएम के छोटे भाई जेपी यादव (प्रमोद पाठक) और जरीना (अनंग्शा बिस्वास) करते हैं। बब्बन की एक प्रेमिका भी है मुमताज बीबी (सोनल चौहान) जो उनके साथ रहती है। उसकी और बब्बन की सुरक्षा उनका वफादार बिरजू लोहार (मोहित मलिक) करता है।बब्बन, गुड्डू (अली फजल) और बबलू (जीतेंद्र) के जरिए कालीन भैया तक पहुंचता है डील कन्फर्म करता है। उसका प्लान कालीन को मिर्जापुर से बाहर निकालकर उसे मारना है। इसमें वो सफल हो पाता है या नहीं बस इतनी ही कहानी है।

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कैसा रहा कलाकारों का अभिनय ?
रवि किशन फिल्म के सरप्राइज पैकेज हैं। उनको पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा स्क्रीन टाइम दिया गया है। अपने किरदार को उन्होंने बखूबी निभाया भी है। चाहे एक्शन सीन हो या इमोशनल, वो हर फिल्म के साथ निखर रहे हैं। अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ कालीन भैया के किरदार में पंकज त्रिपाठी अपने उसी दबदबे को बरकरार रखते हैं। दिव्येंदु को फिर मुन्ना के किरदार में बकैती करते हुए देखकर अच्छा लगता है। गुड्डू पंडित के किरदार में अली फजल ने फिर जमकर मेहनत की है। वो इस किरदार और कई सीन में फिल्म की जान साबित होते हैं। बबलू बने जीतेंद्र, विक्रांत मेसी की कमी खलने नहीं देते। इसके अलावा मोहित मलिक, अभिषेक बनर्जी, रसिका दुग्गल, श्वेता त्रिपाठी, श्रिया पिलगांवकर, सुशांत सिंह और शीबा चड्ढा समेत सभी कलाकारों ने अपने किरदार से भरपूर न्याय किया है।विज्ञापन

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क्या निर्देशन में चूके ? 
अब बात करते हैं उस क्षेत्र की जहां फिल्म बिगड़ती है। हैरानी होती है यह देखकर कि जो काम गुरमीत सिंह ने सीरीज में इतना कमाल का किया था, वही काम फिल्म में बिगड़ा कैसे। समस्या यह है कि यह फिल्म ना तो वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ के अपने चिर–परिचित अंदाज से बाहर निकल पाई और ना ही जो दिखाना चाहती थी वो पूरी तरह से दिखा पाई। ताज्जुब है कि 3 घंटे लंबी फिल्म होने के बाद भी डायरेक्टर से काफी कुछ अधूरा छूट गया। कई किरदार और उनकी कई कहानियां दिखाने के चक्कर में कुछ कलाकारों को तो स्क्रीन पर बस पलभर का समय मिला। यहां मेकर्स ने कहानी एक्सटेंड की, वक्त भी लंबा लिया पर सब कुछ कवर करने के चक्कर में भटक गए। 

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फिल्म में क्या अच्छा ? 

  • मुन्ना भैया की वापसी। लंबे समय से दर्शक दिव्येंदु को इस किरदार में फिर से देखना चाहते थे।
  • थिएटर में फिल्म की टाइटल थीम और पूरी फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक सुनकर मजा आता है।
  • कई किरदार होने के बाद भी कहानी भटकती नहीं है, बस कहीं कहीं धीमी हो जाताी है।
  • क्लाइमैक्स के कुछ सीन छोड़ दें तो एक्शन सीन अच्छे हैं। 

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फिल्म में क्या बुरा ?

  • सीरीज में जितनी कसावट थी, वह यहां महसूस नहीं होती।
  • कहीं-कहीं फिल्म धीमी सी लगती है। 
  • वो एक्साइटमेंट नहीं बन पाता कि अब क्या होने वाला है?
  • क्लाइमैक्स समेत कुछ चीजों का पहले से ही अंदाजा हो जाता है।
  • फिल्म के गाने जबरदस्ती इसे और लंबा बनाते हैं।
  • कहने को तो कालीन भैया का कट्टों का व्यापार है, पर क्लाइमैक्स सीन में सब हाथों से लड़ रहे हैं। 


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