युवाओं की ‘सोच’ तय करती है देश का ‘भविष्य’- सुनील बंसल


युवाओं से संपर्क आवश्यक – प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी

विशेष संवाददाता

वाराणसी। युवा शक्ति सत्र को संबोधित करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल ने कहा कि किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत उसके युवा और छात्र होते हैं। ‘युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं की सोच और दिशा ही देश का भविष्य तय करती है। आज की युवा पीढ़ी में देशभक्ति और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव है, लेकिन उसे सही दिशा और संस्कार देने की आवश्यकता है। बदलते पारिवारिक परिवेश में बच्चों को संस्कार देने की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि युवाओं को सनातन संस्कृति और संस्कारों से जोड़कर विकसित भारत के संकल्प में भागीदार बनाना जरूरी है।

इस अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि युवाओं को संस्कृति और अध्यात्म से जोड़ना आवश्यक है। इसके लिए संगीत, कला और साहित्य के माध्यम से उन्हें भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा से अवगत कराना होगा। इस समय युवाओं से संवाद कम हुआ है, जिसे बढ़ाना आवश्यक है। युवाओं से सही संवाद स्थापित कर उन्हें राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगाया जा सकता है।

हिंदू होलोकास्ट सत्र में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ने कहा कि पिछले 2000 वर्षों में करोड़ों की संख्या में हिंदुओं का नरसंहार हुआ, लेकिन समाज ने उसका प्रतिकार भी किया। उससे पहले भारत विश्वगुरु हुआ करता था और पूरी दुनिया का मार्गदर्शन करता था। वर्तमान समय में विदेशी शक्तियां भारतीय युवाओं को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समाज का मनोबल बनाए रखने का काम संत समाज ही कर सकता है।

संस्कृति के सूत्र विषयक सत्र में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि भारत को भारत माता कहने और उसकी सांस्कृतिक पहचान पर सवाल उठाने वाली सोच समाज को बांटने का काम करती है। भारत की एकता केवल राजनीतिक सीमाओं से नहीं, बल्कि नदियों, तीर्थस्थलों, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से बनी है। उन्होंने राम-रावण और महिषासुर-दुर्गा से जुड़ी कथाओं को जातीय और सामाजिक विभाजन के नजरिये से पेश करने वाली व्याख्याओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने चेन्नई की एक अनुसूचित जाति बस्ती का उदाहरण देते हुए बताया कि संतों के वहां पहुंचने से सामाजिक दूरी कम करने में मदद मिली। संतों ने वहां के लोगों के घरों में जाकर भोजन स्वीकार किया और सामाजिक समरसता का संदेश दिया।

राष्ट्रहित सर्वोपरि विषयक सत्र में रॉ के पूर्व निदेशक एनके सूद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को करारा जवाब दे रहे हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश की रक्षा कर रहे हैं। जब भी कहीं दंगाइयों को दंडित करने की बात आती है तो हर जगह योगी आदित्यनाथ को याद किया जाता है। उन्होंने कहा कि हमारा देश खतरे में है। देश के दुश्मन देश की हालत खराब करने में लगे हैं। राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी देश तोड़ने की बात करते हैं। हम देश की सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं। आज देश की सुरक्षा के लिए सुरक्षा चक्र बनाने की आवश्यकता है। ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान को ध्वस्त किया गया था। देशद्रोहियों को सजा देने की आवश्यकता है।

सुरक्षित राष्ट्र विषयक सत्र में गोवा के पूज्य संत पद्मश्री सद्गुरु ब्रह्मेशानंदाचार्य स्वामीजी महाराज ने कहा कि भारत ऋषियों, संतों, गुरुओं और माता-पिता की भूमि है। जब ये संस्थाएं मजबूत और पवित्र बनी रहेंगी, तभी भारत सुरक्षित रहेगा। उन्होंने श्अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।श् श्लोक का उल्लेख करते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना पर जोर दिया। साथ ही गोवा को श्दक्षिण काशीश् के रूप में मान्यता प्रदान करने की मांग की।

इसी क्रम में गुजरात वीरमगाम के विधायक हार्दिक पटेल ने कहा कि विदेशी ताकतें भारतीय युवाओं को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं। युवाओं को धर्म, राष्ट्र और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर भ्रमित किया जा रहा है। आंदोलन के नाम पर नौजवानों को गलत रास्ते पर ले जाया जा रहा है। नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में बनी परिस्थितियों की तरह ही भारत में भी स्थिति पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसी सत्र में पश्चिम बंगाल बरासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान उसकी तीर्थ परंपराओं और साझा विरासत से बनी है। हमें मिले संस्कारों का पालन करना चाहिए। भारत की सांस्कृतिक एकता दक्षिण से उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई है। देश को चुनौतियों के बीच मजबूती से आगे बढ़ना चाहिए। विदेशी ताकतों के प्रभाव से सावधान रहते हुए देश की एकता बनाए रखनी चाहिए।

इसी क्रम में श्रीलिंगायत वीरशैय संप्रदाय से श्रीमद् काशी ज्ञानसिंहास पीठाधीश्वर श्रीश्री 1008 जगद्गुरु डॉ. चंद्रशेखर शिवाचार्य महास्वामीजी ने कहा कि हिंदू समाज की एकता और भारत की अखंडता बनाए रखना समय की आवश्यकता है। हिंदू समाज के करोड़ों लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत है। संतों और धार्मिक नेताओं को इस दिशा में सामूहिक रूप से प्रयास करना चाहिए। अखंड भारत केवल सीमाओं का नक्शा नहीं, बल्कि भावनाओं, विचारों और मूल्यों की अखंड धारा है। हम सभी को भारत को एकजुट रखने का संकल्प लेना है और अखंड रहना है।

महर्षि वैदिक शिक्षा संस्थान के ब्रह्मचारी गिरीश ने कहा कि संस्कृति संसद में रखे गए सभी प्रस्ताव महत्वपूर्ण हैं और उन्हें संतों का समर्थन मिला है। समाज में बदलाव टकराव से नहीं, बल्कि ज्ञान, अभ्यास और चेतना के माध्यम से आना चाहिए। जिस तरह सूर्योदय होने पर अंधकार दूर हो जाता है, उसी तरह ज्ञान का प्रकाश समाज की नकारात्मकता को दूर कर सकता है। उन्होंने संतों से अपने करोड़ों अनुयायियों को साधना और आत्मशुद्धि के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया।

इतिहास विषयक सत्र में लेखक और वैज्ञानिक डॉ. मधुसूदन उपाध्याय ने कहा कि हम वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करने वाले लोग हैं। भारत से नौ देश अलग हो गए। ऐसे में सीमा सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। देश के बंटने और सीमाओं के विभाजन से हमारी नदियां, पर्वत और मानव संपदा भी बंट जाती है।

उक्त सत्र में पूज्य स्वामी प्रबोधानंद जी महाराज ने कहा कि विश्व में सबसे अधिक हमले भारत पर हुए हैं और भारत लंबे समय तक इन हमलों का केंद्र रहा है। कुछ समय पहले तक हिंदू समाज में श्हम दो, हमारे दोश् का नारा प्रचलित था, लेकिन अब स्थिति श्हम दो, हमारा कोई नहींश् तक पहुंच गई है। दूसरी तरफ, श्हम दो, हमारे 40श् भी हो जाएं तो कोई दिक्कत नहीं है। दूसरे धर्मों का आचार-व्यवहार हमारे धर्म में समाता जा रहा है और इसी माध्यम से वे अपने धर्म का विस्तार करने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि विश्व में शांति स्थापित करने का रास्ता सनातन संस्कृति से होकर गुजरता है।

इसी क्रम में अखिल भारतीय संत समिति के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष जगतगुरु दिलीपदेवाचार्य जी महाराज ने कहा कि समाज में संतों की घटती संख्या चिंता का विषय है। इसके पीछे पश्चिमीकरण एक प्रमुख कारण है। भारतीय समाज में तेजी से बढ़ते पश्चिमीकरण के प्रभाव से पारंपरिक संस्कृति और मूल्यों में बदलाव आ रहा है। यदि यही स्थिति रही तो भविष्य में अखाड़ों और मंदिरों के लिए संत नहीं मिल सकेंगे।

इसी क्रम में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के महामंत्री पूज्य श्रीमहंत राजेंद्र दासजी महाराज ने कहा कि भारत का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। देश और सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को एकजुट होकर काम करना होगा। उन्होंने अपने संबोधन में देश की वर्तमान परिस्थितियों का जिक्र करते हुए मुसलमानों को देश से बाहर निकालने की बात कही। उनका यह बयान देश में धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों को लेकर उनकी चिंता के संदर्भ में आया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा करते हुए उन्हें देश का लाल बताया। उन्होंने कहा कि ये तीनों नेता सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाने और उसकी पहचान को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, देश की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए राजनीतिक नेतृत्व के साथ समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने सनातन समाज से अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के संरक्षण के लिए सजग रहने का आह्वान किया।

इसी क्रम में वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र राय ने कहा कि सनातन संस्कृति को मजबूत बनाए रखने के लिए समाज को पहले आत्ममंथन करने की जरूरत है। उन्होंने सनातन की रक्षा के लिए गुरुकुल खोलने की अपील करते हुए कहा कि सनातन की जड़ें गहरी हैं और इसकी परंपराओं व संस्कारों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संतों की है।

इसी क्रम में साहित्यकार सर्वेश तिवारी ने कहा कि पिछले 2000 वर्षों का इतिहास हिंदू समाज के संघर्ष और चुनौतियों का साक्षी रहा है। आक्रांताओं ने भले ही मंदिर तोड़े, लेकिन हृदय में स्थापित विग्रह को कोई नहीं मिटा सकता। सभ्यता का संघर्ष केवल सत्ता के स्तर पर नहीं हो सकता, बल्कि इसकी शुरुआत अपने आंगन से करनी होगी।

अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों और भारत की ऐतिहासिक विरासत को वापस लाने की आवश्यकता है। उन्होंने विलियम जोन्स का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय शास्त्रों और उनकी व्याख्याओं में बदलाव किए गए। हिंदू धर्मग्रंथों में मिलावट की गई और फर्जी शास्त्र भी प्रस्तुत किए गए। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन पांडुलिपियां चीन, जापान और इंग्लैंड सहित कई देशों में मौजूद हैं। इन्हें वापस लाकर भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल विरासत को संरक्षित करना जरूरी है।

श्रीकाशी विद्वत परिषद् के महामंत्री प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी ने कहा कि हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं को लेकर समाज में कई तरह के भ्रम फैलाए गए हैं। हिंदू धर्म में ऊंच-नीच जैसी कोई अवधारणा नहीं है। अगर भारत माता को परम वैभव तक पहुंचाना है तो प्राचीन संस्कृति, ज्ञान परंपरा और विरासत का संरक्षण जरूरी है।

प्रोफेसर रविंद्र कुमार पाठक ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का किसी विषय का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है, लेकिन उसमें सवाल पूछने और विषय को समझने की क्षमता जरूर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी विषय को बिना समझे स्वीकार करने के बजाय उसके मूल आधार और तर्क को जानना चाहिए। धर्मशास्त्रों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि समय के साथ उनमें संशोधन होते रहे हैं। समाज और परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं, इसलिए बदलते समय के अनुसार विचार और व्यवस्थाओं की समीक्षा आवश्यक है।

काशी सुमेरुपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद जी महाराज ने कहा कि हमें ग्रंथों को समझने और उनकी गलत व्याख्याओं से बचने की आवश्यकता है। हमें मूल को समझना होगा। एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। पश्चिमी दबाव और षड्यंत्र में आकर मूल ग्रंथों में बदलाव नहीं करना चाहिए। सनातन गुरुकुलों को सरकारी अनुदान मिलना चाहिए। इसके लिए बजट और कोष भी बनना चाहिए। संस्कृति को जानने के लिए पढ़ना होगा, तभी संस्कृति जीवित रहेगी। मठ-मंदिरों का नियंत्रण सरकार से मुक्त कर समाज के हाथों में सौंपना चाहिए।

अनंत श्रीविभूषित पूज्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामकमलाचार्य जी महाराज ने कहा कि शास्त्रों में सुधार करना विद्वानों का कार्य है। जो राष्ट्रीय और सनातन हित में अच्छा है, वही सत्य है। वेद-पुराण सही हैं। हमें केवल मनगढ़ंत वक्तव्यों से बचना होगा।

श्रीकाशी विद्वत् परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर रामचंद्र पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास काफी समृद्ध रहा है और इसके माध्यम से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक ज्ञान का प्रसार हुआ है। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के साथ प्राचीन हस्तलेखों तथा पांडुलिपियों का संरक्षण करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब तक प्राचीन हस्तलेख और पांडुलिपियां सामने नहीं आएंगी, तब तक भारतीय ज्ञान परंपरा का सही मूल्यांकन संभव नहीं होगा। प्राचीन ग्रंथों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होना चाहिए। उनके मूल स्वरूप को समझकर उनका अध्ययन और मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम अध्यक्ष एवं अनंत श्रीविभूषित निर्वाण पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने कहा कि सनातन संस्कृति को समझने और उसका पक्ष रखने के लिए केवल बोलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शास्त्रों का नियमित अध्ययन करना होगा। उन्होंने व्यास जी के भागवत और तुलसीदास रचित रामचरितमानस को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को प्रमाण के आधार पर समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत अपनी ज्ञान परंपरा के कारण विश्वगुरु रहा है। यहां हमेशा शास्त्रार्थ और वैचारिक विमर्श की परंपरा रही है। दूसरे विचारों को सुनना और उनका तर्क के आधार पर जवाब देना भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों के मूल स्वरूप को समझने की जरूरत है और बिना प्रमाण के मनगढ़ंत बातें प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए विद्वानों और संतों को शास्त्रों के आधार पर संवाद करना चाहिए। धार्मिक विषयों पर किसी भी तरह का निर्णय अध्ययन और शास्त्रार्थ के बाद ही होना चाहिए।

सुनील देवधर ने कहा कि महाराष्ट्र में मुंबई के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने हिंदुत्व के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई। उनके नेतृत्व में महाराष्ट्र में कई ऐसे निर्णय लिए गए, जो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जुड़े हैं। औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर, उस्मानाबाद का धाराशिव और अहमदनगर का नाम अहिल्यानगर किया गया। इसी तरह मुंबई के मरीन लाइंस और चर्नी रोड रेलवे स्टेशनों का नाम बदलकर मुंबादेवी और गिरगांव किया गया।

उन्होंने कहा कि प्रतापगढ़ में अफजल खान की समाधि और विशालगढ़ से जुड़े अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी एकनाथ शिंदे सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। महाराष्ट्र के लोकप्रिय दहीहंडी उत्सव को साहसिक खेलों में शामिल कर युवाओं को रोजगार के अवसर और बीमा का लाभ देने की व्यवस्था की गई। देवधर ने कहा कि महिलाओं के सम्मान और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए शुरू की गई लाडली बहना योजना भी सराहनीय पहल है। इसके साथ ही नाम के साथ माता का नाम जोड़ने की पहल के जरिए महिलाओं को सम्मान देने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि इन फैसलों से महाराष्ट्र में सांस्कृतिक अस्मिता, हिंदुत्व और सामाजिक सरोकारों को मजबूती मिली है।

आज के अंतिम सत्र में मंच पर प्रो. नागेंद्र पांडेय, जगद्गुरु मौली सरकार, जनार्दन हरी, महामंडलेश्वर मनमोहन दास राधे-रोध बाबा, जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य, गोविंद शर्मा, अशोक तिवारी, प्रो. ओमप्रकाश सिंह उपस्थित थे। अन्य सत्रों में राज्यसभा सांसद विद्यासागर सोनकर, श्रीकाशी विद्वत् परिषद् के अध्यक्ष नागेंद्र पांडेय, विधायक और आयोजन समिति के कार्यकारी अध्यक्ष श्रीकैलाशाचार्य, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के उपाध्याक्ष एवं ज्योतिर्मठ के प्रधान पुरोहित पंडित ऋषि प्रसाद सत्ती, डाॅ. हरिशंकर कंसाना आदि ने विचार व्यक्त किए।

समापन सत्र का संचालन गंगा महासभा के महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने किया। अभिनंदन पत्र वाचन भक्ति किरन शास्त्री ने तथा स्वागत भाषण व विद्वत् परिषद् के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने किया।कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के साथ हुई।


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