
आचार्य संजय तिवारी
लखनऊ।मां कहां रहती हैं ? मां कैसी हैं ? वही महाशक्ति क्यों हैं? करोड़ो ब्रह्माण्डों का नियंत्रण कैसे करती हैं ? मां का होना कैसा है ? की उपस्थिति कैसी है ? मां ही महाशक्ति क्यों हैं ? हमारे सभी देवता मां के समक्ष नतमस्तक क्यों रहते हैं ? श्री हरि विष्णु स्वरूप श्री राम को भी शक्तिपूजा क्यों करनी पड़ती है ?

ये प्रश्न सामान्य नहीं हैं किन्तु सभी के मन में अवश्य हैं। जिन्हें दुर्गा दुर्ग विनाशिनी कहते हुए पिछले 9 दिनों से यह जगत पूज रहा है वह कहां रहती हैं? कुछ सौ वर्षों का अबोध आधुनिक विज्ञान तो इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकेगा। इसका उत्तर केवल सत्य सनातन ग्रंथ ही दे सकते हैं। एक संकेत स्वरूप कुछ गणनाएँ रखने का साहस जुटा रहा हूँ। गूढ़ रहस्य और अलौकिक तथ्य हैं। पहले इनका अनुशीलन कर लिया जाय। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के द्वादश स्कंध में भगवती आदिशक्ति के परम धाम ‘मणिद्वीप’ (Manidweepa) का अत्यंत दिव्य और विस्तृत वर्णन किया गया है। मणिद्वीप की मुख्य विशेषताएं सभी को जानना चाहिए।
सर्वोच्च स्थान:
यह दिव्य लोक कैलाश, वैकुंठ और गोलोक से भी श्रेष्ठ, परम और अलौकिक माना गया है। इसकी
प्राकृतिक संरचना अद्भुत है। मणिद्वीप चारों ओर से अमृत के समुद्र से घिरा हुआ है और यहाँ विभिन्न प्रकार की मणियों, रत्नों और कल्पवृक्षों की सुंदर वाटिकाएं हैं।
इस द्वीप के भीतर शृंगार मंडप, मुक्ति मंडप और ज्ञान मंडप स्थित हैं। इन मंडपों और दिव्य सिंहासन् पर माता भुवनेश्वरी / जगदम्बा भगवती विराजमान रहती हैं, जिनके सान्निध्य में चौंसठ कलाएं, विभिन्न देवगण और शक्तियां सदा सेवा में रहती हैं।
क्या आप मणिद्वीप के द्वारों या वहाँ होने वाली पूजा-अर्चना के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं? अब धैर्य पूर्वक इस को समझिए।
श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध तथा देवी भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मांड के ऊर्ध्व लोकों (ऊपरी लोकों) की ऊंचाई और दूरी का मापन ‘योजन’ में किया गया है।
सूर्य लोक को संपूर्ण ब्रह्मांड के मध्य का केंद्रबिंदु माना गया है। सूर्य लोक से ऊपर की ओर क्रमशः अन्य दिव्य लोकों की ऊंचाई और दूरी इस प्रकार बताई गई है:
1. चन्द्र लोक (Moon) 1,00,000 योजन ऊपर सूर्य से एक लाख योजन ऊपर चंद्रमा स्थित है।
2. नक्षत्र मंडल (Stars) 3,00,000 योजन ऊपर चंद्रमा से दो लाख योजन (सूर्य से कुल तीन लाख) ऊपर नक्षत्र हैं।
3. बुध ग्रह (Mercury) 5,00,000 योजन ऊपर नक्षत्रों से दो लाख योजन आगे बुध ग्रह स्थित है।
4. शुक्र ग्रह (Venus) 7,00,000 योजन ऊपर बुध से दो लाख योजन ऊपर शुक्र ग्रह का स्थान है।
5. मंगल ग्रह (Mars) 9,00,000 योजन ऊपर शुक्र से दो लाख योजन ऊपर मंगल ग्रह स्थित है।
6. बृहस्पति ग्रह (Jupiter) 11,00,000 योजन ऊपर मंगल से दो लाख योजन ऊपर बृहस्पति ग्रह हैं।
7. शनि ग्रह (Saturn) 13,00,000 योजन ऊपर बृहस्पति से दो लाख योजन ऊपर शनि ग्रह का वास है।
8. सप्तर्षि मंडल (Ursa Major) 24,00,000 योजन ऊपर शनि से 11 लाख योजन ऊपर सप्तर्षियों का निवास है।
9. ध्रुव लोक (Polaris) 38,00,000 योजन ऊपर सप्तर्षियों से 14 लाख योजन ऊपर स्थिर ध्रुव लोक है।
ध्रुव लोक से ऊपर के महालोक (सप्तलोक की सीमा) है। ध्रुव लोक से ऊपर जाने पर ब्रह्मांड के मुख्य उच्च लोक आते हैं, जिनकी दूरियां अत्यंत विशाल हैं:
1. महर्लोक:
ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर स्थित है। यहाँ कल्प के अंत तक जीवित रहने वाले सिद्ध ऋषि रहते हैं।
2. जनलोक:
महर्लोक से 2 करोड़ योजन ऊपर स्थित है। यह लोक ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों (सनकादि ऋषियों) का स्थान है।
3. तपोलोक:
जनलोक से 8 करोड़ योजन ऊपर स्थित है। यहाँ पूर्ण वैरागी और तपस्वी देव आत्माएं वास करती हैं।
4. सत्यलोक (ब्रह्मलोक):
तपोलोक से 12 करोड़ योजन ऊपर स्थित है। यह ब्रह्मा जी का सर्वोच्च लोक है।
विशेष तथ्य:
सूर्य लोक से लेकर सत्यलोक (ब्रह्मलोक) तक की कुल संचयी दूरी लगभग 23,38,00,000 (23 करोड़ 38 लाख) योजन बताई गई है।
देवी पुराण के अनुसार ‘मणिद्वीप’ की स्थिति
देवी भागवत पुराण के अनुसार, सत्यलोक (ब्रह्मलोक) से भी सर्वोपरि तथा वैकुंठ और गोलोक से भी ऊपर परम आकाश में आदिशक्ति का ‘मणिद्वीप’ स्थित है, जो ब्रह्मांड की अंतिम सीमा या सर्वोच्च शिखर है।
।।ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।।