
संजय श्रीवास्तव
लखनऊ। बात 1963 की है। बस्ती जिले के असनहरी गांव में कायस्थ कुल में एक बच्चे ने जन्म लिया। छोटी सी उम्र में ही उस बच्चे ने पहले पिता और फिर अपनी जान से प्यारी मां को खो दिया…। जिस उम्र में मासूम, मां की गोद और पिता की छत्रछाया में बेफिक्र होकर बालपन का मजा लेता,उस उम्र में वह मासूम परिस्थितियों के साथ जीना सीखने लगा…। गरीबी का दंश झेलता रहा लेकिन उस बच्चे की जीवटता ने ‘अभाव’ शब्द को पीछे छोड़ पूरा मन पढ़ाई में लगा दिया। उसके घर में अभाव का आलम था लेकिन पढऩे की ललक के आगे ‘अभाव’ को भी नतमस्त होना पड़ा। गाँव में लालटेन के नीचे रामायण के साथ पराग, चंपक, विज्ञान प्रगति, धर्मयुग और गीता प्रेस की पुस्तकें उनकी दुनिया का विस्तार करती थीं। घर छोटा था लेकिन कल्पनाओं की दुनिया बहुत बड़ी थी। किताबें कम थीं, लेकिन सपने कम नहीं थे…। जी हां, संघर्षों में तपकर सोना बनने वाले उस शख्स का नाम बृजेश चंद्र श्रीवास्तव है।

बृजेश औपचारिक विद्यालय में पहली बार पहुंचे तो सीधे चौथी कक्षा में प्रवेश मिला। आगे की पढ़ाई गोरखपुर में हुई। डी.ए.वी. इंटर कॉलेज के दिनों में पढ़ाई के साथ- खाना बनाना और घर संभालना भी दिनचर्या का हिस्सा था। कभी पुराने कागजों के खाली हिस्सों पर नोट्स लिखने पड़े, तो कभी आवश्यक पाठ्य पुस्तक खरीदने के लिए इंतजार करना पड़ा। ये कठिनाइयां किसी प्रेरक कथा को सजाने के लिए गढ़े गए प्रसंग नहीं थे। यही उनके विद्यार्थी जीवन की वास्तविक जमीन थी। इन्हीं परिस्थितियों से निकलकर वे तत्कालीन यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की पहुंचे और सिविल इंजीनियरिंग में बी.ई. तथा एम.ई. की उपाधियां प्राप्त कीं। इंजीनियरिंग के साथ मनोविज्ञान और मानव व्यवहार में रुचि भी बनी रही। बाद में यही जिज्ञासा उनकी लेखकीय दृष्टि की एक महत्वपूर्ण धुरी बनी। गांव में बचपन के संघर्षों से आईआईटी रूड़की तक,चार दशकों की इंजीनियरिंग से पुरस्कार-विजेता, लेखक बनने तक, और अब Bridge Mind store के साथ उद्यमिता की नई शुरुआत। बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव की कहानी बताती है कि अनुभव बढऩे के साथ नए सपने देखने का साहस कम होना ज़रूरी नहीं। 60 की उम्र पार करने के बाद बहुत से लोग अपनी रफ़्तार कुछ कम करना चाहते हैं लेकिन बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव ने उल्टा रास्ता चुना। उन्होंने अपने लिए एक ऐसा क्षेत्र चुन लिया, जिसमें वे एक बार फि र विद्यार्थी थे। नाम है Bridge Mind store।

लेकिन इस नई दुकान की कहानी समझने के लिए उस बच्चे तक लौटना होगा, जिसने बहुत छोटी उम्र में माता- पिता का साया खो दिया था। जिसके पास साधन सीमित थे, मगर सपनों की कोई सीमा नहीं थी। कुछ लोगों के जीवन में बचपन स्मृतियों की तरह आता है। कुछ के लिए वह जीवन की पहली कठिन परीक्षा होता है। बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव के लिए यह परीक्षा बहुत जल्दी शुरू हो गई थी। अभाव साधन सीमित कर सकता है, जिज्ञासा की दिशा नहीं बत्तीस वर्ष राइट्स में, चार दशक जीवन की प्रयोगशाला में’ एनआईडीसी में सहायक अभियंता के रूप में शुरुआत के बाद अगस्त 1991 में वे क्रढ्ढञ्जश्वस् रुह्लस्र. से जुड़े। मार्च 2023 में महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति तक उनके 32 वर्ष राइट्स के साथ बीते। रेल परियोजनाओं, पुलों, औद्योगिक साइडिंग, बिजली परियोजनाओं, सार्वजनिक भवनों और मेट्रो प्रणालियों ने उनके पेशेवर जीवन को आकार दिया। यहां अनुभव केवल सेवा-वर्षों की गिनती नहीं था। किसी स्वीकृत डिजाइन पर तर्कसंगत प्रश्न उठाना, जटिल नींव के लिए पुन: तकनीकी परीक्षण की मांग करना, खुदाई से निकली चट्टान को रेलवे बैलास्ट में बदलकर लगभग 25 करोड़ रुपये की बचत का अवसर पहचानना, या वर्षों बाद भी किसी निर्णय का आधार साबित कर सकने वाले दस्तावेज संभालकर रखना। ऐसी घटनाओं ने उन्हें सिखाया कि पेशेवर परिपक्वता का अर्थ केवल काम पूरा करना नहीं, उसके पीछे की सोच को जिम्मेदारी से निभाना भी है। कॉलेज आपको इंजीनियरिंग पढ़ाता है। कार्यस्थल आपको इंजीनियर बनाता है।

जब अनुभव ने किताबों का रूप लिया सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी पेशेवर सक्रियता जारी रही, लेकिन एक नया प्रश्न अधिक मुखर हुआ। परियोजना पूरी होने पर उसकी ड्रॉइंग, परीक्षण और अभिलेख अगली टीम को सौंप दिए जाते हैं, फि र दशकों के अनुभव का ज्ञान- हस्तांतरण क्यों न हो ? इसी प्रश्न ने लेखन को शौक से आगे बढ़ाकर एक उद्देश्य बना दिया। उनकी पुस्तकों में परीक्षा की मानसिक तैयारी से लेकर परियोजनाओं में दस्तावेजी अनुशासन तक अलग- अलग विषय हैं। इनमें दो पुस्तकों को Legacy of litrature Awards 2026 में विशिष्ट श्रेणियों में सम्मान मिला। दोनों की दृष्टि अलग है, लेकिन साझा आग्रह एक है। जानकारी को व्यवहार में उतारने की समझ विकसित की जाए।
दो पुस्तकें, दो अलग प्रश्न, दो साहित्यिक सम्मान – पुरस्कार- श्रेणियों से उनका विषयगत संबंध स्पष्ट है, यह पुरस्कार निर्णायकों के औपचारिक मूल्यांकन का दावा नहीं है।
. Awarness to mastery
. THE HCF of Litrature Awards 2026- Best Manu Script
यह पुस्तक एक सहज लेकिन गहरा प्रश्न उठाती है। एक ही पाठ्यक्रम, समान पुस्तकें और लगभग बराबर परिश्रम होने पर भी कुछ विद्यार्थी परीक्षा में कहीं बेहतर प्रदर्शन क्यों करते हैं ? लेखक इसका उत्तर केवल अधिक पढऩे या अधिक प्रश्न हल करने में नहीं खोजते। वे तैयारी के उस अदृश्य पक्ष पर ध्यान दिलाते हैं जहां सजगता, एकाग्रता, आत्म- अनुशासन, मानसिक स्थिरता और दबाव में निर्णय लेने की क्षमता मिलकर परिणाम को प्रभावित करती हैं। आईआईटी जेई,नीट,यूपीएससी और कैट जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के संदर्भ में पुस्तक पाठक को अपनी सोचने और सीखने की प्रक्रिया पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। यह परीक्षा सफलता को रटने की दौड़ से निकालकर आत्म- जागरूकता और विचार की स्पष्टता से जोड़ती है। विषय की मौलिक दृष्टि,विभिन्न परीक्षाओं से उसका संबंध और प्रेरक प्रस्तुति ऐसे गुण हैं जो इसे Awarness to mastery सम्मान के संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय बनाते हैं।
. The documentds fortess-A Practical Guides To navigating India’s public works Project’s
. Legacy ofLitratures Awards 2026 – Best profeesinol Non – fiction
किसी पुल, भवन या रेलवे परियोजना की सफ लता केवल उसके निर्माण से तय नहीं होती। उतना ही महत्वपूर्ण है यह प्रमाणित कर पाना कि कौन सा निर्णय कब, किस आधार पर और किसकी स्वीकृति से लिया गया। इसी अकसर अनदेखे सच को यह पुस्तक अपने केंद्र में रखती है। लेखक दशकों के वास्तविक परियोजना अनुभव के आधार पर बताते हैं कि अनुबंध, मापन- पुस्तिकाएं, अनुमोदन, पत्राचार, निरीक्षण अभिलेख, भुगतान, दावे और विवादों से जुड़े दस्तावेज़ किस प्रकार परियोजना की पेशेवर सुरक्षा बनते हैं। यह केवल कागज़ संभालने की सलाह नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर जवाबदेही, पारदर्शिता और समय रहते सही अभिलेखन की संस्कृति विकसित करने का व्यावहारिक मार्ग दर्शन है। युवा इंजीनियरों से लेकर परियोजना प्रबंधकों तक, पुस्तक उस ज्ञान को सामने लाती है जो प्राय: वर्षों के अनुभव और कठिन परिस्थितियों से ही मिलता है। वास्तविक कार्य , अनुभव, उपयोगिता और विषय की पेशेवर गंभीरता इसे Best profeesinol Non – fiction श्रेणी में मिले सम्मान के अनुरूप विशिष्ट बनाती है। इसके बाद किताबें उनके लिए उपलब्धियों की सूची नहीं, अर्जित अनुभव को साझा करने का माध्यम हैं।

किताब लिखने के बाद अगला प्रश्न था कि ज्ञान केवल पुस्तकालय तक क्यों रहे ? Cerebral Pursuits के माध्यम से यूट्यूब, डिजिटल शिक्षण, मार्गदर्शन और ऑनलाइन समुदायों में इंजीनियरिंग की व्यावहारिक समझ, अवधारणात्मक अध्ययन और पेशेवर विकास पर संवाद शुरू हुआ। लक्ष्य था, सीखने को डिग्री या आयु की सीमा से बाहर ले जाना। और फि र, साठ के बाद एक नई दुकान’ यहीं कहानी एक अनपेक्षित मोड़ लेती है। अनुभवी इंजीनियर से लेखक, फि र शिक्षक और मार्गदर्शक बनना समझ आता है। चार दशक तक पुलों, पटरियों और परियोजनाओं के निर्णय लेने वाला व्यक्ति अब ग्राहक की पसंद, ऑनलाइन व्यवहार और खरीदारी के अनुभव को समझने में नया विद्यार्थी है। पहले आवश्यकता समझना, फि र विकल्पों की जांच करना और उसके बाद निर्णय लेना। इंजीनियरिंग का यह अनुशासन खुदरा व्यापार में भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अंतर इतना है कि यहां ड्रॉइंग की जगह शॉपिंग कार्ट है।
जीवन की दूसरी पारी का सबसे बड़ा निवेश आज Bridge Mind consulting के अंतर्गत पेशेवर परामर्श Cerebral Pursuits के जरिए ज्ञान वितरण और Bridge Mind store के माध्यम से डिजिटल व्यापार, तीन अलग दिशाएं एक ही विचार से जुड़ती हैं। अनुभव को ठहराव नहीं, नई शुरुआत को आधार बनाना। उस बालक को याद कीजिए जिसके पास पढऩे के लिए कभी पर्याप्त कागज नहीं था। फि र उस इंजीनियर को, जिसने परियोजनाओं में फैसलों की जिम्मेदारी उठाई। फि र उस लेखक को, जिसने अपने अनुभव अगली पीढ़ी के नाम किए। और अंत में उस उद्यमी को, जो 60 के बाद फिर से सीखने का जोखिम स्वीकार करता है। इन सबके बीच सबसे स्थायी चीज पद, पुरस्कार या कारोबार नहीं… जिज्ञासा है। विशेषज्ञ बनना उपलब्धि है। विशेषज्ञ बनने के बाद भी विद्यार्थी बने रहने का साहस शायद उससे बड़ी उपलब्धि है। कुछ यात्राओं की खूबसूरती मंजिल तक पहुंचने में नहीं, हर नए मोड़ पर फिर चल पडऩे में होती है। बृजेश चन्द्र श्रीवास्तव की कहानी इसी संभावना की याद दिलाती है। जिज्ञासा की कोई सेवानिवृत्ति-तिथि नहीं होती।