प्रतीक पाठक
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव का रण अभी औपचारिक तौर पर शुरू नहीं हुआ है, लेकिन सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। बीजेपी जहां संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने और अपने संगठन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश में लगी है। बीजेपी ने भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे और सरकार के कामकाज को अपना बड़ा चुनावी हथियार बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। हालिया राजनीतिक गतिविधियों में बीजेपी लगातार धामी के नेतृत्व में तीसरी बार सत्ता में आने का लक्ष्य दोहरा रही है। धामी सरकार के पास जनता के सामने रखने के लिए कई बड़े फैसले हैं।

उत्तराखंड UCC लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। नकल विरोधी कानून को सख्त किया गया, धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हुआ और सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया गया। सरकार 34 हजार से ज्यादा युवाओं को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति देने का दावा भी कर रही है। इसके अलावा सरकार निवेश, पर्यटन और कनेक्टिविटी को भी अपनी उपलब्धियों के तौर पर पेश कर रही है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के प्रस्तावों में से एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के प्रोजेक्ट जमीन पर उतरने का दावा किया गया है। चारधाम यात्रा, पर्यटन ढांचे, होमस्टे और स्थानीय उत्पादों के जरिए रोजगार और स्वरोजगार बढ़ाने की कोशिशों को भी बीजेपी चुनावी मुद्दा बना सकती है। दूसरी तरफ कांग्रेस के पास भी कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें वह चुनावी मैदान में जोर-शोर से उठा सकती है। रोजगार, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा, स्थानीय युवाओं के अवसर और जमीन से जुड़े सवाल कांग्रेस के प्रमुख हथियार बन सकते हैं। कांग्रेस ने भी 2027 के लिए अपनी चुनावी गतिविधियां तेज कर दी हैं और राष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों की तैयारी शुरू कर दी है।
इन सीटों पर दिख सकती है कांटे की टक्कर
अगर 2027 के चुनाव में कुछ सीटों को शुरुआती दौर की हाई-वोल्टेज सीट माना जाए तो खटीमा सबसे महत्वपूर्ण नामों में शामिल है। यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2022 में कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी से चुनाव हार चुके हैं और मौजूदा विधायक भी कापड़ी ही हैं। इसलिए यह सीट 2027 में भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन सकती है। हरिद्वार ग्रामीण में भी कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। मौजूदा विधायक कांग्रेस की अनुपमा रावत हैं। वहीं मंगलौर में भी समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यहां पिछले चुनाव और उपचुनाव दोनों ने मुकाबले की संवेदनशीलता दिखा दी है। हल्द्वानी कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण सीट है, जहां सुमित हृदयेश मौजूदा विधायक हैं। इसके अलावा बाजपुर, किच्छा, जसपुर, ज्वालापुर, झबरेड़ा, द्वाराहाट और श्रीनगर जैसी सीटों पर भी स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार और एंटी-इंकंबेंसी मुकाबले की दिशा बदल सकते हैं। खास बात यह है कि 2027 में मुकाबला सिर्फ पार्टी बनाम पार्टी नहीं होगा।
कई सीटों पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे, जातीय-सामाजिक समीकरण और संगठन की ताकत निर्णायक भूमिका निभा सकती है। सर्वे ने बढ़ाई कांग्रेस की चिंता इसी बीच एक निजी चैनल के ताजा सर्वे ने कांग्रेस की चिंता जरूर बढ़ा दी है। सर्वे के मुताबिक अगर आज चुनाव होते हैं तो 70 विधानसभा सीटों में बीजेपी को 56 सीटें , जबकि कांग्रेस को महज 14 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। हालांकि सर्वे को अंतिम चुनावी नतीजे का पैमाना नहीं माना जा सकता। चुनाव अभी बाकी है और उत्तराखंड में आखिरी समय तक समीकरण बदलते रहे हैं। लेकिन अगर इन आंकड़ों को मौजूदा राजनीतिक माहौल के संकेत के तौर पर देखें तो कांग्रेस के सामने चुनौती बड़ी है।
अब असली सवाल यही है, क्या धामी सरकार के काम, बीजेपी का मजबूत संगठन और मोदी फैक्टर मिलकर २०२७ में बीजेपी को लगातार तीसरी जीत दिलाएंगे ? या कांग्रेस स्थानीय मुद्दों, एंटी-इंकंबेंसी और अपने पुराने जनाधार के सहारे सत्ता में वापसी की कहानी लिख पाएगी ? उत्तराखंड की 70 सीटों का चुनावी रण अब धीरे-धीरे इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है।
