‘बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई
इक शख़्स सारे शहर का विरान कर गया…
Senior journalist Neeraj Srivastava news: एक नौजवान, जिसमें पत्रकारिता करने का जुनून देखा…एक ऐसा शख्स, जो रिश्तों को बेेहतरीन तरीके से बनाकर जीता था…एक ऐसा साथी, जो अपनों के हर दुख: में एक पैर पर खड़ा होकर सामने वाली की समस्याओं को चुटकी बजाकर दूर करने का जज्बा रखता था…एक ऐसा अनुज, जिसने सांस थमने के बाद सभी को संदेश दे गया कि, ‘मेरा शरीर नश्वर है लेकिन कहीं जाऊंगा नहीं,सबके दिलों में राज करुंगा’…अपने काम,अपने व्यवहार, अपने जांबाजी को लेकर ताकि नये पत्रकार साथी ‘ईमानदारी’ और ‘निर्भिक’ पत्रकारिता कर इस पेशे को ‘अमर’ करें। पत्रकारिता के लिये जीने-मरने की कसम खाने वाले इस शख्स का नाम नीरज श्रीवास्तव है…। 10 जुलाई की वो मनहूस रात कभी नहीं भूलेगी जब पीजीआई में सभी का प्यारा, छोटा भाई, साथी नीरज श्रीवास्तव ने अंतिम सांस ली। अल-सुबह जिसे भी खबर मिली, उनके घर की चौखट पर खड़ा मिला। शमशान घाट भी इस बात का गवाह बना कि अपने प्रिय साथी, अनुज, जांबाज कलमकार को अंतिम विदाई देने के लिये सैंकड़ों की संख्या में भीड़ उमड़ पड़ी। ‘द संडे व्यूज’ परिवार अपने छोटे भाई, शानदार कलमकार, ब्यूरो चीफ नीरज श्रीवास्तव को श्रृद्धांजलि अर्पित करता है।

जिला मान्यता प्राप्त प्राप्त नीरज श्रीवास्तव लंबे अर्से से पत्रकारिता करते चले आ रहे थे। राष्ट्रीय स्तर के न्यूज चैनलों में उन्होंने अपनी बेहतरीन खबरों से सूबे और अवाम के बीच जबरदस्त पहचान बना ली थी। खबरों पर इनकी पैनी निगाहों का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि सबसे पहले इनके पास खबरें पहुंचती थी और फिर जाड़ा हो,गर्मी हो या फिर बरसात…नीरज श्रीवास्तव मिनटों में खबर लेकर अपने ही साथियों के बीच बाजी मार लेते थे। मिलनसार इतना कि मान-मनव्वल पर साथियों को इसलिये खबरें दे देते थे कि अगले दिन खबर छूटने पर उनलोगों को सीनियर के कोपभाजन का शिकार ना बनना पड़। नीरज पिछले दो साल से किडनी की समस्याओं से जूझ रहे थे,इनका इलाज कई कुशल चिकित्सकों ने किया । लंबे समय तक डॅा. ओ.पी. चौधरी हॉस्पिटल (डेंटल), रायबरेली रोड में डायलिसिस चला लेकिन यहीं से इनकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी।
मुझे याद है कि ओ.पी.चौधरी हॉस्पिटल में नीरज श्रीवास्तव डॅायलिसिस के बाद बेड पर लेटे हुये थे। रात लगभग 10 बजे का वक्त था, ‘द संडे व्यूज़’ की संपादक दिव्या श्रीवास्तव के साथ नीरज श्रीवास्तव को ब्यूरो चीफ का आइडेंटी कार्ड देने पहुंचा। जैसे ही नीरज के हांथों में आइडेंटी कार्ड सौंपा गया,उनकी आंखों में अलग सी तेज नजर आई…बिस्तर पर बैठकर आई कार्ड को माथे से लगाया और पूरे जोश के साथ बोले भईया, मुझे मेरा हथियार मिल गया है,अब मैं द संडे व्यूज़ को बुलंदी तक ले जाकर ही दम लूंगा…। अब मैं एकदम फिट हूं…। ये जोश एक सच्चे कलमकार के अंदर ही देखने को मिलता है।
वे जोशीले इंसान थे,उनके दर पर कोई अंजान शख्स भी चला जाता था तो उसे इंसाफ दिलाने के लिये तुरंत स्कूटी पर किक मार,चल देते थे। जून के आखिरी दिनों में नीरज श्रीवास्तव की तबीयत खराब होने लगी तो उन्हें गंभीर अवस्था में इन्हें पीजीआई में भर्ती कराया गया लेकिन 10 जुलाई की रात 12 बजकर 15 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली और सभी को गमगीन कर इस दुनिया से चले गये। जाते-जाते नीरज श्रीवास्तव ने पत्रकारिता के पेश में आने वाले नवागंतुक पत्रकारों को भी सीख दे गये कि इस पेशे को कुछ इस कदर से जीयो कि जाने के बाद उन्हें देखने वालों से शमशान घाट भी छोटा पड़ जाये…। श्रृद्धांजलि मेरे प्रिय अनुज…