कभी सोचा है ? हमारी ऑनलाइन फ़ीड हमारी पसंद के मुताबिक कैसे बनती है ?


डॉ. प्रियंका सचदेवा

नई दिल्ली। कभी आपने सोचा है कि सोशल मीडिया पर आपकी फ़ीड, चाहे व्हाट्सएप हो, फेसबुक, इंस्टाग्राम या यू-ट्यूब हमेशा वैसी ही क्यों दिखती है जैसी आपको पसंद हो ? मान लीजिये आपको सिर्फ स्पोर्टस और म्यूजिक पसंद है। एक बार किसी म्यूजिक वीडियो को देखा या लाइक किया, तो पूरा फ़ीड स्पोट्र्स क्लिप्स और गानों से भर जाता है। यह संयोग नहीं है। सबसे पहले समझिये…। आपकी लगभग सारी ऑनलाइन एक्टिविटी ट्रैक होती है। एल्गोरिदम आपकी लाइक्स, वॉच टाइम, शेयर्स, सब नोटिस करता है और उसी हिसाब से फ़ीड तैयार करता है।

मीडिया एजेंडा सेटिंग: सबसे पहली बात- सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि मीडिया एक एजेंडा सेट करती है। जो यह हमें दिखाती है, वही जनता को यह संकेत देता है कि क्या महत्वपूर्ण है। एडिटर, ओनर या प्लैटफ़ॉर्म तय करते हैं कि कौन-सा मुद्दा बड़ा बनेगा, चाहें वह चुनाव हो, महंगाई हो या कोई और बहस। आम यूजऱ को यह प्रक्रिया साफ़-साफ़ दिखती नहीं।

एजेंडा-सेटिंग थ्योरी कहती है- मीडिया यह नहीं बताती कि क्या सोचना है, बल्कि यह तय करती है कि किस बारे में सोचना है।

एल्गोरिदम कैसे फ़ीड बनाते हैं ? (क्यों अच्छा लगता है) हर प्लैटफ़ॉर्म पर एक एल्गोरिदम काम कर रहा होता है। आप जिसे जितना ज़्यादा देखते हैं, एंगेज करते हैं, वह कंटेंट उतना ही ऊपर आता है। इंस्टाग्राम- फेसबुक पर पहले आपके फालो किये गये अकाउंट्स की पोस्ट दिखती हैं, फिर वे पोस्ट ऊपर आती हैं जिन पर ज़्यादा लाइक, कमेंट या शेयर होते हैं। यूट्यूब पर अगर किसी तरह के वीडियो पर आपका वॉच टाइम ज़्यादा है, तो वैसा ही कंटेंट और ज़्यादा रेकमेंड होता है। यह सब आपको अच्छा इसलिये लगता है क्योंकि यह आपकी पसंद को लगातार मज़बूत करता है। डोपामाइन लूप्स भी इसमें भूमिका निभाते है। जब भी लाइक, कमेंट या नोटिफि केशन मिलता है, दिमाग में खुशी का केमिकल रिलीज होता है, जो आपको बार-बार उसी ऐप पर लौटने को मजबूर करता है।

खतरा यहीं से शुरू होता है : धीरे-धीरे एक फि ल्टर बबल बन जाता है। मतलब, आपकी चॉइस, विचार और नॉलेज एक बुलबुले में कैद होने लगती है और बाकी दुनिया पीछे छूट जाती है।

पर्सनलाइजेशन बनाम मैनिपुलेशन : एल्गोरिदम मशीन लर्निंग से आपका व्यवहार समझने और भविष्यवाणी करने लगते हैं। यह ‘सहायक’ दिखने वाली पर्सनलाइज्ड फ़ीड धीरे-धीरे नशे की तरह बन जाती है। एल्गोरिदमिक बायस की वजह से कुछ खास तरह के विचारों और नैरेटिव्स को बढ़ावा मिलता है, जबकि बाकी आवाज़ें दब जाती हैं। नतीजा यह कि फ़ीड हमें एक ऐसी तस्वीर दिखाने लगती है जो मैनिपुलेटेड है, हकीकत का सिफऱ् एक टुकड़ा, जो सामान्य समाज से अलग लगने लगता है।

फिल्टर बबल से इको चैंबर: एक कमरे में बंद फिल्टर बबल के बाद अगला चरण है इको चैंबर, ऐसी जगह, जहा सब लोग बस आपकी ही बात दोहराते नजऱ आते हैं। किसी ग्रुप में अगर महंगाई की शिकायत चल रही है, तो ज्यादातर फारवर्ड भी उसी लाइन पर होंगे। विपरीत ओपिनियन या संतुलित डेटा अक्सर गायब रहता है।

इसके पीछे मनोविज्ञान काम करता है : कन्फर्मेशन बायस। हम वही मानने और शेयर करने में सहज महसूस करते हैं, जिस पर पहले से भरोसा हो। जो बात नापसंद लगे या विश्वास के खिलाफ़ हो,उसे हम तुरंत रिजेक्ट कर देते हैं। आपके ऐसे रिजेक्शन से एल्गोरिदम सीखता है कि वह कंटेंट आगे से आपको न दिखाये। नतीजा ? आपकी स्क्रीन पर बस एक ही व्यूपॉइंट बचता है। इसके बाद आता है।

कॉग्निटिव डिसोनेंस : जब आपके सामने तथ्य या जानकारी आपके मजबूत बने हुये विचारों से टकराते हैं, तो दिमाग बेचैन हो जाता है। एल्गोरिदम उस बेचैनी को कम करने के लिये आपको वही ‘आरामदायक’ चीजें दिखाता है, जिन्हें आप पहले से पसंद करते आये हैं। अगर यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहे, तो कल्टीवेशन थ्योरी लागू होती है। धीरे-धीरे हमें लगने लगता है कि मीडिया जो दिखा रही है, वही पूरी हकीकत है। हमारा माइंडसेट उसी फ्रे म में ढलने लगता है।

मीडिया लिटरेसी : इससे बाहर निकलने का रास्ता- मीडिया लिटरेसी हमें सिखाती है कि फि ल्टर बबल और इको चैंबर में फं सने से कैसे बचना है। इसका मतलब है जानबूझ कर डाइवर्स व्यूज़ देखना, सिफऱ् एक जैसा कंटेंट न खाते रहना।

बचाव के कुछ आसान तरीके : अलग-अलग विचारधाराओं और सोर्सेज़ को फालो करें।Not international या Hide जैसे ऑप्शन्स का इस्तेमाल करें- एल्गोरिदम को संकेत मिले कि आप एक ही तरह का कंटेंट नहीं चाहते। कभी-कभी इंकॉग्निटो मोड या बिना लॉग-इन के रैंडमली भी सर्च- स्क्रॉल करें, ताकि नये नज़रिये सामने आयें।

कंटेंट देखते वक्त ये क्रिटिकल सवाल पूछें : (फैक्ट-चेकिंग हैबिट्स सहित)- हर पोस्ट, वीडियो या फारवर्ड पर थोड़ी देर रुक कर सवाल उठाये। यही सवाल आपके फिल्टर बबल को फोडेंगे।

सोर्स क्या है ? किस न्यूज चैनल, वेबसाइट या पेज से आया है ? क्या यह विश्वसनीय है ? इसे किसने बनाया है ? एडिटर, ओनर या ऑर्गनाइज़ेशन का एजेंडा क्या हो सकता है ? कहीं यह प्रायोजित या पेड कंटेंट तो नहीं ? इस कंटेंट के पीछे की मंशा क्या है ? वोट बटोरना, कुछ बेचना या डर- गुस्सा पैदा करना है ? दूसरा पक्ष कहां है ? विपरीत ओपिनियन या डेटा क्यों गायब है ? डेटा सही है या आधा-अधूरा? 

Alt News, Boom Live या Google Fact Check Explorer जैसी फैक्ट-चेक साइट्स से सत्यापित करें। क्या यह बहुत सनसनीखेज या ओवर-ड्रामेटिक है ? हेडलाइन और कंटेंट वाकई मैच करते हैं या केवल क्लिकबेट हैं ? मेरा अपना बायस क्या है ? क्या मैं पहले से सहमत होने की वजह से इसे बिना सोचे-समझे मान ले रहा हूं ? यह कंटेंट AI जनरेटेड या डीपफेक तो नहीं ? आवाज़, चेहरा या बैकग्राउंड अस्वाभाविक लगे तो सावधान हो जायें ?

फैक्ट-चेकिंग की एक आसान आदत बना सकते हैं: हर वायरल पोस्ट पर कम से कम 10 सेकंड रुकें, और उसका सोर्स गूगल करके देखें। यह छोटा-सा स्टेप भी आपके बायस को काफ ी हद तक कम कर सकता है।

निष्कर्ष: सूचित नागरिक, विकसित भारत- हम जितने ज़्यादा इनफॉर्मड और मीडिया-लिटरेट नागरिक बनेंगे, भारत उतनी ही तेज़ी से तरक्की करेगा। जब हम सही दिशा में, सही सूचनाओं के आधार पर सोचेंगे, तभी विकसित भारत 2047 का सपना साकार होगा।

हर नागरिक का संकल्प होना चाहिये: अपने फिल्टर बबल को तोडऩा, विविध विचारों को सुनना-समझना और एक समृद्ध, जागरूक राष्ट्र के निर्माण में हिस्सा लेना।

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लेखिका का परिचय

डॉ. प्रियंका सचदेवा वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकोनॉमिक्स के डेवलपमेंट कम्युनिकेशन, एक्सटेंशन एवं जर्नलिज़्म विभाग में अध्यापन कर रही हैं। वे भारत मे IAMCR (International Association of Media and Communition Research)  की PhD एंबेसडर हैं और मीडिया एवं कम्युनिकेशन रिसर्च के क्षेत्र में एक अंतराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय विद्वान हैं। उन्हें Aristotle University of Thessaloniki, Greece में ‘International Media Summer Academy : New trends in Media and journalisam’ के लिये स्कॅालरशिप मिली है और उन्होंने ICSSR के मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट में नार्थ-ईस्ट इंडिया, मीडिया और यूथ पर रिसर्च एसोसिएट के रुप में काम किया है।2019 से वे SWAYAMU-GC के MOOC कोर्स Society and Media में टीचिंग असिस्टेंट के रूप में जुड़ी हैं तथा e-PG Pathshala और अन्य ओपन एजुकेशन प्लैटफ़ॉर्म पर ई-टेक्स्ट और वीडियो लेक्चर के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से मीडिया लिटरेसी पर केंद्रित मास कम्युनिकेशन में PhD प्राप्त की है। डॉ. सचदेवा ने कनाडा, अमेरिका, लंदन, तुर्की, श्रीलंका, थाईलैंड और चीन सहित कई देशों में आयोजित अंतरराष्टï्रीय सम्मेलनों तथा भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंसों में शोध पत्र प्रस्तुत किये हैं। मीडिया लिटरेसी, डिजिटल मीडिया, युवा, मीडिया स्टडीज़ और एडेप्टिव लर्निंग उनके प्रमुख शोध क्षेत्र हैं, जिन पर उनके अनेक शोध पत्र और बुक चैप्टर्स प्रतिष्ठित जर्नल्स व पुस्तकों में प्रकाशित हो चुके हैं।


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