
रघु ठाकुर
Mohan bhagwat news: 2-3 जनवरी 2026 को आरएसएस के सरसंघ संचालक म.प्र. की राजधानी भोपाल में थे। भोपाल में प्रमुखजनों के साथ उनका संवाद का कार्यक्रम था। यह प्रमुखजनों से संवाद और संपर्क कार्यक्रम संघ ने पूरे देश में चलाया है। जहां-जहां उनकी सरकारें हैं वहां संघ के शीर्ष राष्ट्रीय पदाधिकारी संवाद कर रहे हैं। एक जानकारी मिली है कि उनके वरिष्ठ पदाधिकारियों को इस संवाद हेतु भेजा गया है। इसी कार्यक्रम में संघ प्रमुख स्वत: भोपाल आये थे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि संघ को भाजपा के चश्मे से न देखें तथा भाजपा को देखकर आरएसएस को समझने की भूल न करें। उन्हें यह सफाई देने की आवश्यकता क्यों पड़ी यह विचारणीय है ? उनके कथन का निहितार्थ यह भी हो सकता है कि भाजपा अब संघ के नियंत्रण में नहीं रही।

अभी तक आम धारणा थी कि मातृ शाखा संघ है तथा संगठन मंत्रियों के माध्यम से संघ भाजपा को नियंत्रण में रखता है। स्वत: संघ के द्वितीय सर संघ संचालक और विचार पुरुष माने जाने वाले गुरुजी गोलवलकर जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जनसंघ (भाजपा) की पूँजी संगठन है और संघ कमल की नाल है। जब तक बजेगी बजायेंगे वरना खा जायेंगे? अभी तक संघ कमल की नाल के रूप में जनसंघ और भाजपा को बजाती रही है। 1977 में आपातकाल हटने के पूर्व और लोकसभा चुनाव के पूर्व जब जयप्रकाश जी ने जनता पार्टी को बनाने की पहल की और जनसंघ को उसमें विलय करने के लिये कहा था, तब भी यह निर्णय जनसंघ ने संघ की सहमति से लिया था आर जब जनता पार्टी को तोड़कर पुन: जनसंघ (नया नाम भाजपा)बनाने की रणनीति बनी तब भी इसके पीछे संघ ही था। एक तो संघ को आपातकाल की जेल से मुक्ति मिल चुकी थी और इसलिये वह भय मुक्त हो चुका था और दूसरे सार्वजनिक रूप से यह दबाब पार्टी में शुरू हुआ था कि जनसंघ के लोग जनता पार्टी से नाता तोड़े। हालांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सर संघ संचालक बाला देवरस जी ने स्व. श्री जयप्रकाश जी को वचन दिया था कि वे जनता पार्टी में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन है और दूसरे संघ निर्मित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का विलय जनता पार्टी में करेंगे, परंतु ये दोनों ही वायदे संघ ने नहीं निभाये और जनता पार्टी तोडऩे की सारी योजना तैयार की। अब धीरे-धीरे इस पर से पर्दे हट रहे हैं।
पिछले दिनों हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री और आरएसएस के बड़े नेता रहे स्व. शांताकुमार की जीवनी छपी है। जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि स्व. राजनारायण के खिलाफ जो रिपोर्ट उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री स्व. मोरारजी देसाई जी को भेजी थी वह सच नहीं थी, बल्कि उसे भेजने के लिये उनके ऊपर जनसंघ के शीर्ष नेताओं का दबाव था। यानि, राजनारायण जी को निकाल कर पार्टी को तोडऩे की भूमिका संघ ने ही तैयार की थी। अभी 25 दिसंबर 2025 के दैनिक भास्कर में स्व अटल जी के द्वारा उनके भतीजे अभय को लिखा गया पत्र प्रकाशित हुआ है जो 2 अगस्त 1979 का है। इस पत्र में ही स्व. अटल जी ने जनता पार्टी को तोडऩे की तैयारी का संकेत दे दिया था। श्री अटल जी ने पत्र में लिखा था- पथ तो वही रहेगा-व्यूह रचना बदल सकती है। यानि, रास्ता तो संघ का रहेगा, व्यूह रचना के तौर पर पार्टी बदल सकती है और अब वह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका है कि जनता पार्टी को तोडऩे की ब्यूह रचना संघ ने ही तैयार की थी। जनसंघ के नेता तो उसके मोहरे थेे। इसी आधार पर श्री मोहन भागवत का बयान कि भाजपा को देखकर आरएसएस को समझने की भूल न करें। कई संकेत देता है। ऊपरी तौर पर यह बताने का प्रयास है कि संघ भाजपा से अलग है और यह संघ की रणनीति भी हो सकती है कि ऊपरी तौर पर संघ को भाजपा से अलग दिखाया जाये ताकि अगर कोई सत्ता परिवर्तन हो, यानि संघ के प्रतिकूल शक्तियों के हाथ ताकत आये तो वे कह सकें कि संघ का संबंध भाजपा से नहीं है। वैसे भी यह संघ का स्वभाव रहा है कि मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू ।यानि मीठा तो खा जाओ-कड़वा थूक दो।
भाजपा सरकार के माध्यम से जितने लाभ उठा सकते हो चाहें धन का, सत्ता का, पद का, उठाओ जब कोई कष्ट का समय आये तो उसे त्याग दो। यानि अपराध भाजपा के और लाभ संघ के। उनके कथन का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि भाजपा का संगठन अब उनके नियंत्रण में नहीं रहा है। हालांकि इसके बारे में उन्होंने अपने संबोधन में कुछ सामान्य औपचारिक बातें भी की। जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं है, जैसे उन्होंने कहा कि आपातकाल में हिप्पी बाल रखने वाले का मुंडन किया गया था, हालांकि यह चर्चा उन्होंने पहली बार की है। उन्होंने यह भी कहा कि फू हड़ फ ोटो घर से हटा दीजिये, परंतु कंगना रणावत के फू हड़पन पर वे कुछ नहीं बोले। भाजपा में निर्वाचित पदों पर आये संघ दीक्षित लोगों के बारे में जो अब फू हड़पन अपशब्दों और भ्रष्टाचार के पर्याय बन गये हैं उनके बारे में वे कुछ नहीं बोले। उन्होंने अपने भाषण में एक झूठ यह भी बोला, पाकिस्तान 15 अगस्त 1947 को एक लाईन खीची जाने की वजह से बाहर हो गया, पर पड़ोसी भारत ही तो है। उनका कथन बहुअर्थी है, इस लाइन को खींचने में कितनी भूमिका किसकी है यह उन्होंने नहीं बताया? विश्व हिंदू परिषद स्व. सावरकर, स्व जिन्ना और उनके आरएसएस के तत्कालीन पदाधिकारियों जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष स्व: श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की इस लाइन को खींचने में क्या भूमिका है, यह उन्होंने नहीं बताया। पड़ोसी भारतीय है यह कहकर वे देश के अपने अनुयाईयों को यह भी संदेश दे रहे हैं कि पाकिस्तान भारत का है। इस तरह के बयान संघ के दीक्षित और केंद्रीय मंत्रियोंने पिछले दिनों दिये हैं।
श्री भागवत ने हिंदुओं को 4 खण्डों में बांटा है। हालांकि यह भी एक अलग और विचित्र चश्मा है। अभी तक तो संघ सभी हिंदुओं को एक मानते थे, पर अब उन्हें बांटकर देख रहा है। एक वे जो गर्व से कहते हैं हम हिंदू हैं और दूसरे वे जो कहते हैं कि गर्व से क्या कहें हम हिंदू तो हैं, तीसरे वे जो कहते हैं कि जोर से मत बोलो घर आओ तब बतायेंगे कि हम हिंदू हैं, चौथे जो भूल गये हैं कि हम हिंदू हैं और वे भुल्लकड़ बने रहना चाहते हैं। डॉ. भागवत के इस वर्गीकरण से एक निष्कर्ष तो यह निकलता है कि वे उन्हें ही हिंदू मानते हैं जो जोर से कहें और गर्व से कहें कि हम हिंदू हैं। कोई हिंदू जोर से कहे, स्पीकर पर बोलकर कहे, कूद-कूदकर कहे हम हिंदू हैं, इस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। पर अगर इसी प्रकार से दूसरे धर्मावलंबी भी जोर जोर से चिल्लाकर या कूद-कूदकर उदघोष करें कि हम मुसलमान हैं, हम ईसाई, हम जैन हैं तो क्या इससे देश में तनाव नहीं बढ़ेगा? क्या धर्म प्रदर्शन की चीज है या मानने की। दरअसल यह 21वीं सदी धर्मों के प्रदर्शन की सदी बन रही है और विवादों का कारण भी बन रही है। उन्होंने तीसरे बिंदु के हिंदु वे बताये जो कहते हैं कि घर आओ तो बतायें कि हम हिंदू हैं,मुझे इस तीसरे खण्ड का हिंदुत्व सबसे अच्छा लगता है क्योंकि इसमें कोई दिखावा या बाह्य प्रदर्शन नही है। जब ईश्वर हमारे अंदर है तो हमें बार-बार खोजने की, दिखावे की क्या आवश्यकता है ? क्या यह हमारी कमजोरी व परस्पर अविश्वास नहीं है? कु ल मिलाकर डॉ. भागवत ने केवल शाब्दिक जुगाली की है।
हालांकि मैं एक सवाल उनसे पूछना चाहता हूँ कि इंदौर में जो 20 लोग गंदे पानी की बीमारियों से मौत के शिकार हो गये, जो मासूम और बच्चे जिन्होंने दुनिया भी नहीं देखी, मौत के शिकार हो गये, जो हजारों लोग उस गंदे पानी से बीमार हुये और अस्पताल मेें भर्ती हैं, वे क्या हिंदू नहीं? भागवत जी यह कैसा आपका हिंदुत्व है कि आपके मुख से इन गरीबों के लिये एक शब्द सांत्वना का भी नहीं निकला। हिंदू और सनातन धर्म कहता है कि वसुधैव कुटुंबकम्य परंतु आप तो मानते हैं कि संघ स्वयं सेवक ही कुटुंबकम्य यानि देश के डेढ़ सौ करोड़ लोगों में से से कुछ लाख लोगों को ही आप अपने कुटुम्ब का मानते हैं, यह कैसा आपका हिंदुत्व है? किसी दूसरे देश में एक हिंदू की हत्या होने पर आप चिंतित होते हैं, होना भी चाहिये परंतु देश में सत्ता के भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से कितने लोग मर जाते हैं, उनके लिये आप चिंता क्यों नहीं करते? बांग्लादेश की घटना के संदर्भ में आपने कहा कि जहां हिंदू अल्पसंख्यक हुआ, वहां उसका प्रभाव कम हुआ। इसलिये हिंदु जनसंख्या व हिन्दु होने की भावना सतत बढ़ती रहना चाहिये।
अभी पिछले दिनों कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया में कुछ घटनायें हिंदुओं के साथ घटी हैं तो बतााइये कि इन देशों में से यानि कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यहां तक कि पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदू कितने बच्चे पैदा कर पाये कि हिंदु माइनॉरिटी न रहे। माइनॉरिटी वहाँ केवल माइनॉरिटी नहीं है बल्कि आपके द्वारा नियंत्रित सत्ता की अक्षमता का शिकार है। इसलिये आपके बयान के विपरीत हम आरएसएस को, भाजपा को देखकर ही समझने को लाचार हैं।