भारतीय जीवन दर्शन का सशक्त औऱ आत्म निर्भर राष्ट्र बनाने में है महत्वपूर्ण भूमिका

 

विजय विक्रम सिंह
पूर्वांचल बोर्ड के सदस्य

लखनऊ।

यदि पृथ्वी पर ऐसा कोई देश है, जिसे हम पुण्य भूमि कह सकते हैं, यदि ऐसा कोई स्थान है, जहां भगवान की ओर उन्मुख होने के प्रयत्न में संलग्न रहने वाले जीवमात्र को अंतत: आना होगा। यदि ऐसा कोई देश है, जहां मानव-जाति में क्षमा, दया, शुद्धता आदि का सर्वाधिक विकास हुआ है और सर्वोपरि यदि ऐसा कोई देश है जहां आत्मविद्या तथा आध्यात्मिकता का विकास हुआ है तो वह देश भारत ही है। यह वही प्राचीन भूमि है,जहां दूसरे देशों को जाने से पहले तत्वज्ञान ने आकर अपना निवास बनाया था। यह वही भारत है, जहां के आध्यात्मिक प्रवाह का स्थूल प्रतिरूप उसमें प्रवाहित हो रहे समुद्रकार नद हैं।


जहां एक के पीछे एक उठती हुईं, चिरन्तन हिमालय की हिमशिखरें मानो स्वर्गराज्य के रहस्यों की ओर निहार रही हैं। यहीं वही भारत है, जिसकी भूमि पर संसार के सर्वश्रेष्ठ ऋ षियों की चरण-रज पड़ चुकी है। सर्वप्रथम यहीं पर मनुष्य के स्वरूप तथा अन्तर्जग के विषय में जिज्ञासुओं के अंकुर उगे थे। यह देश धर्म, दर्शन, नीतिशास्त्र, मधुरता, कोमलता और प्रेम की मातृभूमि है। ये सभी भारत में अब भी विद्यमान हैं। यह वही भारत है, जो शताब्दियों के आघात, विदेशियों के असंख्य आक्रमण और सैकड़ों आचार- व्यवहारों के हलचलों को झेलकर भी अक्षय बना हुआ है। यह वही भारत है, जो अपने अविनाशी वीर्य, बल और जीवन के साथ अब तक पर्वत से भी दृढ़तर भाव से खड़ा है। आत्मा जैसे अनादि, अनन्त और अमृत- स्वरूप है, वैसे ही हमारी मातृभूमि का जीवन है, और हम इसी देश की सन्ंान हैं। जब यूनान का अस्तित्व नहीं था, जो रोम भविष्य के अंधकारमय गर्भ में छिपे रहते थे तथा अपने शरीर को नीले रंग से रंगा करते थे, तब भी भारत क्रियाशील था। उससे भी पहले जिस समय का इतिहास में कोई लेखा नहीं है, जिस सुदूर धुंधले अतीत की ओर झंाकने का साहस परम्परा को भी नहीं होता तब से लेकर अब तक न जाने कितने ही भाव एक के बाद एक भारत से प्रसारित हुये हैं। परन्तु उनका प्रत्येक शब्द आगे शान्ति और पीछे आशीर्वाद के साथ उच्चरित हुआ है। यह वही भूमि है, जहां से धर्म तथा दार्शनिक तत्वों ने उमड़ती हुई बाढ़ की भांति पूरे जगत् को बारम्बार प्लावित कर दिया है। यदि विभिन्न देशों की आपस में तुलना की जाये तो पता चलेगा कि सारा संसार सहिष्णु भारतीय संस्कृति का जितना ऋ णी है, उतना अन्य किसी का नहीं। जैसे कोमल ओस कण अनदेखे तथा अनसुने गिरकर भी परम सुन्दर गुलाब की कलियों को खिला देते हैं, वैसा ही भारत के दान का प्रभाव संसार की विचारधारा पर पड़ता रहता है। शान्त, अज्ञात पर महाशक्ति के अदम्य बल से उसने सारे जगत के विचारों में क्रान्ति ला दी है। एक नया युग ला दिया है, पर कोई भी नहीं जानता कि ऐसा कब हुआ। बिना रक्त प्रवाह में सिक्त हुये बिना लाखों स्त्री- पुरुषों के खून की नदी में स्नान किये, कोई भी नया भाव आगे नहीं बढ़ा। प्रत्येक ओजस्वी भाव के प्रचार के साथ ही साथ असंख्य लोगों का हाहाकार अनाथों और असहायों का करुण क्रन्दन और विधवाओं का अजस्र अश्रुपात होते देखा गया है। यूनान देश का गौरव आज अस्त हो चुका है। अब तो कहीं उसका चिह्न तक दिखायी नहीं देता। एक समय था, जब प्रत्येक पार्थिव भोग्य वस्तु के ऊपर रोम की विजय पताका फ हराया करती थी, रोमन लोग सर्वत्र जाते और मानव जाति पर प्रभुत्व स्थापित करते थे। रोम का नाम सुनते ही पृथ्वी कांप उठती थी, परन्तु आज उसी रोम का कैपिटोलाइन पहाड़ एक खण्डहर मात्र है। जहां सीजर राज्य करता था, वहां आज मकडिय़ां जाले बुनती हैं। इस प्रकार कितने ही परम वैभवशाली राष्ट्र उठे और गिरे। भारत की हस्ती आज भी जीवंत है, हजारो साल पहले भी भारत का अस्तित्व अमिट था और हजारो साल बाद भी ऐसे ही जीवंत रहेगा और यही कारण है कि विवेकानंद जी ने भारत की अडिग संस्कृति और भारतीय विचारधारा को समझते हुये आजादी के 50 वर्ष पहले ही भविष्यवाणी की थी। सर्वप्रथम 1890 के दशक में उन्होंने कहा था कि भारत अकल्पनीय परिस्थितियों के बीच अगले 50 वर्षों में ही स्वाधीन हो जायेगा। जब उन्होंने यह बात कही तब कुछ लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उस समय ऐसा होने की कोई संभावना भी नहीं दिख रही थी। उन दिनों लोगों में शायद ही कोई राजनीतिक चेतना दिखाई पड़ती थी। उन्हें राजनीतिक स्वाधीनता की कोई धारणा नहीं थी। ऐसी पृष्ठभूमि में स्वामी विवेकानंद ने भविष्यवाणी की कि भारत अगले 50 वर्षों में स्वाधीन हो जायेगा और यह सत्य सिद्ध भी हुई। उसका कारण था कि स्वामी विवेकानंद इतिहास के अच्छे अध्येता थे और ऐतिहासिक शक्तियों के विषय में उनकी अंतर्दृष्टि बहुत गहरी थी।

विवेकानंद ने ही एक और भविष्यवाणी की थी जिसका सत्य सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा था भारत एक बार फिर समृद्धि तथा शक्ति की महान उचाईयों पर उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को पीछे छोड़ जायेगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत का विश्व गुरु बनना केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व के हित में हैं। विवेकानंद ने कहा समाज का नेतृत्व चाहे विद्या बल से प्राप्त हुआ हो चाहे बाहुबल से, पर शक्ति का आधार जनता ही होती है। उनका मानना था कि प्रजा से शासक वर्ग जितना ही अलग रहेगाए वह उतना ही दुर्बल होगी। हम अच्छी तरह जानते है कि यथार्थ भारत झोपड़ी में बसता है, गांव में बसता है। अत: भारत की उन्नति भी झोपड़ी और गांव में रहने वाली आम जनता की प्रगति पर निर्भर है। इसलिये आज हमारे भारत का शीर्ष नेतृत्व अपने पहले कर्तव्य दीनहीन, निर्धन, निरक्षर, किसानों तथा श्रमिकों के चिंतन औऱ उनके उत्थान पर, कृत संकल्पित होकर कार्य कर रहा है।
श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के शब्दो में स्वामी विवेकानंद जी के सपनो का भारत
भारत कोई भूमि का टुकड़ा नहीं है, ये जीता जागता राष्ट्र पुरूष है, इसका कण-कण शंकर है, इसकी नदी नदी गंगाजल है, हम जिएंगे तो इस भारत के लिये और मरेंगे भी तो इस भारत के लिये और मेरे मरने के बाद गंगाजल मे बहती हुई मेरी अस्थियों में क़ोई कान लगाकर सुनेगा तो एक ही आवाज आएगी भारत माता की जय, भारत माता की जय।एक सुबह ऐसी आयी है जब हम अथर्व वेद के मंत्र, ये होथ मेरे भगवान है ये हांथ मेरे भगवान से बढकर है, दाहिने हांथ में कर्म और बाएं हांथ मे विजय है, को हर भारत वासी अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर भय, भूख, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के लिये प्रयास रत है। आज सही मायने मे स्वामी विवेकानंद जी के सपनो का भारत साकार होता दिखायी दे रहा है।

Post Author: thesundayviews

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