यूपी चुनाव 2022 : पूर्वांचल पर सबकी निगाह

   नीलमणि लाल

   लखनऊ। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र का खास चुनावी महत्व है क्योंकि यूपी के राजनीतिक गलियारों में यह बात अक्सर कही जाती है कि जो भी दल पूर्वांचल जीतता है वह राज्य में सरकार बनाता है। 2017 में भाजपा ने पूर्वांचल के 26 जिलों की 156 विधानसभा सीटों में से 106 सीटें जीतीं थीं, 2012 में समाजवादी पार्टी को 85 सीटें मिलीं थीं जबकि 2007 में बसपा को 70 से अधिक सीटें मिलीं । सभी पूर्वांचल से। यही कारण है कि सिर्फ भाजपा ही नहीं, सत्ता की आस में बैठी समाजवादी पार्टी ने भी इस अंचल में पूरी ताकत झोंक दी है। 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का पूर्वांचल से अच्छा प्रदर्शन रहा था और पार्टी ने इस बार भी पूरा फ ोकस इस क्षेत्र पर कर रखा है। पूर्वांचल के कुछ जिलों में समाजवादी पार्टी का भी अच्छा खासा असर है और कुछ सीटों पर बसपा भी दबदबा रखती है। पूर्वांचल ही यूपी की छोटी पार्टियों की भी प्रयोगशाला है और इनमें अपना दल(एस) , सोनेलाल, निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और जनवादी पार्टी शामिल हैं। फि लहाल निषाद पार्टी और अपना दल(एस) भाजपा के साथ गठबंधन में हैं। वहीं जनवादी पार्टी का सपा से गठबंधन है तो सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी फि लहाल समाजवादी पार्टी के साथ दिखायी दे रही है। लेकिन ये बात भी सही है कि पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा। राजनीतिक पार्टियां चाहे जो दावे करें लेकिन पूर्वांचल की पूरी राजनीति जातिगत खेल पर आधारित है। मुद्दे बहुत हैं लेकिन जातिगत राजनीति का ही खेल अंतिम निर्णय तय करेगा।

भाजपा ने जोर लगाया
2022 के लिये भाजपा पूर्वांचल में पूरी ताकत झोंक रही है। पार्टी का पूरा फ ोकस पूर्वांचल की 156 सीटों पर है क्योंकि यही सीटें हार-जीत तय करेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह अभी के पिछले और हाल ही में हुये दौरे इस बात का सबूत हैं। काशी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में मां अन्नपूर्णा की मूर्ति, कुशीनगर में एयरपोर्ट, सिद्धार्थनगर में मेडिकल कॉलेज, पूर्वांचल एक्सप्रेस, अयोध्या प्रोजेक्ट आदि को चुनावी गणित से जोड़ कर देखा जा रहा है। मोदी के कार्यक्रमों के अलावा गृहमंत्री अमित शाह यूपी में 2022 में 300 पार का नारा लंबे समय ये दे रहे हैं। वे भाजपा के 2022 के चुनावी मिशन मोड के लिये रणनीति को अंतिम रूप दें रहे हैं। गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़ में उनका दौरा चुनावी तैयारियों पर फ ोकस है। पूर्वांचल जिलों में वाराणसी, जौनपुर, भदोही, मीरजापुर, सोनभद्र, प्रयागराज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, संतकबीर नगर, बस्ती, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बलिया, सिद्धार्थनगर, चंदौली, अयोध्या, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, सुलतानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, कौशांबी, और अंबेडकरनगर शामिल हैं। राममंदिर लहर के बीच 1991 में जब भाजपा पहली बार न्यूपी की सत्ता पर काबिज हुयी तो 221 सीट लेकर आयी थी। चूंकि उस समय परिसीमन नहीं हुआ था तो पूर्वांचल के जिलों में 82 सीट पर भगवा लहराया था। उसके बाद साल दर साल भाजपा का प्रदर्शन कमजोर होता गया। 1991 के बाद 2017 में भाजपा को पूर्वांचल में 115 सीट मिली थी, जोकि भाजपा का अब तक का रिकॉर्ड है।
सीटों का गणित
पूर्वांचल के जिलों में विधानसभा की 156 सीटें हैं। अगर 2017 के विधान सभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो भारतीय जनता पार्टी ने 106 सीटों पर कब्जा किया था, वहीं समाजवादी पार्टी को 18, बसपा को 12, अपना दल को 8, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को 4, कांग्रेस को 4 और निषाद पार्टी को 1 सीट पर जीत मिली थी, जबकि 3 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। पूर्वांचल के 26 जिलों में लोक सभा की 29 सीटें हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 22 सीटों पर कब्जा किया था। चुनाव में समाजवादी पार्टी और बसपा गठबंधन को 6 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ एक सीट आयी थी।


राजभर का गठबंधन
पूर्वांचल में ओम प्रकाश राजभर और अखिलेश यादव के गठबंधन ने भाजपा के सामने थोड़ी मुश्किल जरूर पैदा की है लेकिन भाजपा का दावा है कि इस गठबंधन का कोई असर नहीं पड़ेगा। पूर्वांचल में भाजपा का खेल बिगाडऩे में जुटे राजभर ने अखिलेश यादव के बाद अब अंसारी बंधुओं को साधने की कवायद शुरू कर दी है। पूर्वांचल में अंसारी बंधुओं के साथ आने से सपा को भी फ ायदा मिल सकता है और यादव-मुस्लिम- राजभर समीकरण के सहारे भाजपा के सामने सपा तगड़ी चुनौती पेश कर सकती है। 2017 के चुनाव में, भाजपा ने पूर्वांचल में बड़ी जीत दर्ज की क्योंकि उसने इस क्षेत्र से 106 सीटें जीती थीं। उस समयए पार्टी राजभर की एसबीएसपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी, लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश इस गठबंधन से फ ायदा उठा पाते हैं या नहीं। राजभर यूपी की आबादी का लगभग 3 प्रतिशत है, समुदाय के नेताओं का दावा है कि वास्तविक आंकड़ा लगभग 4-5 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में,राजभर को ओबीसी समूह से संबंधित एक महत्वपूर्ण समुदाय माना जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10-12 जिलों पर उनकी बड़ी पकड़ है। इन जिलों में इनका प्रतिशत 20.-22 प्रतिशत तक जाता है, जो निर्णायक बन सकता है। हालांकि, राजभर वोट में विभाजन हो सकता है, क्योंकि 2017 के बाद से भाजपा ने अपने स्वयं के राजभर नेताओं को भी स्थापित किया है।

छोटे दलों का प्रभाव
प्रदेश में 474 छोटे दल रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से दो दर्जन दल काफ ी असरदार भी हैं। पिछड़ा वर्ग में गैर यादव में शामिल जाति आधारित इन छोटे दलों का बड़ा रसूख है। इन्हीं छोटे दलों ने पिछले चुनाव में सत्तासीन समजावादी पार्टी और बसपा को सत्ता से दूर करने में बड़ी भूमिका निभायी। लेकिन इस बार यह दोनों पार्टियां इन छोटे दलों के महत्व को बखूबी समझ चुकी हैं। अपना दल और सुहेलदेव पार्टी जैसे छोटे दलों की बदौलत ही आज बीजेपी प्रदेश की सत्ता का सुख भोग रही है। पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो छोटे दलों की ताकत को सीधे तौर पर बड़े से बड़ा दल नकार नहीं सकता है। 2007 के विधानसभा चुनाव में 91 विधानसभा क्षेत्र में जीत हार का अंतर 100 से 3000 मतो के बीच रहा। वहीं छोटे दलों की वजह से ही बड़े बड़ों को बहुत कम अंतरों से विधानसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। बड़े दलों का गठबंधन मतलब नतीजा नेगेटिव यूपी की राजनीति का इतिहास उठाकर देखिए, जब एक बड़े दल ने छोटे दल से हाथ मिलाया तो दोनों की किस्मत पलट गयी। और जब-जब दो बड़े दलों ने दोस्ती गांठी तो दोनों का हार का मुंह देखना पड़ा। पिछले विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन किया, नतीजा सबके सामने है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी विरोधी दलों में भी राजनीतिक फ ायदे के लिये समझौता हुआ। सपा-बसपा के बीच राजनीतिक फ ायदे के लिये गठबंधन हुआ। भाजपा ने पिछड़े और दलित वोट बैंक में ऐसी सेंध लगायी जिसके चलते यह गठबंधन बेअसर साबित हुआ और भाजपा को इस चुनाव में 80 में से 65 सीटों पर विजय हासिल हुयी।

क्या हैं चुनौतियां
पूर्वांचल में भाजपा के सामने चुनौतियां बड़े मुद्दों को लेकर हैं। वे मुद्दे जो खासकर कोरोना महामारी आने के बाद से ज्यादा प्रभावी हुये हैं। इनमें महंगाई और रोजगार, काम धंधा सबसे प्रमुख हैं। वैसे तो महंगाई सिर्फ पूर्वांचल का मसला नहीं है लेकिन बात चूंकि पूर्वांचल की हो रही है सो उसका उल्लेख जरूरी है। महंगाई का असर पूर्वांचल में ज्यादा इसलिये देखा जा सकता है कि इलाके में गरीबी ज्यादा है और यही वजह है कि बाहर जा कर काम तलाशने वाले सर्वाधिक लोग पूर्वांचल के ही होते हैं। कोरोना काल में बड़े शहरों से यूपी वापस लौटे अधिकांश लोग इसी बेल्ट के थे और उनमें से काफ ी वापस नहीं गये हैं। इनके लिये और अन्य बेरोजगारों के लिये काम-धंधा एक बड़ा मुद्दा है। ऐसे में राजनीतिक दलों के पास एक ही कार्ड रह जाता है- जातीय समीकरण साधने का और छोटे- बड़े दल इसी कार्ड का खूब इस्तेमाल करते हैं। पूर्वांचल बेस्ड छोटे दलों की तो पूरी राजनीति ही जाति कार्ड पर टिकी हुयी है।
बहरहाल, मतदाता किस तरफ जायेंगे, इस बारे में कोई अटकल नहीं लगाई जा सकती है। कुछ सर्वे में निकल कर आया है कि ऐसे मतदाताओं की संख्या चुनाव दर चुनाव तेजी से बढ़ी है जो अपने वोट के बारे में काफ ी देर से निर्णय लेते हैं। यानी, चुनाव प्रचार के बीच में या अंत में तय करते हैं कि किसको वोट देंगे। ऐसे में कहा जा सकता है कि बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि किस पार्टी ने कौन सा प्रत्याशी उतारा है और फ ाइनल गठजोड़ क्या बना है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वोट शेयर

2017
भाजपा- कुल वोट- 3,44,03,299, 39.67 फ ीसदी वोट शेयर, बढ़ा 24.67 फ ीसदी
सपा- कुल वोट – 18923769, 21.82 फ ीसदी वोट शेयर, घटा- 7.33 फीसदी
बसपा – कुल वोट- 19,281,340, 22.23 फीसदी वोट शेयर, घटा- 3.68 फीसदी
2012
सपा – 22,090,571, 29.15 फीसदी, बढ़ा, 3.72 फीसदी
बसपा – 19,647,303, 25.91 फीसदी- घटा- 4.52 फीसदी

भाजपा-11371080, 15 फीसदी, घटा- 1.97 फीसदी
2007
बसपा – 15,872,561, 30.43 फीसदी, बढ़ा- 7.37 फीसदी
सपा – 13,267,674, 25.43 फीसदी, बढ़ा- 0.06 फीसदी
भाजपा – 8,851,199, 16.97 फीसदी, घटा- 3.11 फीसदी

Post Author: thesundayviews

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