नेता जी ने अखिलेश की शादी और शिवपाल यादव ने आदित्य की शादी में दहेज नहीं लिया : राज बहादुर यादव

दहेज लेने वाले लोग भिखारी से भी बदत्तर होते हैं 

शेखर यादव

इटावा। दहेज वो शब्द है जिसने अनगिनत परिवार की खुशियों पर ग्रहण लगा दिया। दहेज की वजह से देश की बेटियां जब दम तोड़ती हैं तो उसके मां-बाप पर क्या गुजरती है,बयां करने के लिये शब्द कम है। जिसने अपनी सोन चिरैया,अपनी दुलारी बच्ची को सीने से लगाया हो और कल्पनाओं की लंबी उड़ान भर,सोचा हो कि मेरी बिटिया बड़ी होगी,कोई राजकुमार आयेगा और उसे हंसी-खुशी विदा कर अपने घर ले जायेगा लेकिन…। जब पापा की सोन चिरैया दहेज की वजह से अपने ससुराल में मारी जाती है तो उस वक्त गरीब,बेबस मां-बाप के जेहन में बस एक ही बात कौंधती है कि काश मैं धनवान होता…। ससुराल वाले दहेज के लिये मुंह खोले थे,दे पाता तो आज मेरी परी,सोनचिरैया जिंदा होती…। लेकिन इस प्रथा पर रोक लगाना ही होगा और इसके लिये हम सभी को इस बात का संकल्प भी लेना होगा कि अपने बेटों की शादी में दहेज के रुप में सिर्फ दुल्हन लायेंगे। मैंने भी अपने सभी बच्चों की शादी की लेकिन एक रुपये भी नहीं लिया क्योंकि मुझे तो एक पिता से अपना सबसे बड़ा खजाना, अपनी बेटी जो दिया है…। बदलाव की बयार है और धनवान लोग भी दहेज रहित शादी को तवज्जो दे रहे हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश की शादी में और शिवपाल सिंह यादव ने अपने बेटे आदित्य यादव की शादी में एक रुपये का दहेज नहीं लिया। काश! ये संदेश समाज में जाता तो हो सकता है कि सभी वर्ग के घरानों में भी बेटियां बिना दहेज लायी जातीं। पूर्व अपर महाधिवक्ता राजबहादुर यादव ने द संडे व्यूज़ के संवाददाता शेखर यादव से दहेज जैसे ज्वलंत मुद्दे पर अपनी बात रखी।

पूर्व अपर महाधिवक्ता ने कहा कि भारतीय समाज के लिये दहेज एक अभिशाप है। दहेज ने बेटियों के जीवन को दूभर कर दिया है। दहेज प्रथा के खिलाफ समय-समय पर देशभर में आंदोलन होते रहे हैं। नवाचार की क्रांति के माध्यम से समाज से दहेज के समूल को नष्ट करने के प्रयास किये जाते रहे हैं। हमारे माननीय हमेशा महिलाओं के लिये क्रांतिकारी योजनायें चलाते हैं और समाज को यह संदेश देते हैं कि महिलाओं का सम्मान करो। भारतीय संसद ने भी समय-समय पर दहेज के खिलाफ विधि विधान का निर्माण किया है तथा समाज में दहेज समर्थक विचारों का अंत करने का प्रयास किया है। आवश्यक रूप से दहेज दिये जाने की प्रथा को नष्ट करने के अपने सारे प्रयास किये हैं। श्री यादव ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम, दहेज अधिनियम बनाकर भारत की संसद में दहेज जैसे अभिशाप से महिलाओं के संरक्षण के पूरे प्रयास किये हैं। दहेज संबंधी अपराधों में दहेज मृत्यु सबसे जघन्य अपराध है। समाज के लिये यह एक विकराल समस्या है और इससे निपटने के लिये भारतीय दंड संहिता के अधीन संपूर्ण प्रावधान किये गये हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी, दहेज मृत्यु से ही संबंधित है। श्री यादव ने कहा की यदि दहेज बंद हो जाये तो दहेज उत्पीडऩ के मुकदमे लिखने भी बंद हो जायेंगे। यह एक कड़वा सच है और यह मेरा अपना अनुभव भी है।

उन्होंने कहा कि सरकारें लंबे समय से दहेज प्रथा को खत्म करने का प्रयास कर रही है लेकिन समाज पर इसका कोई असर नहीं है। पहले प्रचलन में भेंट स्वरूप बेटी को उसके विवाह पर उपहार स्वरूप कुछ दिया जाता था परन्तु आज दहेज प्रथा एक बुराई का रूप धारण करती जा रही है । दहेज के अभाव में योग्य कन्याएं अयोग्य वरों को सौंप दी जाती हैं। ऐसी स्थिति में पारिवारिक जीवन सुखद तो नहीं दुखद हो जाता है। गरीब परिवार के माता-पिता अपनी बेटियों का विवाह नहीं कर पाते, क्योंकि समाज के दहेज-लोभी व्यक्तिउसी लडक़ी से विवाह करना पसंद करते हैं जो अधिक दहेज लेकर आती हैं। उसके बाद चाहे वह सारी उम्र खून के आंसू रोये, वह उसे मंजूर है।

पूर्व अपर महाधिवक्ता ने यह भी कहा कि हमारे देश में दहेज प्रथा एक ऐसा सामाजिक अभिशाप है जो महिलाओं के साथ होने वाले अपराध, चाहें वो मानसिक हो या फि र शारीरिक हो,सभी अपराध को बढावा देता है। इस व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले लिया है। संपन्न परिवार की बेटी के विवाह में किये गये व्यय को अपने लिये एक निवेश मानते हैं। उन्हें लगता है कि बहूमूल्य उपहारों के साथ बेटी को विदा करेंगे तो यह उनकी अपनी प्रतिष्ठ ा को बढ़ायेग। इसके अलावा उनकी बेटी को भी ससुराल में सम्मान और प्रेम मिलेगा। मध्य वर्गीय परिवार में बेटियां जैसे-जैसे बड़ी होने लगती हैं पिता के माथे पर चिंता की लकीरें दूर से नजर आने लगते है।ं उसे लगता है कि वह अपनी बेटी के शादी के लिये धन की व्यवस्था कैसे करेगा… क्योंकि उसे अहसास है कि यदि दहेज के बिना शादी कर दी तो उसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे।

पूर्व अपर महाधिवक्ता ने यह भी बताया कि सैफ ई में पहले कपड़ा फ ाड़ होली खेली जाती थी। एक बार मैं होली पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के आवास पर गया। लोगों ने मेरे कपड़े फ ाड़ दिये तो मैंने नेता जी से कहा कि बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास एक जोड़ी कपड़े हैं वह क्या करेंगे? नेताजी ने उसी समय कहा कि होली अब फू लों से खेली जाये। उसका असर यह हुआ कि सिर्फ सैफ ई में ही नहीं समाजवादी पार्टी के कई नेता कार्यकर्ता और नेताजी को आदर्श मानने वाले समाज के कई लोगों ने फू लों से होली खेलनी शुरू कर दी। मैंने अपने सभी बच्चों की शादियां बिना दहेज के की। मैं जानता हूं कि जिन परिवारों में शादियों में दहेज की प्रथा है वह कभी भी सुखी नहीं रह सकते। यह मेरा अपना अनुभव है।

Post Author: thesundayviews

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