स्त्रियों की दशा सुधरने के बाद ही विश्व कल्याण की बातें सच साबित होंगी

भारतीय व्यवस्था माता को ही बच्चे का पहला गुरु मानती हैं। गुरु वह होता हैं जो शिक्षा देता हैं, इसलिए मां का शिक्षित होना बहुत जरूरी है। रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्या बाई होल्कर जैसे अनेक उदाहरण हैं जो बताते हैं समान्य से लेकर राजपरिवार तक की स्त्रियों को युद्ध कौशल की कड़ी शिक्षा दी जाती थी।इसी प्रकार दक्षिण भारत सहित भारत के अनेक भागों में संगीत आदि कलाओ की शिक्षा भी स्त्रियों को दी जाती थी। परिवार चलाना और थोड़ा बहुत आर्थिक की समझ के लिए गणित की भी शिक्षा दिया जाता था।

प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक धर्मपाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ” द ब्यूटीफुल ट्री ” में लिखा है कि स्त्रियों को घर में ही पढ़ाने की शिक्षा दी जाती थी। 80 के दशक के पहले भारतीय खेलों में महिलाएं शायद ही खेलों का हिस्सा होती थी लेकिन तब पीटी ऊषा और शाइनी अब्राहम जैसी ज़ोरदार एथलीटों ने सारी तस्वीरें ही बदल कर रख दिया, तब यह भ्रम टूटा की महिलाएं कमज़ोर होती हैं। और दमखम में काफी पीछे हैं, ये 1952 की बात हैं ओलंपिक खेल हेलसिंकी में हो रहे थे, तब भारत की ओर से जिस महिला खिलाड़ी ने भाग लिया था वो थीं मेरी डिसूजा।क्या कभी कोई सोच सकता था कि नारी की स्वाधीनता पर खुलकर बात रखने वाली कोई नारी हो सकती हैं, जिस ने विश्व फलक पर बेबाक तरीक़े से नारी की आज़ादी को लेकर अपनी बात रखी वह थीं। प्रसिद्ध पुस्तक ” द सेकेंड सेक्स ”  की लेखिका सिमोन द बुआ, जिनके विचारों को अपने किसी रक्त संबंध का साथ नहीं मिला था बल्कि अपने ही  एक पुरुष मित्र का वैचारिक समर्थन उन्हें मिला, जो उनका आत्मबल सिद्ध हुआ। स्वामी विवेकान्द ने कहा था जब तक महिलाओं की स्थिति नहीं सुधरती तब तक विश्व कल्याण की बात सोचना बेमानी होगा।

 

Post Author: thesundayviews

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