कोरोना, जिंदगी और परीक्षा

शिक्षा हमारा संवैधानिक अधिकार है। इसे न तो कोई छीन सकता है और न ही कोई थोप सकता है। शिक्षा बोझ और तनाव की अवस्था नहीं है। शिक्षा औसत व्यक्ति के सामाजिक, मानसिक विकास के लिए अनिवार्य है। शिक्षा ही भविष्य का भारत तय करती है। जिन परीक्षाओं को लेकर हंगामा बरपा है, राजनीतिक पाले भी खिंचे हैं, फिर सर्वोच्च न्यायालय में दस्तक देने की तैयारी है, बेशक छात्रों में भी एक स्वाभाविक तनाव और चिंता के भाव होंगे, उन परीक्षाओं को ही जिंदगी नहीं माना जा सकता। नीट और जेईई की परीक्षाएं ही जिंदगी और लक्ष्य निर्धारित नहीं कर सकतीं। अलबत्ता वे जरिया जरूर हैं। जिन आंखों में एक योग्य डॉक्टर और एक कुशल इंजीनियर बनने के सपने तैरते रहे हैं, उन्हें एक परीक्षा ही कुंद नहीं कर सकती। ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज सरीखे विश्वविख्यात शिक्षण संस्थानों ने भी कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी के मदद्ेनजर परीक्षाएं स्थगित की हैं। सरकार परीक्षा के लिए अड़ नहीं सकती, क्योंकि इस सरकार को युवाओं का ही भरपूर समर्थन मिला था। देश में कोरोना की भयावह स्थिति है। एक ही दिन में 75,000 से अधिक मरीज सामने आये हैं।

संक्रमण का कुल आंकड़ा 33 लाख को पार कर गया है और मौतें 60,000 को लांघ गयी हैं। संख्या बढ़ रही है, यकीनन यह अभूतपूर्व स्थिति है। दो गज की दूरी, मास्क और हाथों की बार-बार सफाई ‘कागजी उपदेश’ हैं। यदि सरकार के मंत्री वेशभूषा और चेहरा-मोहरा बदल कर, अपने-अपने क्षेत्रों में, कुछ दिन घूम-फिर आयें, तो पौराणिक कथाओं की तरह यथार्थ सामने आ जायेगा। गली, बाजार, मंडी, संस्थान, दफ्तर या कोई भी आयोजन हो, कोरोना के प्रति सभी निश्ंिचत लगेंगे। लगता है, वे महामारी के जानलेवा संक्रमण से परिचित नहीं हैं या उन्हें मौत की परवाह नहीं है! देश के 11 राज्यों में बाढ़ से 1100 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इलाके कटे-फटे हैं, सडक़ें और पुल ध्वस्त हैं। ऐसे हालात में रेल या बस सरीखे सार्वजनिक परिवहन की कल्पना ही की जा सकती है अथवा सरकारी दावे ही सुने जा सकते हैं। यहां ऐसे दावों को चुनौती कौन दे सकता है? प्रवासी मजदूर और उनके परिवारों की हर तरह की मदद फिल्म अभिनेता सोनू सूद न करते, तो आज भी राजमार्गों या रेलवे पटरियों पर पैदल चलते ‘निरीह भारतवासी’ देखने को मिल सकते थे! सरकारें ऐसे हालात में सहयोग क्यों नहीं करतीं या क्यों नहीं पसीजतीं? हैरानी है! ऐसे ही माहौल में कोई परीक्षार्थी परीक्षा-केंद्र तक समयानुसार नहीं पहुंच पाया या वह और उसके मां-बाप कोरोना से संक्रमित हो गये, उसके बाद घर, गली, समाज और शहर-जिला में भी संक्रमण फैलता गया, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या सरकारें जवाबदेही स्वीकार करेंगी? नतीजतन छात्रों का एक साल भी बर्बाद हो सकता है, जिसकी दुहाई सरकारी ओहदेदार दे रहे हैं। छात्र की पढ़ाई पर जो लाखों रुपए खर्च किये गये थे,वे सब कुछ स्वाहा हो सकते हैं! हम नकारात्मक या निराशावादी नहीं हैं और न ही परीक्षाओं की अनिवार्यता को खारिज कर रहे हैं, लेकिन जो देखा और अनुभव किया है, उसे तटस्थ और राष्टï्रीय भाव से बयां कर रहे हैं। नया शैक्षणिक सत्र दिसंबर के बजाय जनवरी से शुरू किया जा सकता है। कोरोना महामारी के कारण असंख्य अनिश्चितताएं आयी हैं। करोड़ों नौकरियां गयी हैं और लाखों पर आशंकायें मंडरा रही हैं। सभी तरह के सिलसिले टूटे हैं और समझौते करने को विवश होना पड़ रहा है। क्या ये राष्ट्रीय नुकसान और संकट की स्थिति नहीं है? इन प्रतियोगी परीक्षाओं पर ही ऐसा सरकारी व्यवहार क्यों है कि वे सितंबर में ही आयोजित की जायेंगी? सर्वोच्च अदालत ने भी केंद्र सरकार को बाध्य नहीं किया था, सिर्फ 11 याचिकाएं खारिज की गयी थीं। आपदा प्रबंधन कानून के तहत केंद्र सरकार को विशेषाधिकार हैं कि वह परीक्षाएं टाल भी सकती है। सरकार व्यावहारिक दिक्कतों को समझे। हमारा अनुभव रहा है कि परीक्षा केंद्रों पर एक भीड़ जमा रहती है, थर्मल स्क्रीनिंग के या तो बंदोबस्त नहीं होते अथवा सरकारी कर्मचारी कोताही बरतते हैं। भीड़ में दो गज की दूरी संभव नहीं है या मौजूद अध्यापक लापरवाही से मास्क पहनते हैं। आम जीवन में भी इसे देखा जा सकता है। तनाव के ऐसे माहौल में औसत छात्र भी, तीन लगातार घंटों तक मास्क पहन कर, पूरी तरह एकाग्रचित होकर परीक्षा नहीं दे सकता। अंतत: नुकसान किसका है? प्रभावित कौन होगा? यदि कुछ राज्यों ने स्कूल-कॉलेज बंद रखने के आदेश की घोषणा कर दी है या नये सिरे से लॉकडाउन जारी रखा है, तो नीट और जेईई के परीक्षा-केंद्रों का क्या होगा ?

Post Author: thesundayviews

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