सहकारिता विभाग भर्ती घोटाला के विलेन नंबर 1: घोटालेबाज अफसरों को भाजपा सरकार में ‘गिफ्ट’ में मिली मलाईदार कुर्सी !

अखिलेश सरकार में 5127 पदों पर गलत तरीके से भर्ती करने वालों पर योगी सरकार क्यों है मेहरबान ?

सहकारिता विभाग भर्ती घोटाला विलेन नंबर 1: भ्रष्टï अफसरों पर होना चाहिये एक्शन, मंत्रीजी ने ‘सौगात’ में दिया ‘प्रमोशन’…

एसआईटी और शासन के बीच जांच के नाम पर खेला जा रहा है ‘चूहा-बिल्ली’ का गेम…

संजय पुरबिया
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में 2012-17 के दरम्यान सहकारिता विभाग में 5127 पदों पर नियुक्तियां निकाली गयी थी जिसमें अफसरों ने बेखौफ होकर लूट मचायी। विभाग के मंत्री शिवपाल सिंह यादव थे इसलिये सभी पदों पर एक ‘विशेष जाति’ के अभ्यर्थियों का ही चयन किया गया। शासन से लेकर सहकारिता विभाग के सभी अफसरों ने अधिसंख्य पदों पर अयोग्य अभ्यर्थियों का चयन कर यह साबित कर दिया कि जब ‘मंत्रीजी का आशीर्वाद’ मिले तो नियमों की धज्जियां जमकर उड़ाओ। वैसे भी सपा सरकार में भतीजा मुख्यमंत्री तो चाचा कद्दावर मंत्री थे। अब भला कौन मंत्री और उनके मुंहलगे अफसरों के खिलाफ आवाज उठाता। खैर,भर्ती हो गयी और बेरोजगारों का हक मारा गया। इसे बेरोजगारों की ‘बददुआ’ कहें या फिर यूपी की सियासत की ‘बाजीगरी’ कि बेरोजगारों और अवाम से सत्ता से अखिलेश सरकार को ‘बेदखल’ किया और उस पर भाजपा को ‘राज’ करने का मौका दिया। गिरते-पड़ते यूपी में भाजपा की सरकार चल रही है। योगी राज में किसानों से लेकर बेरोजगारों को रोजगार देने के लिये ढेरों वादे किये लेकिन सच्चाई जाननी हो तो किसानों और बेरोजगारों से सवाल करके कोई देखे…जवाब मिल जायेगा। भाजपा सरकार भी समाजवादी पार्टी की सरकार को ‘झूठे वादे’ करने के मामले में जबरदस्त टक्कर दे रही है। अब देखिए,भाजपा की सरकार बनने के बाद यूपी में एक के बाद एक सपा सरकार में हुयी भर्तियों में जांच बिठा दी गयी। इन्हीं में एक सहकारिता विभाग भी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 5127 पदों की भर्ती की जांच एसआईटी को सौंप दी। मुख्यमंत्री ने एसआईटी और सहकारिता विभाग के अफसरों को पत्र लिखकर दो माह के अंदर सभी पदों की भर्ती में हुयी अनियमितता की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। सहकारिता विभाग ने एसआईटी को सिर्फ 50 पदों की जांच सौंपी,शेष पदों की जांच दबा दी गयी। वहीं एसआईटी भी पत्राचार कर शांत बैठ गयी। आज ढाई वर्ष हो गये लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। बता दें कि इस विभाग के मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा हैं,जिन्होंने एसआईटी और शासन के अफसरों से आज तक यह जानने की कोशिश नहीं की कि भईया भर्ती में का हो रहा है ? खैर, मंत्री जी की खामोशी बता रही है कि इसके एवज में प्रमुख सचिव एम.वी.एस.रेडड्ी सहित सभी एजेंसी में बैठे सभी घाघ अफसरों ने चढ़ावा चढ़ा दिया होगा। अब बताते हैं कि 5127 पदों पर हुयी भर्ती में कौन-कौन से अफसर हैं,जिन्होंने ‘विलेन’ का रोल अदाकर ‘टैलेंटेट’ बेरोजगारों की किस्मत पर ‘ब्रेक’ लगा दिया है। द संडे व्यूज़ आपलोगों को भर्ती घोटाले के महाभ्रष्ट अफसरों का चेहरा दिखायेगा जिन्होंने सत्ता और पद के नशा में सैंकड़ों बेरेाजगारों की बद्दुआयें ली है।

1 ओंकार सिंह- अध्यक्ष सेवा मंडल एवं प्रबंध निदेशक उ.प्र.राज्य भंडारण निगम (सपा सरकार में)

ओंकार सिंह के पास समाजवादी पार्टी की सरकार में एक नहीं दो पद थे। उ.प्र.राज्य भंडारण निगम के साथ ही सेवा मंडल के अध्यक्ष भी थे। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सपा सरकार में उनकी क्या हैसियत थी। ओंकार यादव ने उस दौरान 12 पदों पर उप-प्रबंधक,12 टी.ए. एवं 69 कनिष्ठ कार्यालय सहायक के पदों पर भर्ती की। मजे की बात यह है कि उप-प्रबंधक के 12 पदों में इनलोगों को 6 पद यादव,6 पद बैकवर्ड का करना था इसीलिये भर्ती प्रक्रिया की पूरी नियमावली को तार-तार कर दिया गया। खास बात यह है कि इनमें से अधिकांश अभ्यर्थियों के पास भर्ती में जो योग्यता मांगी गयी थी,नहीं था। सूत्रों ने बताया कि कई अभ्यर्थियों का मार्कशीट बदलकर बिना शासन से अनुमति लिये फर्जी तरीके से भर्ती कर लिया गया। ओंकार सिंह के रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भर्ती के समय एक पद पर रहते हुये उन्होंने भर्ती का प्रस्ताव भेजा और दूसरे पद यानि अध्यक्ष सेवामंडल रहते हुये बिना शासन की अनुमति लिये अयोग्य अभ्यथियों का चयन कर दिया। एक तरह से ओंकार यादव ने अपने दोनों पदों का भरपूर दुरुपयोग करने का काम किया।ओंकार यादव जानते थे कि वे बहुत बड़ी गल्ती कर रहे हैं इसीलिये वे इतनी हड़बड़ी में थे कि उप-प्रबंधक सहित सभी पदों की भर्ती को जल्दी से निपटाकर रिजल्ट घोषित कर देना चाहते थे। यही वजह है कि अभ्यर्थियों का चयन करने के बाद 6 नवंबर 2013 को उन्होंने प्रस्ताव भेजा, 23नवंबर 2013 को परीक्षा की तारीख घोषित की, 13 दिसंबर 2013 को परीक्षा करा दिया। उसके बाद 9 जनवरी 2014 को चयनित अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लिया गया और 10 जनवरी को 2014 को रिजल्ट घोषित कर दिया। इतना ही नहीं, 10 जनवरी को ही रिजल्ट एस. डब्लू. सी. यानि उ.प्र.राज्य भंडारण निगम भेज दिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि ओंकार यादव ने एस. डब्लू. सी. रिजल्ट क्यों भेजा,जबकि उसके भी प्रभारी यही थे? अगले दिन यानि 11 जनवरी 2014 को यादव जी ने दैनिक अखबार में रिजल्ट का प्रकाशन करा दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि अध्यक्ष ओंकार यादव उक् परीक्षा को कराने में इतने बेचैन थे कि उन्होंने किसी भी अभ्यर्थी का ना तो कैरेक्टर चेक कराया और ना ही पुलिस वेरिफीकेशन कराया। किसी भी परीक्षा में ये दोनों जांच इसलिये अनिवार्य होता है ताकि यह पता लग सके कि अभ्यर्थी के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा तो दर्ज नहीं है। फिर यादव जी,इतनी हड़बड़ी में क्यों थे? अफसरों की मानें तो एक पद पर 25 से 50 लाख रुपये की घूस ली गयी थी। अफसरों ने यह भी बताया कि ओंकार सिंह ने सपा सरकार में घोटाला कर इतनी अकूत संपत्ति बनायी है कि यूपी में उनका एक मेडिकल कॉलेज,एक इंजीनियरिंग कॉलेज और एक एम.बी.ए. कॉलेज चल रहा है। इसके अलावा और भी बेनामी संपत्तियां हैं। खैर ये तो जांच का विषय है,इससे हमलोगों को क्या लेना…।

Post Author: thesundayviews

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