स्त्री संघर्ष पुरुष सत्ता से है पुरुषों से नहीं

हिन्दी साहित्य में नारी की अस्मिता की पहली आवाज मीरा के काव्य में सुनाई पड़ती है। मीरा के काव्य में एक ओर स्त्री की पराधीनता और यातना की अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह निषेध है। पुरुष प्रधान समाज की यदि व्यवस्था थी तो इस बात के लिये नहीं थी कि इसमें महिलाओं को दोयम दर्जा दिया जायेगा, या उनके लिये जीना कठिन हो जायेगा। बल्कि इसलिये थी कि महिलाओं को और अधिक मजबूती प्राप्त हो, वो देश-समाज की रीढ़ बने और उन्नति करे। किन्तु अफ सोस सारी व्याख्याओं को पुरुष प्रधान समाज ने दरकिनार करते हुये महिलाओं के लिये जीना दूभर बना दिया। ये कह सकते हैं कि एक ऐसा निर्माण शुरू हो गया जिसमे महिलाओं की भागीदारी तो शत प्रतिशत होती है किन्तु उनको श्रेय नहीं मिलता. पर अब तो ये बात भी धीरे- धीरे दफ न होने लगी है क्योंकि कहा जाता है न कि नारी ने जो ठान लिया वो होता ही है।


आप देखिये कि पूरी दुनिया में होने वाले अन्याय-अत्याचार और अनाचार महिलाओं के इर्द-गिर्द ही अधिक संख्या में हैं। महिलायें ही केंद्र बिंदु है और उन पर ही अधिक से अधिक आक्रमण है, क्यों? क्योंकि महिला को सिर्फ एक देह उपभोग की वस्तु माना जाता रहा है। यह आज से नहीं है बल्कि ये एक तरह से सनातन है। हर युग में महिलाओं को उपभोग की वस्तु माना जाता रहा है। वजह भी यही है कि जब आप किसी को वस्तु की तरह मानते हैं तब उसके सामान अधिकार की बातें महज एक दिखावा भर रह जाती है। ये दिखावा छोटे-मोटे स्तर पर सतत जारी है. स्त्रीवाद में लिपटा एक बहुत बड़ा वर्ग भी स्त्रियों की भलाई में असमर्थ है और जितना कुछ समर्थता दिख रही है वह केवल स्त्री द्वारा ही स्त्री के लिये किये जाने वाले कार्य है। हालांकि, अभी भी महिलाओं को पुरुषो के सामान अधिकार प्राप्त नहीं है और ये जंग संभवत: आने वाले कई वर्षो तक जारी रहेगी। स्त्री संघर्ष पुरुष सत्ता से है पुरुषों से नहीं।इतिहास के अनुसार समानाधिकार की यह लड़ाई आम महिलाओं द्वारा शुरू की गई थी। प्राचीन ग्रीस में लीसिसट्राटा नाम की एक महिला ने फ्रें च क्रांति के दौरान युद्ध समाप्ति की मांग रखते हुये इस आंदोलन की शुरूआत की। फारसी महिलाओं के एक समूह ने वरसेल्स में इस दिन एक मोर्चा निकाला, इस मोर्चे का उद्देश्य युद्ध की वजह से महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार को रोकना था। सन 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका द्वारा पहली बार पूरे अमेरिका में 28 फ रवरी को महिला दिवस मनाया गया। सन 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्वारा कोपनहेगन में महिला दिवस की स्थापना हुई और 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में लाखों महिलाओं द्वारा रैली निकाली गयी। मताधिकार, सरकारी कार्यकारिणी में जगह, नौकरी में भेदभाव को खत्म करने जैसी कई मुद्दों की मांग को लेकर इस का आयोजन किया गया था। 1913-14 प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, रूसी महिलाओं द्वारा पहली बार शांति की स्थापना के लिए फ रवरी माह के अंतिम रविवार को महिला दिवस मनाया गया। उस समय विश्व के कुछ देशो में जूलियन कैलेंडर चलता था बाकी देशो में ग्रेगेरियन कैलेंडर इन दोनों की तारीखों में कुछ अंतर है। जूलियन कैलेंडर के मुताबिक फ रवरी का अंतिम रविवार की तारिख 23 थी जब की ग्रेगरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च था। इस समय पूरी दुनियां में ग्रेगेरियन कैलैंडर से चलता है इसी लिए 8 मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश तरक्की करे तो हमें महिलाओं को सशक्त बनाना होगा। भारतीय संस्कृति ने सदैव ही नारी जाती को पूज्यनीय एवं बंदनी माना है तभी तो कहा गया है -यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता: अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्यकाल से लेकर इक्कीसवीं सदी तक आते-आते महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है मध्यकालीन काव्य में मीरा को छोडक़र अन्य भक्त एवं संत कवियों ने नारी की सार्थकता पुरुष वर्चस्ववादी ढांचे में ही सुरक्षित की है। हिन्दी साहित्य में नारी की अस्मिता की पहली आवाज मीरा के काव्य में सुनाई पड़ती है। मीरा के काव्य में एक ओर स्त्री की पराधीनता और यातना की अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह निषेध है। साहित्य जगत में मीरा के अलावा महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान , महाश्वेता देवी, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मैत्रीय पुष्पा, सूर्य बाला जैसी अनेक महिला लेखिकाओं ने हर परिस्थितियों में साहित्य जगत को अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से शुशोभित किया है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा देशतरक्की करे तो हमें महिलाओं को सशक्त बनाना होगा। हमें यह बात नहीं भूलनी

Post Author: thesundayviews

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