लेखपाल ने वारिस के मुंह पर पत्रावली फेंकी या सरकार के?

सीएम की सोच की औरैया की तहसील में उड़ाई जा रही हैं धज्जियां

लेखपाल आलोक पाण्डेय ने मृतक के वारिस से विरासत बनवाने के लिए मांगा पैसा

60 दिन बाद भी विरासत क्यों नहीं बना,सवाल करने पर लेेखपाल ने वारिस के मुंह पर फेंकी पत्रावली

शेखर यादव

औरैया। क्या प्रधानमंत्री की किसान योजनाओं का लाभ सभी को मिल रहा है? क्या तहसीलों में बिना पैसा लिए लेखपाल और कानूनगो काम कर रहे हैं? गांव का कोई व्यक्ति की बीमारी से मौत हो जाती है और यदि वो तहसील में वारिस का विरासत दर्ज की पत्रावली बनवाने जाते हैं तो क्या उससे भी पैसा लिया जाता है? ये कुछ यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब या तो उस जनपद का एसडीएम या तहसीलदार ही दे सकता है… सही बात की जाए तो जितने सवाल ऊपर किए गए हैं,सभी में पैसा नहीं रुपए लिए जा रहे हैं। जो देगा उसका काम झट्ट से होगा,जो देने मे सक्षम नहीं है वो बेटा लगाता रहे तहसील का चक्कर,क्योंकि लेखपाल और कानूनगो ही वहां के मालिक होते हैं। यही लोग तहसीलदारों को हर दिन का एक बड़ा हिस्सा पहुंचाने का काम करते चले आ रहे हैं। एक छोटा सा मामला औरैया जनपद का है जहां एक व्यक्ति विरासत चढ़वाने तहसील जाता है लेकिन दो माह बाद भी उसका काम नहीं हुआ। जब लेखपाल से बात की तो उसने विरासत के दस्तावेज को उसके मुंह पर फेंक दिया।

औरैया तहसील के ग्राम फतेहपुर करम  निवासी स्व. हरगोविंद सिंह यादव का 21 अप्रैल को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उसके बाद उनकी संपत्ति उनके परिवार के सदस्यों के नाम हो जाए इसलिए उनका पुत्र दीपेन्द्र यादव तहसीलदार, औरैया को प्रार्थना पत्र दिया। लेखपाल और कानूनगो ने मृतक के वारिस को तहसील के चक्कर कटवाने शुरू कर दिए। दो माह बीत जाने के बाद जब वारिस लेखपाल आलोक पांडेय से पत्रावली के बारे में बात करने गया तो उसने बोला दक्षिणा कहां है। मतलब पूछने पर कहा कि यहां पर फ्री में कोई काम नहीं होता।

इस पर वारिस ने कहा कि मैं हराम का एक रुपए नहीं देता और फिर ये विरासत दर्ज करवाने का मामला है। इस पर झुल्लाकर लेखपाल ने उस दस्तावेज को फेंक दिया। जिस पर हरगोविंद सिंह का मृत्यु प्रमाण पत्र सहित सभी कागजात लगे हुए थे। जब दीपेंद्र ने निवेदन किया कि 60 दिनों के बाद आप मुझे फ ाइल फेंक रहे हैं ? इस पर लेखपाल का जवाब था किस फ्री में यहां पर कोई काम नहीं होता।

अगर लेखपाल और कानूनगो द्वारा सही समय पर कार्यवाही करते हुए यह खेती सभी हकदाओं के नाम आ जाती है तो इन सभी को प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का लाभ मिल जाता। अधिकारियों की घटिया सोच यह बताती है कि सरकार तो योजनाएं बहुत अच्छी बनाती है लेकिन अधिकारी जनता तक योजनाओं को पहुंचने ही नहीं देना चाहते हैं।

मुख्यमंत्री भले ही प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाने की नसीहत दें और सरकारी नंबरों पर शिकायत दर्ज कराने की योजना चलाएं लेकिन तहसीलों में जब तक कर्मचारियों की सोच सही नही होगी,गरीबों का भला नहीं होने वाला।

Post Author: thesundayviews

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