लोकसभा चुनाव : पीएम चाहें यूपी के होमगार्ड करें बरक्कत, योगी नही कर रहें नजरे इनायत…

 योगी जी, यदि होमगार्डों को पुलिस के बराबर वेतनमान दे दिए तो लाखों वोट पक्का वर्ना !

6 राज्यों ने संसदीय समिति के निर्देश पर लागू किया पुलिस के बराबर होमगार्डों का वेतनमान लेकिन यूपी…

सवाल : यूपी में पुलिस के बराबर वेतनमान हुआ तो कौन लेगा श्रेय सुप्रीम कोर्ट या यूपी सरकार?

लोकसभा चुनाव खोपड़ी पर,योगी की चुप्पी से कहीं 96 हजार होमगार्डों का वोट ना खिसक जाए !

होमगार्डों का वेतनमान बढऩे पर सरकार पर आएगा लगभग 8 करोड़ का अतिरिक्त खर्चं

15 फरवरी संभावित तारीख : यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस लेती है तो 1 लाख 18 हजार जवानों की बल्ले- बल्ले

संजय पुरबिया

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में इस बार जो तस्वीर सामने आ रही है,उससे एक बात तो तय है कि भाजपा के लिए जीत की राह आसान नहीं है। सभी राजनैतिक पार्टियों का एक ही मिशन है मोदी हराओ। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने भाजपा को हराने के लिए चक्रव्यूह बना लिया है। वहीं,कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका वाड्रा ने भी यूपी फतह करने के लिए चुनावी मैदान में हैं। सीधी बात करें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि सभी राजनैतिक पार्टियों के टार्गेट पर भाजपा यानि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लोकसभा चुनाव में बहुमत लाने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन वे अपने मतदाताओं को नजर अंदाज क्यों कर रहे हैं,समझ से परे है। यूपी में 94000 होमगार्ड और उनके परिवार हैं। ये वे मतदाता हैं, जो सत्ता बनाने और उसकी तस्वीर बदलने का माद्दा रखते हैं। होमगार्डों की लंबे समय से मांग चली आ रही है कि उन्हें भी पुलिस के बराबर वेतनमान दिया जाए। संसदीय समिति ने भी संस्तुति दे दी है कि देश के सभी राज्यों में होमगार्डों को पुलिस के बराबर वेतनमान दिया जाए। इसी कड़ी में पंजाब, बिहार, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश के बाद हाल ही में पांडीचेरी जैसे छोटे राज्यों में तैनात होमगार्डों को पुलिस के बराबर वेतनमान दिया जा रहा है, फिर यूपी में क्यों नहीं? बता दें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसदीय समिति ने भी अपनी संस्तुति दे दी है फिर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसे क्यों नही लागू कर रहे हैं। ये एक यक्ष प्रश्न है।

मेरा सवाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ये है कि लोकसभा चुनाव सिर पर है फिर 94000 होमगार्डों की इस मांग को पूरा क्यों नहीं कर रहे हैं? जवानों का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर संभावित फैसला 15 फरवरी को होना है। ये तारीख आगे भी बढ़ सकती है लेकिन इतना तो तय है कि आज नहीं तो कल सुप्रीम कोर्ट होमगार्डों के पक्ष मेें ही अपना फैसला सुनाएगी, क्योंकि अन्य राज्यों में भी सुप्रीम कोर्ट ने ही फैसला सुनाया है। यहां पर दो बातें निकल कर सामने आती है,पहला- यदि सुप्रीम कोर्ट लोकसभा चुनाव से पहले होमगार्डों के पक्ष में फैसला सुनाती है तो इसका इतने बड़े वोट बैंक का श्रेय किसे जाएगा सुप्रीम कोर्ट को या यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को ? यदि यूपी सरकार लोक सभा चुनाव से पहले अपनी एसएलपी सुप्रीम कोर्ट से वापस लेती है तो 94000 होमगाड्र्स और उनके परिवार का एक बड़ा वोट भाजपा के पक्ष में ही गिरेगा। इसे कोई विरोधी पार्टी रोक नहीं सकती। अब ये तो भाजपा को तय करना है कि वो इतने बड़े वोट बैंक को हाथ से जाने दे या फिर उनके दम पर एक बार फिर यूपी में कमल का डंका बजा दे।

लोकसभा चुनाव की बिगुल बज गई है। सभी राजनैतिक पार्टियां जुबानी जंग के साथ वोट बैंक हथियाने के सारे हथकंडे अपना रही है। सूबे में तैनात एक लाख अटठारह हजार होमगार्ड जितनी अपनी ड्यूटी में मुश्तैद रहते हैं,उतना ही वे मतदान करने में चौकन्ने रहते हैं। उन्हें मालूम है कि मतदान के दिन एक वोट की कितनी बड़ी कीमत देश को चुकानी पड़ती है। जवानों की एक कई मांगों में से एक मांग यह भी है कि जब उनसे पुलिस के बराबर काम लिया जाता है तो पुलिस के बराबर वेतनमान क्यों नहीं दिया जाता? बात में दम है।

थोड़ा पीछे चलते हैं। वर्ष 2016 में संसदीय समिति में इस मुद्दे को उठाया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरे भारत में लागू किया जाए। उसके बाद सभी प्रदेशों को निर्देश जारी कर दिया गया था। वर्ष 2016 में ही मिनीस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स (एनएचए) ने सभी प्रदेशों से रिपोर्ट मांगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सभी राज्यों में होमगार्डों को पुलिस के बराबर वेतनमान दिया जा रहा है या नहीं ? बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन अभी तक दिल्ली,बिहार,पंजाब,मध्य प्रदेश,हिमाचल एवं पांडीचेरी राज्य की सरकारें कर रही हैं। लेकिन,यूपी सरकार अभी तक अपने यहां इस वेतनमान को लागू नहीं किया है। 4 मई 2018 को भारत सरकार के सचिव सुरेन्द्र ठाकुर ने पत्र लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का यूपी सहित देश के सभी राज्यों में लागू किया जाए। पत्र में साफ तौर पर निर्देशित किया गया है कि होमगार्डों का ड्यटी भत्ता बढ़ाकर पुलिस के वेतनमान के बराबर किया जाए।

बता दें वर्ष 2017 में यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। उस समय मुख्य सचिव राहुल भटनागर थें और प्रमुख सचिव,वित्त अनूप चंद्र पाण्डेय। इनलोगों का तर्क था कि पुलिस के बराबर होमगार्डों का वेतनमान होने पर सरकार पर लगभग सात से आठ करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ बढ़ेगा। इसलिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखील कर दिया है। जब हाईकोर्ट ने आर्डर दिया था तब (एपीसी) तत्कालीन कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में दिसंबर 2016 में एक कमेटी गठित की गई। उन्होंने लिखित रूप से कहा भी था कि इस वेतनमान को लागू कर दिया जाए लेकिन तत्कालीन मुख्य सचिव ने आपातकालीन बैठक बुलाकर इसके विरोध में एसएलपी दाखिल करने का फरमान सुना दिया। और तब से लेकर आज तक सुप्रीम कोर्ट में पडऩे वाली तारीख दर तारीख पर शासन एवं होमगार्ड मुख्यालय के अफसर दिल्ली दौड़ लगा रहे हैं।

अब आखिर में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक सवाल है…। योगी जी,जब संसदीय समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने होमगार्डों के वेतनमान बढ़ाने की तरफदारी की तो आप इन पर नजरे इनायत क्यों नहीं कर रहे हैं ? इस समय मौका भी है और दस्तूर भी,यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी वापस ले लेती है तो 9400 होमगार्ड और उनके परिवार का वोट भाजपा की झोली में गिरेगा। यदि नहीं तो,इतने बड़े वोट बैंक पर विरोधियों की गिद्ध निगाहें लगी हुई है…। आखिर में एक कड़वी बात कहना चाहूंगा। यूपी में भी अन्य राज्यों की तरह होमगार्डों को पुलिस के बराबर वेतनमान आज नहीं तो कल देना ही पड़ेगा,क्योंकि ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अन्य राज्यों की सरकारें इसे लागू कर दी तो यूपी सरकार क्यों नहीं करेगी? देखना है,इस आदेश को लागू करके श्रेय कौन ले जाएगा सुप्रीम कोर्ट या यूपी की योगी सरकार !

 

 

Post Author: thesundayviews

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