शर्मनाक : होमगार्ड विभाग के मंत्री,अफसरों की बेहयाई लेकिन पुलिस विभाग ने बढ़ाई अपनी साख

बदायूं के आईजी,एसएसपी को सैल्यूट : पुलिसकर्मियों के एक दिन का वेतन मृतक के परिजनों को दिया

शर्मनाक : होमगार्ड विभाग के मंत्री,अफसरों की बेहयाई लेकिन पुलिस विभाग ने बढ़ाई अपनी साख

जो काम होमगार्ड विभाग के अफसरों को करना चाहिए उसे कर दिखाया पुलिस अफसरों ने

संजय पुरबिया

लखनऊ। बदायूं में अपनी जान पर खेलकर चोरी की वारदात रोकने वाले होमगार्ड छत्रपाल सिंह को बदमाशों ने गोलियों से भून दिया। जवान बदायूं-बिजनौर स्टेट हाईवे पर रघुनाथपुरम तिराहे पर पुलिसकर्मियों के साथ गश्त पर था। इस घटना से पुलिस विभाग के साथ-साथ होमगार्ड विभाग में हडक़म्प मच गया। होमगार्ड विभाग के अफसर मृतक जवान की कसीदें गढऩे में जुट गए लेकिन किसी ने उसके परिवार को मदद देने की बात जुबां से नहीं निकाली। सबने खामोशी की चादर ओढ़ ली। दूसरी तरफ,पुलिस विभाग के अफसरों ने मृतक जवान के परिजनों को 25 लाख रुपए की मदद कर यह साबित कर दिया कि अपने देश में पुलिस को नंबर वन का दर्जा क्यों दिया जाता है। पुलिस अफसरों ने अपने मातहतों के एक दिन का वेतन जांबाज शहीद छत्रपाल सिंह को दिया। छत्रपाल होमगार्ड था, इसलिए इस विभाग के अफसरों की पूरी जिम्मेदारी बनती थी कि ये लोग भी अपने वैतनिक अधिकारियों व कर्मचारियों से एक दिन का वेतन देने का आह्वान कर सकते थें। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

मेरा सवाल इस विभाग के मंत्री अनिल राजभर और मुख्यालय पर तैनात अफसरों से है…छत्रपाल ने अपनी जान पर खेलकर भ्रस्टाचार के मकडज़ाल में फंसे होमगार्ड विभाग का सिर गर्व से ऊंचा करने का काम किया। क्या इनलोगों की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वे अपने वेतन से एक दिन का वेतन शहीद छत्रपाल सिंह के परिजनों को दें? अरे,सरकारी सहायता राशि तो जब मिलेगी,तब देखा जाएगा लेकिन क्या जो काम पुलिस विभाग के अफसरों ने किया, ये लोग नहीं कर सकते थे? कितनी शर्मनाक बात है कि मृतक होमगार्ड था लेकिन पुलिस के अफसरों ने एक दिन का वेतन देकर खाकी की गरिमा को गौरवान्वित करने का काम किया।

इसके लिए द संडे व्यूज़ इंडिया एक्सप्रेस सहित उ.प्र. होमगाड्र्स अवैतनिक अधिकारी व कर्मचारी एसोसिएशन आईजी डीके ठाकुर व एसएसपी अशोक कुमार को सैल्यूट करता है। वहीं,होमगार्ड विभाग के अफसरों की इस शर्मनाक कार्यप्रणाली के लिए बरेली के मंडलीय कमांडेंट विनय कुमार मिश्रा व जिला कमांडेंट संदीप सिंह के लिए हमलोगों के पास निंदा करने के लिए भी शब्द कम पड़ रहे हैं…

बता दें कि हाड़ कंपाने वाली ठंड की रात 20 दिसंबर को जब लोग अपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे, उसी समय रात ढाई बजे 38 साल का होमगार्ड छत्रपाल अपने प्लाटून कमांडर के साथ रोड की पहरेदारी कर रहा था। कानून की रखवाली करते हुए उसने बदमाशों को टोक दिया, और इसके लिए उसको अपनी जिंदगी गंवानी पड़ी। पलाटून कमांडर राजेंद्र ने बताया कि दोनों रघुनाथपुर तिराहे के पास अलाव के पास बैठकर रोड की निगरानी कर रहे थे। तभी अचानक रघुनाथपुर की तरफ से दो लोग पैदल हाथों में सामान लेकर गुजरे। पीछे से दो लोग फि र निकल कर सामने आए, तब उसको शक हो गया। निहत्था होने के बावजूद उसका साथी छत्रपाल बदमाशों को ललकारने लगा।

बदमाश जंगल के रास्ते की तरफ बढऩे लगे तब नजदीक पहुंचकर उसने बदमाशों को अपनी मजबूत बाहों में जकडऩे का प्रयास किया। बदमाशों के पास बचने का एक ही विकल्प था, बस उन्होनें पलक छपकते ही फ ायरिंग शुरू कर दी। गोली छत्रपाल के सीने में जाकर धंस गई। इसके बावजूद भी बदमाशों को ललकारना उसने बंद नहीं किया। उसकी जुबान लडख़ड़ाने लगी थी और पुलिस की टीम मौके पर पहुंच गई। अस्पताल भेजा गया, लेकिन सांस सिर्फ पांच कि.मी. चलने के बाद थम गईं।पुलिस की टीम भी उस समय रोड की गश्त कर रही थी। घटना से महज पांच मिनट पहले गश्ती पुलिस टीम दोनों होमगार्ड के पास पहुंची थी।

पुलिस के मुताबिक जाबांज छत्रपाल ने खुद के मौजूद होने की हामी भरते हुए सब ओ. के. बोला था। महज पांच मिनट के बाद हुए घटना ने उसको मौत की नींद सुला दिया। मृतक होमगार्ड छत्रपाल की ड्यूटी एक दिसंबर से थाने पर लगी थी। पलाटून कमांडर राजेंद्र के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहा था। पुलिस के मुताबिक हमेशा अपना काम ईमानदारी से करने के बाद उसने अपने अफ सरों का दिल जीत लिया था। उसकी मौत के बाद पुलिकर्मियों एवं होमगार्ड की आंखों में आंसू छलक गए। छत्रपाल की मौत से उसके परिवार के अलावा गांव में कोहराम मच गया। शव के गांव पहुंचते ही गांव के लोगों की भीड़ उसके अंतिम दर्शन के लिए दौड़ पड़े थे। मृतक की पत्नी विमला एवं बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है। रिश्तेदारों ने बताया कि मृतक के पास दो बीघा जमीन है और दो बेटियों की शादी के बाद नेमश्री 14 वर्ष विजय 12 वर्ष पूनम 10 वर्ष रवि 8 वर्ष की जिम्मेदारी विमला के कंधों पर आ पड़ी है।

होमगार्ड छत्रपाल डयूटी के दौरान अपनी जान की बाजी लगाकर मरा नहीं बल्कि शहीद हो गया है। उसकी शहादत भले ही होमगार्ड विभाग के मंत्री अनिल राजभर ना समझें लेकिन जाते-जाते छत्रपाल होमगार्ड विभाग का मान बढ़ा गया। उसने साबित कर दिया कि होमगार्ड किसी मामले में पुलिस से कमतर नहीं है। तभी तो जब उसकी मौत की खबर लगी तो पुलिस विभाग के लोगों की आंखें नम थी…। सवाल यह है कि छत्रपाल के परिवार की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से उसकी पत्नी पर आन पड़ी है। सरकारी मदद तो मिलेगा ही लेकिन उसमें समय लगेगा। होमगार्ड विभाग के अफसरों की क्या जिम्मेदारी बनती है ? क्या वे लोग एक दिन का वेतन देने लायक नहीं है ?

कितना शर्मनाक है कि जो जवान अपनी डयूटी को ईमानदारी से निभाते हुए शहीद हो गया उसके अफसरों की सोच कितनी छोटी है…। मैं तो बरेली मंडल के मंडलीय कमांडेंट विनय कुमार मिश्रा और कमांडेंट संदीप कुमार सिंह से कह ही सकता हूं कि जागो प्यारे… मोहन….रत्ती भर शर्म हो तो अपने जांबाज,शहीद छत्रपाल के लिए कुछ करो ताकि इंसानियत के नाते विभाग आपलोगों का नाम ले…

Post Author: thesundayviews

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