स्वर्ण खदानों की काली कहानी है ‘केजीएफ’

‘बाहुबली’ एक ऐसी फिल्म थी जो तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री से निकल कर सारी दुनिया पर छा गई थी। इस फिल्म ने महज इतिहास नहीं रचा बल्कि दक्षिण की बाकी इंडस्ट्रीज को एक नई राह भी सुझाई। इस हफ्ते रिलीज हुई कन्नड़ फिल्म ‘केजीएफ: चैप्टर वन’ भी सिर्फ दक्षिण भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का दिल जीतने के लिए की गई एक कोशिश है। इसे मलयालम, तमिल, तेलुगु, हिंदी के अलावा चीनी और जापानी भाषाओं में भी बनाया गया है। केजीएफ यानी कोलार गोल्ड फील्ड्स। कर्नाटक का कोलार जिला सोने की खदानों के लिए जाना जाता है। इन्हीं खदानों के इर्द-गिर्द बुनी गई है फिल्म केजीएफ की कहानी। अंडरवल्र्ड भी इस विषय का एक हिस्सा है। विषय अलग था, कहानी फॉम्र्यूला, पर इसके स्क्रीनप्ले और प्रस्तुतिकरण में चटख रंग भर कर निर्देशक प्रशांथ नील ने एक सही दिशा पकड़ी है जो मसाला फिल्म प्रेमियों को पसंद आएगी।

यह फिल्म 1981 से शुरू होकर 2018 के दौर तक आती है। हम देखते हैं कि किस तरह पैसे और बाहुबल का लालच कुछ लोगों को इतना संवेदनहीन बना देता है कि वे कोलार स्थित सोने की खदानों को जिंदा शमशान में तब्दील कर देते हैं। एक ऐसी शमशान, जहां लोगों को जबरन लाकर उनसे खदान की खतरनाक परिस्थतियों में काम करवाया जाता है। कमजोरों और बीमारों को मार दिया जाता है क्योंकि वे काम नहीं कर सकते। सजा के तौर पर मारा जाती है या भूखा रखा जाता है। भूखा रखे जाने पर यहां के लोग एक पागल से कहानियां सुनाने की गुजारिश करते हैं, ताकि कम से कम वहां के बच्चे भूख से न रोएं। उस पागल व्यक्ति की कहानियों में अकसर एक मसीहा का जिक्र होता है, जो लोगों को कोलार सोना खदानों के मालिकों के जुल्म से मुक्त कराएगा। एक दिन यह मसीहा सचमुच आ जाता है।

फिल्म के हीरो रॉकी यानी यश के रूप में। यश दरअसल पहले मुंबई का एक डॉन था। बचपन में मां से किया गया ‘बड़ा आदमी’ बनने का वादा उससे यह सब करवा रहा है। यश एक मजदूर के वेश में खदान में एक खास मकसद के साथ आता है। धीरे-धीरे वहां के जुल्मों को देखने के बाद उसका मकसद और बड़ा हो जाता है। एक्टिंग के संदर्भ में बात की जाए तो एक बड़ा फलक तलाश रही ‘केजीएफ: चैप्टर वन’ जैसी फिल्म का भार लगभग पूरी तरह से एक्टर यश के कंधों पर है। बतौर एक्टर यश में वो शिद्दत है, जो रॉकी की भूमिका को निभाने के लिए चाहिए थी। हालांकि रोमांस के मामले में वह सहज नहीं रह पाते। अभिनेत्री श्रीनिधि शेट्टी खूबसूरत तो हैं पर एक्टिंग के मामले में वह कच्ची हैं। फिल्म में ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए तमन्ना भाटिया का एक आयटम गीत भी रखा गया है जो ठीकठाक ही है।

फिल्म में सोने की खदान में फिल्माए गए दृश्य बेहद प्रभावी लगे हैं। बताते हैं, इन दृश्यों को प्रभावी बनाने के लिए सेट पर सचमुच तापमान काफी बढ़ा दिया गया था ताकि कलाकारों के चेहरे पर गर्मी और उमस से परेशान मजदूरों वाले भाव आएं। फिल्म का पहला हिस्सा जो मुख्यत: मुंबई और बंगलुरु में रॉकी की जिंदगी से संबंधित है, थोड़ा ऊबाऊ है। पर फिल्म का दूसरा हिस्सा, जो सोना खदान से संबंधित है रोचक बन पड़ा है। इसके फिल्मांकन में निर्देशक का खास नजरिया दिखता है। सिनेमैटोग्राफी ने इन दृश्यों को और उम्दा बना दिया है।

हालांकि फिल्म के इंटरवेल से पहले वाले हिस्से की सिनेमैटोग्राफी कई जगह बचकानी भी है। फिल्म का एक विशेष बैकग्राउंड म्यूजिक है जो कुछ खास मौकों पर बजता है। यह प्रभावी बन पड़ा है। फिल्म में हिंसा के दृश्य काफी ज्यादा हैं। एक दृश्य में तो हीरो रॉकी खुद ही गिन कर बताता है कि उसने अभी-अभी 23 लोगों को मारा है। हर 20 मिनट बाद एक मारकाट का दृश्य है और लोग गाजर-मूली की तरह मारे जाते हैं। फिल्म की अवधि दो घंटे 50 मिनट है जो काफी लंबी है। हालांकि अगर आप दक्षिण भारतीय फिल्में पसंद करते हैं तो यह फिल्म आपको पसंद आएगी। अपने अलग अंदाज के लिए, एक और ‘लार्जर देन लाइफ’ हीरो की हीरोगिरी के लिए। और हां, बाहुबली की ही तरह केजीएफ का भी दूसरा पार्ट आएगा। इसे जिस मोड़ पर छोड़ा गया है, वह ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ जितना रोचक तो नहीं पर फिर भी एक उत्सुकता तो जगाता ही है। फिल्म का गीत-संगीत औसत ही है।

Post Author: thesundayviews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *