यह आदमखोर भीड़ कहां से आती है ?

दिव्या श्रीवास्तव
जान लेने वाली ये भीड़ सोशल मीडिया के नियमों पर चलती है और हिंसा को आगे बढ़ाती है। भीड़ जुटाने वाली इस डिजिटल हिंसा को एक अलग तरह की समझ की जरूरत है। भारत के इस मौखिक, लिखित व डिजिटल दौर में इन तीनों से हिंसा का खतरा और बढ़ सकता है। तकनीक की रफ्तार व भीड़ की तर्कहीनता बदलते समाज का खतरनाक लक्षण है। हाल ही में देश भर में कई जगहों पर मॉब लींचिंग की घटनाएं हुई हैं। झूठी अफवाहों के चलते भीड़ ने कई लोगों को मौत के घाट उतारा है। आखिर अचानक इतने लोग एक साथ एक ही मकसद से कैसे इक हो जाते हैं। भीड़ का मनोविज्ञान सामाजिक विज्ञान का एक छोटा-सा हिस्सा रहा है. यह एक अजीब और पुराना तरीका है जिसकी प्रासंगिकता समाज में स्थिरता आने और कानून-व्यवस्था के ऊपर भरोसे के बाद खत्म होती गई। भीड़ के मनोविज्ञान के ऊपर चर्चा एक अलग तरह की घटना के तौर पर शुरू हुई, जब हम फ्र ांसीसी क्रांति की भीड़ या फि र कुक्लक्स क्लान की नस्लीय भीड़ को इसका उदाहरण मानते थे। तब भीड़ के मनोविज्ञान में एक काले व्यक्ति को सफेद लोगों की भीड़ द्वारा मारने का पुराना मसला ही चर्चा का विषय होता था। यहां तक कि गॉर्डन ऑलपोर्ट और रोजर ब्राउन जैसे बड़े मनोवैज्ञानिक भी भीड़ के मनोविज्ञान को एक सम्मानजनक विषय नहीं बना सके. कुछ लोग इसे समाज विज्ञान और मनोविज्ञान तक पैथोलॉजी के तौर पर और अनियमित घटनाओं के रूप में सीमित रखते हैं। आज के समय में मार डालने वाली यह भीड़ हीरो बनकर उभरी है।


विशेषज्ञों का कहना है कि नायक के रूप में ये भीड़ दो अवतारों में दिखाई देती है। पहला, भीड़ बहुसंख्यक लोकतंत्र के एक हिस्से के तौर पर दिखती है जहां वह खुद ही कानून का काम करती है, खाने से लेकर पहनने तक सब पर उसका नियंत्रण होता है।आप देख सकते हैं कि भीड़ खुद को सही मानती है और अपनी हिंसा को व्यावहारिक एवं जरूरी बताती है। अफ राजुल व अखलाक के मामले में भीड़ की प्रतिक्रिया और कठुआ व उन्नाव के मामले में अभियुक्तों का बचाव करना दिखाता है कि भीड़ खुद ही न्याय करना और नैतिकता के दायरे तय करना चाहती है। यहां भीड़ (इसमें जान से मारने वाली भीड़ शामिल है) तानाशाही व्यवस्था का ही विस्तार है। भीड़ सभ्य समाज की सोचने समझने की क्षमता और बातचीत से मसले सुलझाने का रास्ता खत्म कर देती है। लेकिन, बच्चे उठाने की अफ वाह के चलते जो घटनाएं हुईं उनमें भीड़ का अलग ही रूप देखने को मिलता है। इसमें भीड़ के गुस्से के पीछे एक गहरी चिंता भी दिखाई देती है।

बच्चे चोरी होना किसी के लिए भी बहुत बड़ा डर है। ये सोचने भर से लोगों की घबराहट बढ़ जाती है. यहां भीड़ की प्रतिक्रिया के पीछे अलग कारण होते हैं। यहां हिंसा ताकत से नहीं बल्कि घबराहट से जन्म लेती है। इसका मकसद अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि अजनबियों और बाहरियों को सजा देना होता है जो उनके समाज में फि ट नहीं बैठते। दोनों मामलों में शक तो होता है, लेकिन मारने का कारण अलग-अलग होता है। एक मामले में अल्पसंख्यकों से सत्ता को चुनौती मिलती है और दूसरे में बाहरी और अनजान पर किसी अपराध का आरोप होता है। असम के कार्बी-आंग्लोंग जिले में भीड़ ने दो युवकों की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। दोनों ही मामलों में तकनीक इस गुस्से के वायरस को और फैलाने का काम करती है। तकनीक के इस्तेमाल से अफ वाहें तेजी से फैलती हैं और एक-दूसरे से सुनकर अफ वाह पर भरोसा बढ़ता जाता है। पहले तकनीक का विकास बहुत ज्यादा न होने के चलते अफवाहें ज्यादा खतरनाक रूप नहीं लेती थीं। लेकिन आज डिजिटल हिंसा छोटे शहरों और दूर-दराज के गांवों में ज्यादा भयावह तरीके से काम करती है।

ये साफ है कि हिंसा का ये तरीका एक महामारी जैसा है। हर बार शुरुआत एक जैसी होती है, हिंसा का तरीका एक जैसा होता है। हर मामले में अफ वाहें आधारहीन होती हैं। फि र ये तरीका एक से दूसरी जगह पहुंचता जाता है। त्रिपुरा में बच्चे उठाने के शक में तीन लोगों को भीड़ ने मार दिया। एक झूठे सोशल मीडिया मैसेज के चलते क्रिकेट बैट और लातों से मार-मार कर बेरहमी से उनकी जान ले ली गई। एक व्हाट्सऐप मैसेज ने तमिलनाडु में हिंदी बोलने वाले लोगों को संगठित कर दिया। अगरतला में बच्चे उठाने की अफ वाह में दो लोगों को मार दिया गया। इस सबके पीछे सोशल मीडिया जिम्मेदार है। यहां सब कुछ बहुत तेजी से होता है। किसी को शक हुआ, उसने मैसेज भेजा और भीड़ जमा हो गई। ऐसे में न्याय होने

की संभावना न के बराबर रह जाती है। इस हिंसा के पीछे चिंता और घबराहट के उस माहौल को जिम्मेदार माना जा सकता है जो ऐसे इलाकों में पैदा हुआ है जहां स्थानांतरण बहुत ज्यादा है। इन इलाकों में दूसरे राज्यों से रोजगार या अन्य कारणों के चलते लोग आकर बसने लगते हैं। उन्हें रहने की जगह तो मिल जाती है, लेकिन उन पर लोगों को विश्वास नहीं हो पाता. उन पर भरोसा होने में समय लगता है। यहां तक कि कुछ इलाकों में तो बाहर के लोग यानी प्रवासियों की संख्या पहले से रहने वाले लोगों के मुकाबले बढ़ भी गई है। प्रशासन इसे नियंत्रित करने की कोशिश करता है, लेकिन ये पूरी तरह कानून व्यवस्था का मसला नहीं है। इसे कानून व्यवस्था की समस्या के तौर पर नहीं बल्कि सामाज में बनी विसंगतियों के तौर पर ही सुलझाया जा सकता है।स्थानांतरण इनमें से एक समस्या है। इसके चलते किसी इलाके में बाहरी लोगों की संख्या बढ़ जाती है। पर सच ये भी है कि वो बाहरी तो होता है, लेकिन हाशिये पर भी होता है। दुखद ये है कि उसे ही खतरा मान लिया जाता है। फि र सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें उसके खिलाफ पहले से बनी सोच को और मजबूत कर देती हैं। सबसे बुरा तो ये था कि अगरतला में भीड़ ने उस 33 वर्षीय शख्स को मार दिया जिसे लोगों को जागरूक करने का जिम्मा सौंपा गया था. यहां भी कहानी का एक अलग पहलू सामने आता है। पीडि़त सुकांत चक्रवर्ती को अफ वाहों से बचने के लिए गांव-गांव में घूमकर लाउडस्पीकर से लोगों को जागरुक करने का काम दिया गया था। उनके साथ घूम रहे दो और लोगों पर भी भीड़ ने हमला किया। यहां लाउडस्पीकर से संदेश पहुंचाने की कोशिश एसएमएस और सोशल मीडिया की तेजी और ताकत के सामने पीछे रह गई।जान लेने वाली ये भीड़ सोशल मीडिया के नियमों पर चलती है और हिंसा को आगे बढ़ाती है. भीड़ जुटाने वाली इस डिजिटल हिंसा को एक अलग तरह की समझ की जरूरत है. भारत के इस मौखिक, लिखित और डिजिटल दौर में इन तीनों से हिंसा का खतरा और ज्यादा बढ़ सकता है। तकनीक की रफ्तार और भीड़ की तर्कहीनता बदलते समाज का खतरनाक लक्षण है.

Post Author: thesundayviews

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