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दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र मे चुनी हुई सरकारें ही महत्वपूर्ण हैं और उसके काम में दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। वहां बीते कुछ वर्षों में दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों की खींचातानी में हालत यहां तक बिगड़ गई कि निर्वाचित सरकार होने के बावजूद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को धरने और आंदोलन का सहारा लेना पड़ा।हम दुनिया में अपने आपको सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर इतराते हैं, लेकिन राजधानी में ही जो हालात बने हुए हैं, वेलोकतंत्र की मर्यादा की धज्जियां उड़ाते हैं। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लोकतंत्र के तकाजों पर हीजोर दिया है।

दिल्ली सरकार के अधिकारों पर आम आदमी पार्टी की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा कीअध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि सबको संविधान के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। केंद्रऔर राज्य के बीच रिश्ते सौहार्दपूर्ण होने चाहिए।फैसले में साफ कहा गया है कि केवल पुलिस कानून व्यवस्था और जमीन के मामले एलजी के पास होंगे, अन्य सभीमामलों में चुनी हुई सरकार कानून बना सकती है। संविधान पीठ ने कहा है कि एलजी को मंत्रिमंडल की राय कासम्मान करना चाहिए और उसकी राय पर काम करना चाहिए। अगर दिल्ली सरकार और उप-राज्यपाल के बीच किसीविषय पर सहमति नहीं हो तो वह मामला निस्तारण के लिए राष्ट्रपति के पास भेजे जाने का प्रावधान है।फैसले में यह नसीहत भी है कि दिल्ली में अराजकता की कोई जगह नहीं है। एक मुहावरा है, ‘रीड बिटविन द लाइन्स’यानी जो लिखा गया है, उसमें उस बात को भी समझ लेना, जो नहीं लिखी गई है। इस मुहावरे के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने आप सरकार के आंदोलन वाले रवैये की खिंचाई की है, साथ ही एलजी के माध्यम से केंद्र सरकार को भी साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में एकतरफ ा शक्ति किसी के पास नहीं होती और शक्ति संतुलन में ही सबका हित है। कायदे से इस फैसले के बाद आप और भाजपा दोनों को खींचातानी खत्म करने की नेक नीयती दिखानी चाहिए थी। लेकिन फैसला आते ही, किसकी जीत हुई, और किसकी हार यह साबित करने का नया खेल शुरु हो गया।भाजपा इस बात से खुश है कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे को अदालत ने नकार दिया है, तो आप इस बात का जश्नमना रही है कि अब उसके अधिकारों पर एलजी अडंगा नहीं डाल पाएंगे। इनके बीच अधिकारियों का भी एक तबकाहै, जिस पर सरकार के निर्णयों को लागू करने की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे भी शायद लोकतंत्र से अधिक अपने अहम को दिखाने की चिंता है। अदालत के फैसले के बाद सर्विसेज विभाग अब एलजी नहीं बल्कि दिल्ली सरकार के अधीन है और नियुक्ति व तबादलों का अधिकार भी दिल्ली सरकार को मिल गया है। अगर एलजी या सर्विसेज विभाग दिल्ली सरकार के फैसलों को नहीं मानेंगे तो प्रशासनिक संकट खड़ा हो जाएगा। यानी कामकाज एक बार फि र ठप्प होगा और इसका खामियाजा आम जनता उठाएगी। लेकिल सर्विसेज विभाग के अफ सरों का मानना है कि सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में 2016 में आई अधिसूचना के बारे में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया है, जिसमें अफ सरों की नियुक्ति और ट्रांसफ र का हक एलजी को दिया गया था। लिहाजा अफ सरों ने पुराने हिसाब के मुताबिक काम करने का फैसला किया है जिसमें ये विभाग एलजी के पास था।दिल्ली में आगामी तकरार की यह पहली झलक, फि ल्मी भाषा में कहें तो टीजर है, जो बता रहा है कि आगे क्या हो सकता है। जैसे पुलिस, केंद्र के अधीन ही रहेगी और आप हमेशा की तरह शिकायत करने से बाज नहीं आएगी। एलजी और सरकार में मतभेद होने पर एलजी उसे सुलझाने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजेंगे, यानी केंद्र का दबदबा कायम रहेगा ही। इस तकरार और टकराव में बड़ा सवाल यह है कि आखिर दिल्ली पर कब्जे की लड़ाई कितनी लंबी चलेगी और कब तक जनता के अधिकार अहंकार की फ ाइलों में दफ न रहेंगे।

Post Author: thesundayviews

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