गोरखपुर चुनाव की जातीय समीकरण दिखी कैराना में

गोरखपुर, फूलपुर और अब कैराना की हार,क्या मोदी और योगी का जादू कम हो रहा है

गन्ना किसानों का 900 करोड़ का बकाया, बूथ पर दिखा किसानों के गुस्से का कहर
ब्यूरो

लखनऊ।

गोरखपुर,फूलपुर और अब कैराना की बड़ी हार। तीनों हार के लिए जिम्मेदार कौन है? सरकार के मंत्री या कार्यकर्ता…। सभी पार्टियों में हार के बाद मंथन होता है,भाजपा में भी महामंथन शुरू हो गया होगा लेकिन पार्टी के शीर्ष को जमीनी स्तर पर भी देखना होगा कि आखिर गोरखपुर में सीएम योगी आदित्यनाथ और कैराना में मेरठ एक्सप्रेस वे के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र योगी ने मतदान से पहले रोड शो किया,लेकिन किसी परिणाम क्या निकला…। क्या ये मान लिया जाए कि मोदी और योगी का जादू खत्म हो रहा है? ये सवाल किसी को हजम नहीं होगा लेकिन तीनों हार के लिए जिम्मेदार कौन है ये तो पार्टी हाईकमान को जानना ही होगा। नतीजों से साफ है कि भाजपा को न केवल रणनीति में बड़ा बदलाव करना होगा बल्कि विपक्ष ने उसे उसकी ही जिस जातीय गणित के सहारे मात दी है, उसे और मजबूत करने के लिए सत्ता- संगठन से जुड़े कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।


भाजपा में हार को लेकर युद्ध स्तर पर मंथन शुरू हो गया है। पार्टी ने इस बार फू लपुर और गोरखपुर उपचुनाव से कुछ अलग रणनीति बनाकर चला था लेकिन मिली करारी हार। जिला प्रभारी मंत्री, कई मंत्री और पदाधिकारियों को चुनाव में लगाया गया। संगठन मंत्री सुनील बंसल ने स्वयं मोर्चा संभाल रखा था। बावजूद इसके राष्टï्रीय अध्यक्ष अमित शाह के 50 फ ीसदी मत हासिल करने के लक्ष्य को पार्टी हासिल नहीं कर सकी। दूसरी तरफ, विपक्ष 50 फ ीसदी से ज्यादा वोट हासिल कर साबित कर दिया कि वे भाजपा से बेहतर रणनीति बनाकर चुनावी मैदान में उतरे थें। यूं कहा जाए कि विपक्ष भाजपा को उसकी ही जातीय गणित से मात देने में कामयाब रहा। अगर लोकसभा चुनावों को छोड़ भी दें तो विधानसभा चुनावों में भाजपा ने गैर जाटव, गैर यादव ओबीसी के साथ ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और अन्य अगड़ी जातियों के सहारे जीत हासिल की। पश्चिमी यूपी में भाजपा जाट मतों को हासिल करने में कामयाब हुई थी। साथ ही छोटे दलों जैसे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी व अपना दल सोनेलाल से सटीक गठबंधन किया।

कहना गलत नहीं होगा कि फू लपुर, गोरखपुर में विपक्ष ने कुछ ऐसा ही गठजोड़ किया। गोरखपुर में निषाद पार्टी के ही नेता को सपा का टिकट दिया, वहीं फू लपुर में भाजपा के पटेल प्रत्याशी के सामने पटेल को उतार कर भाजपा के वोटों में सेंध लगाई। विपक्ष ने भाजपा की इसी रणनीति की काट के रूप में जाट वोटों के बंटवारे के लिए रालोद को आगे किया। रालोद के बैनर तले मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारा गया, जो सपा की नेता थीं। कमोबेश गोरखपुर जैसी रणनीति अपनाई गई। जहां गोरखपुर में निषाद वोटों के बंटवारे से भाजपा की हार हुई थी। वहीं कैराना में जाट वोटों के बंटवारे से हार हुई है।

इस चुनाव में मतदाताओं की उदासिनता भी भाजपा के हार का प्रमुख वजह माना जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर मतदाता इनसे उदासीन क्यों है,इस पर विचार करना होगा। भाजपा के मंत्रियों द्वारा कार्यकर्ताओं की अवहेलना करने एवं थाने से लेकर तहसील तक फैल रहे असंतोष को दुरुस्त करना भी हार की वजह माना जा रहा है। गन्ना बकाए का करीब 900 करोड़ रुपये कैराना और आसपास के इलाके में बकाया है। इसे लेकर भी किसानों में नाराजग़ी रही। इस चुनाव परिणाम का असर आने वाले दिनों में भाजपा के सत्ता व संगठन में दिखाई देगा। अगर संगठन जीत दिलाने में कामयाब नहीं रहा तो मंत्रियों का भी असर नहीं दिखा।

Post Author: thesundayviews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *