असफलताओं में 150 का आंकड़ा पार, योगी सरकार कटघरे में

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बहुत कुछ करना चाहती है। योगी सरकार के शिक्षा मंत्री स्वंय प्रोफेसर है, ज्ञान का भण्डार है इसके बावजूद माध्यमिक शिक्षा के जिस क्षेत्र में अंकुश लगाया जाना था, जहॉ निरीक्षण परीक्षण और अंकुश के साथ दण्डात्मक कार्रवाई करनी था वहॉ कुछ न करे केवल परीक्षा में नकल रोकने के नाम पर जारी आदेश की दहशत फैलाकर उत्तर प्रदेश के लगभग 11 लाख 27 हजार 815 परीक्षार्थी को अप्रत्यक्ष तरीके से परीक्षा से बाहर कर दिया गया। यह अलग बॉत है कि भय को भूत समझकर इतनी भारी तादत में छात्र छात्राओं ने अपने भविष्य से खिलवाड़ किया और इधर जो नही डरे उन पर बोर्ड ने उदारता दिखाई और पास न हो पाने वाले छात्र भी द्वितीय श्रेणी में पास हो गए। ऐसा भी हुआ कि परिणाम की पोटली जब सामने आई तो प्रदेश के एक दो नही बल्कि 150 स्कूल ऐसे निकले जहॉ एक भी विद्यार्थी पास ही नही हुआ और यह इस बॉत का प्रतीक है कि माध्यमिक शिक्षा के प्रति सरकार का ठोस नजरिया था ही नही।

उत्तर प्रदेश के डेढ़ सौ स्कूलों की शत-प्रतिशत असफलता बताती है कि देश की शिक्षा व्यवस्था में कई बड़े बदलाव करने का वक्त आ गया है। रिकॉर्ड बनाना उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड मानक बन चुका हैं। इसको देश का और दुनिया का सबसे बड़ा बोर्ड माना जाता है। सबसे ज्यादा छात्र इसी के सहारे शिक्षित होते हैं। लेकिन इस बार बोर्ड के नतीजों में जो एक रिकॉर्ड सामने आया है, वह प्रदेश में शिक्षा की स्थिति की अलग ही कहानी कहता है। उत्तर प्रदेश में 150 स्कूल ऐसे हैं, जहां कोई भी छात्र पास नहीं हो सका। दिलचस्प है कि यह उस साल हुआ है, जब उत्तर प्रदेश बोर्ड में रिकॉर्ड संख्या में छात्रों ने सफलता दर्ज कराई है। यह मामला किन्हीं एक-दो जिलों का नहीं है। शत-प्रतिशत असफलता का रिकॉर्ड दर्ज कराने वाले स्कूलों का भूगोल बहुत बड़ा है। ये स्कूल उत्तर प्रदेश के 75 में से 50 जिलों में फैले हुए हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश का गाजीपुर इनमें अव्वल है तो आगरा दूसरे स्थान पर है। इन 150 स्कूलों में सबसे ज्यादा इसी जिले से हैं। जिस दिन बोर्ड के नतीजे आए थे, उसके अगले दिन पता चला कि इलाहाबाद की अंजलि ने सर्वोच्च मेरिट लिस्ट में सर्वोच्च स्थान पाकर जिले का नाम ऊंचा किया उसी जिले के छह स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी बच्चा पास नहीं हो सका। इन 150 स्कूलों में सरकारी स्कूल भी हैं, सरकार से आर्थिक मदद पाने वाले स्कूल भी और निजी स्कूल भी शामिल है यानी शिक्षा के सभी क्षेत्रों ने इसमें भरपूर भूमिका निभाई है। यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस उपलब्धि का सेहरा किसके सिर बांधा जाए?

छात्रों को कठघरे में खड़ा करना आसान है, क्योंकि असफलता तो उनके खातों में बाकायदा दर्ज हो चुकी है। लेकिन किसी कक्षा, किसी स्कूल, किसी गली, किसी मोहल्ले, किसी गांव के सारे ही छात्र फेल होने लायक हों, इसे न तो कोई शिक्षा-शास्त्र स्वीकार करेगा और न ही कोई समाज-शास्त्र। शिक्षा की एक सोच यह भी कहती है कि फेल छात्र नहीं होते, फेल तो दरअसल शिक्षक होते हैं। इस नाते हम चाहें, तो शिक्षकों को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं, लेकिन एक सिरे से सारे शिक्षक नहीं पढ़ाते होंगे या खराब पढ़ाते होंगे, इस बात को किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी ही बात स्कूलों के बारे में भी कही जा सकती है। वैसे एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश में सरकार ने नकल को रोकने और पास होने के लिए गलत तरीके अपनाए जाने पर काफी सख्ती बरती थी, इसलिए भी कुछ खास क्षेत्रों में परीक्षा के नतीजे बहुत खराब रहे। लेकिन यह तर्क भी आसानी से हजम होने वाला नहीं है कि प्रदेश के 150 स्कूल नकल और अनुचित तरीकों के भरोसे ही अपनी व्यवस्था चला रहे थे।

प्रदेश सरकार ने नकल और अनुचित तरीकों के खिलाफ सक्रियता दिखाकर बहुत अच्छा काम किया है। लेकिन इसका अगला कदम ऐसी व्यवस्था बनाने का होना चाहिए कि नकल की नौबत ही न आए। ऐसी व्यवस्था, जिसमें छात्र की प्रतिभा किसी एक परीक्षा के बल पर नहीं, बल्कि साल भर की उसकी पढ़ाई से मापी जाए। ऐसा हुआ, तो उन स्कूलों का भी भला होगा, जो अभी शत-प्रतिशत असफलता की बदनामी ढोने को मजबूर हैं। सबसे बड़ी बात है कि उन छात्रों का भला होगा, जिन्हें पढ़ाई से ज्यादा परीक्षा की तैयारी करनी होती है। यूपी बोर्ड की परीक्षा में सरकार ने जिस तरह की सख्ती बरती, उसका असर परीक्षा परिणाम में नहीं दिखा। पिछले वर्षो की अपेक्षा हाईस्कूल व इंटर का सम्पूर्ण परिणाम कुछ गिरा जरूर लेकिन, जिस तरह के परिणाम की चर्चा और कल्पना की जा रही थी, वैसा बिल्कुल नहीं हुआ।

नकल रोकने वाले अफसरों ने परिणाम में अंक लुटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी और तो और जिस मॉडरेशन अंक प्रणाली के जरिये परिणाम सुधारने की चर्चा है, उसके मानक भी टूटे हैं। क्योंकि मॉडरेशन लागू होने पर भी अधिकतम अंक देने का नियम तय है। सर्वविदित है कि अधिकतम आठ अंक तक परीक्षार्थियों को देने का निर्देश पहले रहा है। बोर्ड के परीक्षार्थियों को इससे अधिक अंक मिले हैं। सोशल मीडिया पर परिणाम आने के बाद उत्तर पुस्तिकाएं जांचने वाले परीक्षक ही रिजल्ट की असलियत बता रहे हैं। कुछ परीक्षकों ने बोर्ड के गोपनीय एवार्ड ब्लैंक ओएमआर शीट (मूल्यांकन केंद्र से बोर्ड को अंक भेजने वाला पेज) तक अपलोड करके दावा किया है कि ये किस तरह से अंक बांटे गए हैं। एक परीक्षार्थी को एवार्ड ब्लैंक में विज्ञान विषय में मात्र दो अंक मिले हैं, उसके इंटरनेट अंकपत्र पर ये अंक बढक़र 23 हो गए हैं। ऐसे ही रसायन विज्ञान में एक परीक्षार्थी को एवार्ड ब्लैंक में पांच अंक मिले हैं, जबकि अंकपत्र पर यह बढक़र 19 हो गए हैं।

सोशल मीडिया पर जारी परीक्षकों ने विज्ञान, गणित, रसायन विज्ञान आदि विषयों का जो एवार्ड ब्लैंक पोस्ट किया है, उसमें बड़ी संख्या में परीक्षार्थियों को दो से लेकर नौ अंक तक मिले हैं। जिन्हें दहाई में अंक मिले हैं वह भी अधिकतम 29 अंक तक सीमित हैं। मॉडरेशन लागू होने का यह भी नियम है कि प्रश्न गलत हो या परीक्षार्थियों को सवालों का जवाब देना कठिन हो जाए। इसमें एक सवाल पर इस बार बवाल मचा था, बाकी बड़ी संख्या में परीक्षार्थियों के लिए पूरी परीक्षा ही कठिन रही है।

खास बात यह है कि परीक्षक और परीक्षार्थी दोनों रिजल्ट प्रतिशत को लेकर हैरान हैं लेकिन, खुलकर नहीं बोल रहे हैं। अफसर भी यह स्वीकार करते हैं कि परीक्षार्थियों पर कुछ उदारता बरती गई है।  हाईस्कूल व इंटर के रिजल्ट में 150 कालेज ऐसे हैं, जिनका रिजल्ट शून्य रहा है। इस पर अफसरों का मानना है कि ये कालेज सिर्फ नाम भर के हैं, किसी में दो तो कहीं चार बच्चे ही पंजीकृत थे, तीन ने परीक्षा नहीं दी। एक बैठा और फेल हो गया तो रिजल्ट शून्य होना ही था। ज्यादातर कालेज राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान है, जो उच्चीकृत करके खोले गए हैं। वहां एक शिक्षक है और आसपास के लोग भी नहीं जानते कि कालेज चल रहा है।

योगी सरकार के अफसरों का मानना है कि किसी स्थापित कालेज का परिणाम शून्य नहीं हुआ है। अब जब अफसर ऐसा मान रहे तो यह तय माने की  यूपी के शिक्षा अफसर भी मान रहे कि जैसी माध्यमिक शिक्षा प्रणाली से स्कूलों का संचालन होना चाहिए वैसा उत्तर प्रदेश में नही हो रहा हैै। जनप्रतिनिधियों से लेकर आला अफसरों और माफियों तक के हजारों स्कूल उत्तर प्रदेश में मानकों को दरकिनार कर माध्यमिक शिक्षा का बेड़ा गर्क किए है। ऐसी स्थिति में केवल एक सिरा पकड़ कर शिक्षा के स्तर में सुधार का प्रयास योगी सरकार की बेमानी और बेरूखी का प्रतीक है।

Post Author: Sanjay Srivastava

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