यूपी की फरियाद: हमका एक ‘डीजीपी’ दे दो सरकार…

संजय श्रीवास्तव
लखनऊ।

यूपी मायूस है। अपने को अनाथ महसूस कर रही है। उसे डर है अपने अस्मत की, पहचान की, जो दिन पर दिन बेहद खराब होती जा रही है। ऐसा लग रहा है मानों ‘खाकी’ के हौसले पस्त और अपराधियों के बुलंद हो रहे हैं। उनका मनोबल टूट रहा है और आवाम बेबस, बेचारा सा महसूस कर रही है। यूं कह सकते हैं कि यूपी 15 दिनों से अनाथ है। हो भी क्यों ना, पिछली सरकार में यूपी को अपराधियों की शरणस्थली, सैरगाह वगैरह, न जाने कितने उपनामों से सुशोभित कर सत्ता में आने वाली भाजपा की योगी सरकार, एक डीजीपी तक तैनात नहीं कर पा रही है। आवाम ही नहीं बाहर के राज्यों में भी बिना डीजीपी के चल रहे सूबे पर खूब चकल्लस हो रहा है। ये उत्तर प्रदेश के लिये ही नहीं बल्कि योगी जी के लिये भी शर्मनाक है। खैर, मैं तो उत्तर प्रदेश हूं जो विकास के पथ पर चलने का संकल्प,आवाम को अमन-चैन दिलाने का वायदा लेकर चलता रहता हूं और चलता रहूंगा…

उत्तर प्रदेश ‘बढ़ते अपराध’ और ‘अपने भविष्य’ को लेकर चिंतित है। ‘खाकी’ पहनने वाले चिंतित हैं। कौन होगा उनका मुखिया, पता नहीं। सरकार ठाकुर-ब्राम्हणवाद में अटक गयी है। कभी ‘ठाकुर’ तो कभी ‘ब्राम्हण’ , कभी ‘वफादारी  की बात करते-करते 15 दिन गुजर गये लेकिन डीजीपी की कुर्सी खाली पड़ी है। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह 31 दिसंबर को रिटायर हो गयें और उनकी जगह ओपी सिंह का नाम आया। श्री सिंह के ताजपोशी की तैयारी जोरों पर थी कि अचानक ‘शुभ ‘  ‘अशुभ ‘ का चक्कर टपक पड़ा। कोने – कोने से बधाइयों का दौर जारी था। डीजीपी से ताल्लुक रखने और पुराने संबंधों की दुहाई अपराधियों से लेकर सत्ता और पत्रकारों के बीच होने लगी। सभी के दावे, मेरा ओपी सिंह के ताऊ से संबंध है तो कोई कहे, मेरा ससुराल से परिचय है। मोबाइल कंपनियों की बम्पर कमाई हुई। मोबाइल पर बस नये डीजीपी साहेब से संबंध मधुर होने की बातें हो रही थी। शीतलहर में भी कयासों का बाजार ‘तवे’ तरह ‘गरमÓ था। तभी, चर्चा होने लगी कि खरमास के बाद शुभ दिन होने पर श्री सिंह कुर्सी संभालेंगे। अचानक उनका नाम ओझल होने लगा, नये नामों की फेहरिस्त उछलने लगी। सुगबुगाहट तो ये भी हो रही है कि योगी बाबा को ओपी सिंह ‘रासÓ नहीं आ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि ये सरकार के प्रति ‘वफादार

नहीं होंगे क्योंकि ‘गेस्ट हाऊस कांड’ अभी भी राजनेताओं के जेहन में दहक रही है। चर्चा ये भी है कि सरकार को ‘ठाकुर’ नहीं ‘ब्राम्हण’ डीजीपी चाहिए। सच्चाई क्या है मालूम नहीं, लेकिन भईया चाहें पान की फेमस दुकान हो या फिर चौराहे पर चच्चा की चाय की दुकान, इस समय ठाकुर-ब्राम्हण डीजीपी साहेब ही छाये हैं। लोग-बाग फर्जी के बहस बाजी में इतने मशगूल हो जाते हैं कि चाय पीते-पीते होंठ जल जाते हैं,लेकिन परवाह नहीं। कोई ‘ठाकुर’ के दावे ठोंक रहा है तो कोई ‘ब्राम्हण’ डीजीपी की…। अब उनके बाद जो सीनियर दावेदार बचते हैं उनकी उम्मीदें एक बार फिर उछाल मारने लगी हैं। इनमें कई ऐसे भी हैं जो सभी सरकारों में चरण वंदना करने में माहिर माने जाते हैं,सब लगे हैं।

अब आते हैं मुद्दे पर। यूपी में ये पहली बार देखने को मिल रहा है कि पिछले 15 दिनों डीजीपी की कुर्सी खाली है और सरकार शुभ और अशुभ के चक्कर,जातिवाद की चक्कर में फंसी हुयी है। योगी बाबा की चल रही है या फिर संघ की ये तो वही लोग जानें लेकिन एक बात है कि जब तक डीजीपी की कुर्सी खाली है, इन दिनों को इतिहास के पन्नों में शर्मनाक नामों से तो दर्ज कर ही दिया जायेगा। ये सरकार की नाकामी है या फिर किसी और की, इस फैसले से योगी आदित्यनाथ की सरकार पर लोग खुलकर बोलने लगे हैं।

ये वे लोग हैं जिन्हें सरकार से कोई दलाली नहीं करानी, ये गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों की आवाज है जो मुखर हो गयी है। सभी सूबे में अमन-चैन चाहते हैं, उन्हें डर है कि सरकार शुभ-अशुभ के फेर में पड़ी रही तो कहीं अपराधियों के हौसले बुलंद ना हो जाये और वर्दीधारी बेबस हो जायें। आखिर में मैं इतना ही कहूंगा कि मैं यूपी हूं और मुझे डर है कि भाजपा की सरकार में विकास की राह पर बढ़ रहा यूपी अपराधियों के हवाले ना हो जाये। मुझे सुकून चाहिए, ये तभी संभव है जब उत्तर प्रदेश को नया डीजीपी मिल जाये…

Post Author: Sanjay Srivastava

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